‘उरी कंबम नीडलो’ लोकार्पित, संचालन से लेकर धन्यवाद ज्ञापन तक वक्ताओं के संदेश में निकले अमूल्य मोती…

हैदराबाद (देवा प्रसाद मयला की रिपोर्ट) : 25 अगस्त को प्रेस क्लब बशीरबाग में राइटर्स एंड जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (वाजा) तेलंगाना एवं कवियात्रा के संयुक्त तत्वावधान में लेखक के. राजन्ना की हिंदी में लिखी गई आत्मकथा ‘फाँसी’ का डॉ. कारम शंकर द्वारा तेलुगु में अनूदित ‘उरी कंबम नीड़लो’ का लोकार्पण सेवानिवृत्त जज मंगारी राजेन्दर‘जिंबो’ के हाथों किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता महाकवि निखिलेश्वर और शुरुआती संचालन डॉ. सी. कामेश्वरी ने किया।

निखिलेश्वर ने संचालन का कार्यभार सँभालते हुए ख़ुशी जताते हुए कहा कि छः वर्ष पूर्व फाँसी के लोकार्पण कार्यक्रम की अध्यक्षता उन्होंने ही की थी और तेलुगु में अनूदित पुस्तक के लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता का भार भी वही सँभल रहे हैं। पुस्तक विमोचन की अध्यक्षीय वक्तव्य में निखिलेश्वर ने वक्ताओं की अमूल्य संदेशों की सराहना की। उन्होंने कहा कि राजन्ना एक अच्छे लेखक के रूप में अपनी आत्मकथा इसलिए लिख पाए, क्योंकि उन्होंने जेल की सज़ा काटते हुए खूब पढ़ाई की।

“तेलुगु मूल के राजन्ना ने जेल में हिंदी में एमए किया और पत्रकारिता के प्रति प्रेम के साथ लेखन करना सीख लिया। यह सराहनीय है कि कारम शंकर ने हिंदी में लिखी उनकी आत्मकथा का तेलुगु में अनुवाद किया है। राजन्ना का जीवन, जो व्यवस्था में व्याप्त असमानताओं का सामना करते हुए हमारे सामने आया, प्रेरणादायक है। इस आत्मकथा पर एक फिल्म बनाई जा सकती है, क्योंकि अब यह तेलुगु में है। इसलिए इस पर ज़रूर फिल्म बनाया जाना चाहिए।” उन्होंने कहा कि राजन्ना का जीवन दलित और बहुजन युवाओं के लिए एक मार्गदर्शक होगा और उनके जेल के अनुभव समाज को सबक सिखाएँगे। उन्होंने कार्यक्रम के आयोजकों को, मूल लेखक राजन्ना एवं अनुवादक कारम शंकर को बधाई दी।

निखिलेश्वर ने जज जिंबो की विशेषता बताकर उन्हें पुस्तक पर अपनी बात रखने का जज सेआग्रह किया। जज ने राजन्ना के केस के क़ानूनी पैंतरों को विस्तार से बताया। न्यायाधीश मंगारी राजेंदर ने आग कहा कि भले ही राजन्ना की हत्या बचपन में अभिजात वर्ग का युग देखकर हुई थी, लेकिन किताब को देखकर लगता है कि उन्हें मौत की सज़ा सुनाने वाला न्यायाधीश इगो में आ गया था। उन्होंने बताया, “मजिस्ट्रेट से लेकर सर्वोच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीश में इगो रह सकता है और इस तरह के फेसले दिये जा सकते है। राजन्ना की किताब पढ़कर मुझे एक ज़िला सत्र न्यायाधीश जैसा महसूस हुआ। फ़ैसले वाले दिन अदालत में उनका व्यवहार देखकर लगता है कि न्यायाधीश ने उसे इगो में आकर ही मौत की सज़ा सुनाई होगी।” उन्होंने बताया कि उन्होंने हाल ही में एक ज़िला सत्र न्यायाधीश से मुलाकात की और उन्हें यह किताब दी और अन्य न्यायाधीशों को भी इसे पढ़ने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि यह किताब न्यायिक व्यवस्था की कमियों को चुनौती देती है और गरीबों व कमज़ोर वर्गों के साथ हो रहे अन्याय को उजागर करती है। उन्होने इस बात पर बल दिया कि यह पुस्तक का अन्य भाषाओं में भी अनुवाद होना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. के. श्रीनिवास ने कहा कि राजन्ना जेल जाने से पहले भी वह राम थे और जेल से छूटने के बाद भी राम ही हैं। वह जेल से अच्छा नागरिक और लेखक बनकर बाहर आया है। इस पुस्तक को पढ़कर लोग बहुत सी बातें जान पाएँगे।

