हैदराबाद : सूत्रधार साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, हैदराबाद, भारत की 74 वीं मासिक गोष्ठी का आयोजन दो सत्रों में किया गया। संस्थापिका सरिता सुराणा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में यह जानकारी दी। उन्होंने पटल पर उपस्थित सभी सदस्यों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन किया और संस्था की संरक्षक, प्रमुख समाजसेविका एवं कवयित्री विमलेश सिंघी को गोष्ठी की अध्यक्षता करने हेतु वर्चुअल मंच पर आमंत्रित किया। तृप्ति मिश्रा ने स्वरचित सरस्वती वन्दना प्रस्तुत करके गोष्ठी का शुभारम्भ किया।
इस गोष्ठी के प्रथम सत्र में छायावाद के युग प्रवर्तक कवि एवं साहित्यकार श्रद्धेय जयशंकर प्रसाद के साहित्यिक योगदान पर चर्चा की गई। विषय प्रवेश करते हुए सरिता सुराणा ने कहा कि कविवर जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1889 को वाराणसी, उत्तर-प्रदेश में हुआ था। उनका परिवार बनारस का प्रतिष्ठित एवं समृद्ध परिवार था और सुरती (तम्बाकू) का व्यापार करने के कारण ‘सुंघनी साहू’ के नाम से विख्यात था। लेकिन बाल्यावस्था में ही उनके पिताजी, माताजी और बड़े भाई का आकस्मिक निधन होने से सम्पूर्ण परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उनके कोमल कंधों पर आ गई। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। उन्हें पढ़ाने के लिए संस्कृत, हिन्दी, फारसी और उर्दू के शिक्षक नियुक्त किए गए थे। इनमें रसमय सिद्ध प्रमुख थे। प्राचीन संस्कृत ग्रंथों को पढ़ाने के लिए दीनबंधु ब्रह्मचारी नाम के शिक्षक नियुक्त किए गए थे। तत्पश्चात् क्वींस कॉलेज में उनका नाम लिखवाया गया परन्तु वहां पर उन्होंने आठवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की।

सरिता ने आगे बताया कि नौ वर्ष की अवस्था में ‘कलाधर’ उपनाम से ब्रजभाषा में एक सवैया लिखकर अपने गुरु रसमय सिद्ध को दिखाया था। बाद में वे खड़ी बोली में रचनाएं लिखने लगे। उन्होंने बहुत कम आयुष्य पाया लेकिन कम समय में भी अपनी रचनाओं के माध्यम से हिन्दी साहित्य को विपुल साहित्य भण्डार से भर दिया। चर्चा में भाग लेते हुए दर्शन सिंह ने कहा कि प्रसाद नारी शक्ति का बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने लिखा था – नारी तुम केवल श्रद्धा हो/विश्वास रजत नग पद तल में/पीयूष स्रोत सी बहा करो/जीवन के सुन्दर समतल में। उन्होंने कहा कि प्रसाद जी को कामायनी महाकाव्य पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ प्रदान किया गया था।
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सुनीता लुल्ला ने कहा कि उन्हें सभी छायावादी कवि बहुत प्रिय हैं। प्रसाद की – ले चल नाविक धीरे-धीरे रचना उन्हें बहुत प्रिय है। इसके माध्यम से उन्होंने अपने अंतस की पीड़ा व्यक्त की थी। अगर वे कुछ और वर्ष जीवित रहते तो हिन्दी साहित्य को और अधिक कालजयी कृतियों की सौगात देते। अध्यक्षीय टिप्पणी देते हुए विमलेश सिंघी ने कहा कि जिस तरह नमक के बिना भोजन बेस्वाद होता है, उसी तरह कविता के बिना जीवन नीरस लगता है। कविता ऑक्सीजन का काम करती है। आज़ विभिन्न वक्ताओं के वक्तव्य से जयशंकर प्रसाद जी के साहित्यिक योगदान के बारे में बहुत कुछ जाना। ऐसी चर्चाएं व्यक्ति के ज्ञान भण्डार को समृद्ध करती हैं। सभी सहभागियों ने कहा कि आज़ की चर्चा अत्यन्त सार्थक और सारगर्भित रही।

द्वितीय सत्र में काव्य गोष्ठी के आरम्भ में कोलकाता से सुशीला सुराणा ने ऋतुराज वसन्त और वीर जवानों के शौर्य से सम्बन्धित अपनी रचनाओं का पाठ किया। अमिता श्रीवास्तव ने आध्यात्मिक चेतना जागृत करती रचना- प्रार्थना कर मन जगाओ प्रस्तुत करके सबका मन मोह लिया। कटक, उड़ीसा से रिमझिम झा ने समाज के दोगलेपन को उजागर करती लघुकथा का वाचन किया तो हैदराबाद से गजानन पाण्डेय ने गुल्लक लघुकथा प्रस्तुत की। युवा कवयित्री एवं आईटी प्रोफेशनल श्रीया धपोला ने अपनी रचना- पर कतर दिए उस नन्हीं चिड़िया के ज़िम्मेदारियों ने/लाद दिया नन्हें कंधों पर ज़माने भर का बोझ ज़िम्मेदारियों ने प्रस्तुत करके सबका मन मोह लिया।
सिलीगुड़ी से भारती बजाज ने देशभक्ति के भावों से ओतप्रोत रचना प्रस्तुत की। सुनीता लुल्ला ने – कुछ नये रागों का अन्वेषण तो होना चाहिए गीत प्रस्तुत किया। दर्शन सिंह ने दौलत की पिपासा नवगीत का वाचन किया। तृप्ति मिश्रा ने अपने दोहों की सस्वर प्रस्तुति दी। सरिता सुराणा ने भी अपने दोहों और हाइकु का सस्वर पाठ किया। अध्यक्षीय उद्बोधन में विमलेश सिंघी ने सभी की रचनाओं की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए अपनी रचना- हौसलों को बुलंद रखना प्रस्तुत की। तत्पश्चात् उन्होंने बहुत ही मधुर स्वर में स्वरचित सरस्वती माता की आरती प्रस्तुत की। गोष्ठी में किरन सिंह जी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। संस्था अध्यक्ष ने सभी का हार्दिक आभार व्यक्त किया। 54बहुत ही उल्लासपूर्ण वातावरण में गोष्ठी सम्पन्न हुई।
