विश्व भाषा अकादमी: ‘हिन्दी भाषा का विकास और देवनागरी लिपि का ह्रास’ गोष्ठी में इन वक्ताओं ने दिया अमूल्य संदेश

आज का सुविचार:- जो व्यक्ति अपनी मौत को हमेशा याद रखता है, वह सदा अच्छे कार्य में लगा रहता है। – डॉ बी आर अंबेडकर

हैदराबाद: विश्व भाषा अकादमी भारत की तेलंगाना इकाई द्वारा 26 वीं मासिक गोष्ठियों की शृंखला में एक परिचर्चा गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन किया गया। गोष्ठी का विषय था- ‘हिन्दी भाषा का विकास और देवनागरी लिपि का ह्रास’। अध्यक्ष सरिता सुराणा ने सभी अतिथियों और सहभागियों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन किया और विश्व भाषा अकादमी, भारत की स्थापना के उद्देश्यों के बारे में जानकारी दी।

उन्होंने चेन्नई से गोष्ठी में उपस्थित हिन्दी भाषा एवं साहित्य के मूर्धन्य विद्वान साहित्यकार बी एल आच्छा को कार्यक्रम की अध्यक्षता करने हेतु मंच पर सादर आमंत्रित किया। साथ ही बेंगलुरु, कर्नाटक से विशेष अतिथि अंशु श्री सक्सेना और कटक, उड़ीसा से श्रीमती रिमझिम झा को भी मंच पर आमंत्रित किया तथा सभी सम्मानित साहित्यकारों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया।

परिपाटी के विरुद्ध कार्यक्रम के अध्यक्ष और परिचर्चा गोष्ठी के मुख्य वक्ता बी एल आच्छा ही थे। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि- आज हम यहां पर हिन्दी भाषा के विकास, देवनागरी लिपि के ह्रास और वर्तनी संबंधी अशुद्धियों पर बात कर रहे हैं। मैं इसके अकादमिक पक्ष को लेकर बात नहीं करुंगा। वह इसलिए कि पहले वैदिक संस्कृत थी, फिर संस्कृत उसके बाद पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषा आई। अपभ्रंश के बाद में प्राचीन हिन्दी जो पृथ्वीराज रासो में दिखाई पड़ती है। उसके बाद हम रीतिकाल और भारतेंदु काल तक आते हैं तो लगता है कि हिन्दी भाषा में लगातार गतिशीलता विद्यमान है।

आज 132-33 देशों में लोग हिन्दी समझते हैं। 200-250 देशों में हिन्दी भाषा पढाई जा रही है। प्रवासी भारतीयों में भी हिन्दी भाषा और संस्कृति के प्रति लगाव है। वे भी अपने प्रयासों से लगातार हिन्दी भाषा के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं। देवनागरी लिपि पूर्णतया वैज्ञानिक लिपि है। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय इसे और अधिक सरल और सहज बनाने की दिशा में प्रयासरत है। इसके साथ ही उन्होंने हर कोण से इस विषय पर विस्तार से अपनी बात रखी।

सरिता सुराणा ने कहा कि हमेशा हिन्दी भाषा के सरलीकरण और उसमें संशोधन की बात की जाती है, अंग्रेजी के शब्दों की स्पेलिंग बदलने की बात तो कभी नहीं की जाती। उनको तो नर्सरी के बच्चों को भी रटाया जाता है। कोई भी नई भाषा सीखने के लिए लिपि सीखना अनिवार्य है। फिर हिन्दी भाषा की लिपि के साथ ही छेड़छाड़ क्यों की जा रही है? श्री प्रदीप देवीशरण भट्ट ने परिचर्चा में भाग लेते हुए कहा कि करंट साइंस पत्रिका द्वारा किए गए अनुसंधान क़े अनुसार अंग्रेजी भाषा बोलते समय दिमाग़ का सिर्फ़ एक ही हिस्सा काम करता है, जबकि हिन्दी भाषा बोलते समय दिमाग़ क़े दोनों हिस्से काम करते हैं। साथ ही दिमाग़ तरोताज़ा भी रहता है। भविष्य में राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान संस्थान का इरादा अन्य भारतीय भाषाओं क़े साथ भी यही प्रयोग करने का है।

श्रीमती रिमझिम झा ने कहा कि मैं एक हिन्दी शिक्षिका हूं, स्वयं हिन्दी बोलती हूं, हिन्दी में ही जवाब देती हूं। हमें स्वयं हनुमान बनना होगा, अपनी शक्तियों को पहचानना होगा। श्रीमती ज्योति नारायण ने कहा कि हम अपनी भाषा को सम्मान देंगे, तभी दूसरे उसका सम्मान करेंगे। मैं अपने हस्ताक्षर हिन्दी भाषा में ही करती हूं। अंशु श्री सक्सेना ने कहा कि मैं विज्ञान की विद्यार्थी रही हूं लेकिन मुझे हिन्दी भाषा और साहित्य में रुचि है और इसलिए मैं हिन्दी भाषा में ही लिखती हूं। डॉ संगीता जी शर्मा ने सोशल मीडिया में रोमन लिपि के बढ़ते चलन पर अपनी चिन्ता जताई। वरिष्ठ पत्रकार के राजन्ना भी गोष्ठी में उपस्थित थे। उन्होंने इस परिचर्चा गोष्ठी को अत्यन्त सफल और सार्थक बताया।

यह गोष्ठी बहुत ही सारगर्भित रही। सरिता सुराणा ने बी एल आच्छा जी का विशेष आभार व्यक्त किया, जिन्होंने बहुत ही सटीक और यथार्थपूर्ण तथ्यों के साथ अपना वक्तव्य दिया। सभी सहभागियों ने उनके वक्तव्य की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। श्रीमती ज्योति नारायण के धन्यवाद ज्ञापन से गोष्ठी सम्पन्न हुई।

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