वीक्षणम के संपादक एन. वेणुगोपाल ने कहा कि राजन्ना का संघर्ष समाज के लिए एक पाठ है। उनका व्यक्तित्व ही आज उन्हें सुरक्षित रखे हुए है। अनेक धर्मों के कुछ अच्छे लोगों के सहारे से राजन्ना अपने जीवन में उभरे है। राजन्ना के दोनों बच्चे पढ़े-लिखे हैं। राजन्ना का जीवन खुशहाल है। यह ख़ुशी की बात है कि यह पुस्तक बंगाली और अँग्रेजी में भी अनूदित होने वाली है।

डॉ. अहिल्या मिश्र ने कहा कि हमारी ऐसी व्यवस्था की कमजोरियों की वजह से ही राजन्ना को उन स्थितियों से होकर गुज़रना पड़ा। राजन्ना का संघर्ष कहने के लिए इतना-उतना नहीं है। उनकी आत्मकथा कई लोगों का मार्गदर्शक बनती है।

कवि और अतिरिक्त जिलाधीश एनुगु नरसिंहा रेड्डी ने संक्षिप्त में पुस्तक के कुछ अंशों का विश्लेषण करते हुए अनुवादक की प्रशंसा की और कहा कि ये अंश पाठक को भावुक ही नहीं बनाते, बल्कि उस समय की सामाजिक स्थितियों से भी अवगत कराती हैं। यह एक ऐतिहासिक पुस्तक है। अपर कलेक्टर और कवि एनुगु नरसिम्हा रेड्डी ने कहा कि राजन्ना की आत्मकथा में कई सच्चाइयाँ उजागर हुई हैं। उन्होंने कहा, “राजाओं का जीवन बहुत ही घमंडी होता है। मैंने इसे बचपन में अपने गाँव में ऐसे अनेक उदाहरण देखे हैं। अगर इस पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद किया जाए तो और भी अच्छा होगा।” उन्होंने सुझाव दिया कि यह पुस्तक समाज में जाति व्यवस्था, गरीबी और कानूनी असमानताओं का विश्लेषण करती है और युवाओं के लिए यह एक ज़रूरी पुस्तक है।

वाजा तेलंगाना के अध्यक्ष एन. आर. श्याम ने बताया कि उनके और प्रमुख लेखक अल्लम राजय्या के साथ काफ़ी चर्चा-विचार के बाद ही राजन्ना ने ‘फाँसी’ लिखी थी। उन्होंने राजन्ना के जीवन से संबंधित कुछ सूक्ष्म अंशों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि राजन्ना के नए जीवन की ख़ुशहाली की रीढ़ उनकी यह दूसरी पत्नी हैं। वे सम्माननीय हैं। उन्होंने राजन्ना की सच्चाई को मानते हुए उनका साथ दिया है।

डेली हिन्दी मिलाप के ब्यूरो एफएम सलीम ने माना कि समाज में कुछ व्यक्तियों के अहं और अधिकार की दुर्नीतियों के कारण राजन्ना जैसे व्यक्तियों के जीवन पर असर होता है। दुख झेलना पड़ता है। आविष्कृत पुस्तक समाज के लिए लाभदायक है। कारम शंकर ने इस पुस्तक का अनुवाद करते समय हुए अपने अनुभवों का बखान किया। राजन्ना की आत्मकथा को पढ़कर वे अत्यंत भावुक हुए और उसी स्थिति में उनकी कलम चलती गई। इस अनुवाद से काफ़ी संतुष्ट हैं।

रजक नेता श्रीकृष्णा ने राजन्ना से अपने संबंधों का परिचय दिया। कहा कि उन्हें जो सज़ा हुई उससे बचकर, जेल में कुछ समय रहकर नए व्यक्ति के रूप में बाहर आए। उनकी अच्छाई के कारण वे जेल से छूटे और अब वे खुशहाल ज़िंदगी बिता रहे हैं। इस पुस्तक के लिए उन्हें बधाई। संदर्भ में दलित नेता कांतम प्रेम कुमार ने अपने वक्तव्य में दिवंगत राष्ट्रपति एपीजे अब्दलु कलाम के बातों का उल्लेख करते हुए कहा कि राजन्ना जैसा व्यक्ति साहित्य जगत में आना हमारे लिए गर्व की बात है। यह तो बहुत अच्छी बात है कि राजन्ना ने जेल में अपना ध्यान पढ़ाई पर दिया और आज वह समाज में हमारे साथ हैं।

पंडित गंगाराम स्मारक मंच के अध्यक्ष भक्तराम ने अपने पिता गंगाराम और राजन्ना के परिचय को विस्तार से बताया। साथ ही कहा कि राजन्ना हमेशा पंडित गंगाराम स्मारक मंच को अमूल्य सुझाव देते रहते हैं। वे मंच के मार्गदर्शक और प्रेरणा के स्रोत हैं।

इससे पहले औपचारिकता निभाते हुए वाजा तेलंगाना के महासचिव देवा प्रसाद मयला ने वाजा की स्थापना एवं उसके कार्यक्रमों का संक्षिप्त में विवरण दिया। कवियात्रा के महासचिव बी वेंकट ने अपनी संस्था के कार्यक्रमों से सभा को अवगत कराया। अंत में राजन्ना के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

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