हाल ही में देश में एक राज्य में चुनाव सम्पन्न हुआ। ऐसा प्रतीत हुआ मानो कोई असाधारण आपात स्थिति हो—जैसे तीसरे विश्वयुद्ध की आहट। यह स्थिति अपने आप में प्रश्न खड़ा करती है कि एक लोकतांत्रिक देश में चुनाव सम्पन्न कराने के लिए सेना की तैनाती की आवश्यकता क्यों महसूस होती है। खैर, इसे यह कहकर अनदेखा किया जा सकता है कि ‘शांति हेतु शस्त्र की आवश्यकता पड़ती ही है’। किन्तु इस प्रश्न का उत्तर भी आवश्यक है कि एक लोकतांत्रिक देश में ‘लोक’ की सुरक्षा की क्या व्यवस्था होनी चाहिए?
आखिर नेता का चुनाव जनता की आवश्यकताओं की देखरेख के लिए ही तो किया जाता है। परन्तु देखिए, चुनाव में शांति बनाए रखने के लिए शस्त्रधारियों को बुलाना कोई भी राजनीतिक नेता नहीं भूलता; मीडिया भी इसमें पीछे नहीं रहता। इन सबके बीच ‘नागरिक सुरक्षा’ जैसा गंभीर मुद्दा दिन-प्रतिदिन गहरी खाई में गिरता चला जा रहा है। कहाँ से बात शुरू की जाए, यही समस्या है, क्योंकि लगातार होने वाली दुर्घटनाएँ नागरिक सुरक्षा के निम्न स्तर को ही दर्शाती हैं। यदि इन्हीं घटनाओं से शुरुआत की जाए, तो समीचीन होगा।
Indian Institute of Technology Kharagpur में छात्रों की लगातार हो रही आत्महत्याएँ चिंताजनक हैं। मात्र 10 दिनों के अंतराल में एक और छात्र की मृत्यु, और 2025 से अप्रैल 2026 तक लगभग 9 छात्रों की जान चली जाना, किसी भी संवेदनशील समाज को झकझोर देने के लिए पर्याप्त है। इससे भी अधिक विचलित करने वाली बात यह है कि इस विषय पर किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल के प्रतिनिधि की ओर से न तो स्पष्ट शोक, न आक्रोश और न ही कोई ठोस पहल देखने को मिलती है। इससे पहले Jadavpur University में भी रैगिंग और लैंगिक प्रताड़ना से जुड़ी घटना में एक छात्र की मृत्यु हो चुकी है। यह तथ्य भी विचारणीय है कि इन घटनाओं में मृतक अधिकांशतः पुरुष छात्र रहे हैं। क्या यह कारण कहीं न कहीं सार्वजनिक संवेदनशीलता और प्रतिक्रिया की कमी से जुड़ा हुआ मुद्दा नहीं है?
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महिला मुद्दों पर जिस प्रकार राजनीतिक दल और मीडिया ध्यान केंद्रित करते हैं, वह आवश्यक और स्वागतयोग्य है। किन्तु क्या इसका अर्थ यह है कि पुरुष छात्रों की समस्याएँ, उनका मानसिक स्वास्थ्य और उनकी सुरक्षा उपेक्षित रह जाएँ? यह विषय स्त्री या पुरुष का नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों की समग्र सुरक्षा व्यवस्था और विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य का है। याद रहे कि लॉ कॉलेज, मेडिकल कॉलेज आदि स्थानों में छात्राओं के साथ दुष्कर्म की घटनाएँ भी हुई हैं। न्याय मिला या नहीं—यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है। यह प्रश्न आखिर किससे पूछा जाए? ये वे युवा हैं, जिनकी आयु 20 से 25 वर्ष के बीच है—देश का भविष्य। यदि वे अपने ही शिक्षण संस्थानों में, और उससे भी बड़ी बात, अपने ही देश में सुरक्षित नहीं हैं, तो यह केवल शिक्षा व्यवस्था पर नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक और राजनीतिक ढाँचे पर भी प्रश्नचिह्न है।
अब जबलपुर के ‘बरगी डैम’ की घटना को ही देखिए—हृदयविदारक! लाइफ जैकेट भी जीवन नहीं बचा सकी। ऐसे में यह प्रश्न उठाना क्या गलत होगा कि महामहिम, मंत्रीगण और नीति-निर्माताओं के पास चुनावों से इतर इन गंभीर मुद्दों पर विचार करने का समय है भी या नहीं? यदि देश के ‘विद्या के मंदिर’ ही असुरक्षित हो जाएँ, तो ऐसी शिक्षा, ऐसा वातावरण और ऐसे समय में होने वाले चुनावों की सार्थकता पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है।
यदि देश का साधारण नागरिक पर्यटन के लिए जाने या न जाने के विषय में सोचने को मजबूर हो जाए, तो एक अभिभावक और जागरूक नागरिक के रूप में यह चिंता स्वाभाविक है कि क्या मतदान के समय “NOTA” का विकल्प चुनना ही अपनी असहमति और चिंता व्यक्त करने का एकमात्र साधन रह गया है? आखिरकार, जनप्रतिनिधियों को इसलिए चुना जाता है कि वे देश और उसके नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। यदि देश के नागरिक ही सुरक्षित नहीं हैं, तो यह लोकतंत्र के मूल उद्देश्य पर गहरी चोट है। यही सबसे बड़ा चिंतन और चिंता का विषय है।

डॉ सुपर्णा मुखर्जी संपर्क – 96032 24007
