“अथर्व इंडिया शोध संस्थान” का ‘देह से देवालय’ तक विषय पर बहुआयामी परिचर्चा, इन वक्ताओं ने रखा अपना-अपना पक्ष

लखनऊ : “अथर्व इंडिया शोध संस्थान” के अथर्व संवाद कार्यक्रम में ‘देह से देवालय’ तक विषय पर बहुआयामी परिचर्चा हुई, जिसमें एक दर्जन से अधिक वक्ताओं ने अपना अपना पक्ष रखा। प्रमुख वक्ताओं में सर्वश्री डॉ जयप्रकाश तिवारी, डॉ मनोरमा सिंह, डॉ रामचन्द्र स्वामी, आशीष अम्बर, स्मृति चंदेल, डॉ. रुचि पालीवाल, सुधीर सिंह, डॉ. अंकित कुमार जैन, सुप्रीति, आशा शर्मा, देव कुमार सिंह, डॉ किरण सिंह, श्वेता श्रीवास्तव, मेलिना चौहान, डॉ. पिंकी श्रीवास्तव, रत्ना बापुली, सुधीर सिंह, प्रज्ञा शुक्ला, सुनीता मिश्रा, अजय पोद्दार अनमोल, कृष्ण कुमार पाठक आदि थे।

कार्यक्रम का संचालन संस्थान की निदेशिका अनीशा कुमारी और धन्यवाद ज्ञापन श्वेता श्रीवास्तवा ने किया। बीच बीच में संस्थान के संस्थापक डॉ वी बी पाण्डेय जी की महत्वपूर्ण टिप्पणियां आती रहीं। कृष्ण कुमार पाठक का विचार संक्षिप्त, सिद्धांत बद्ध तथा गूढ़ आध्यात्मिक पुट लिए हुए था।

उनके अनुसार देह का लक्ष्य देव ही है और देवालय देह में ही स्थित है। देवकुमार सिंह, सुप्रीति जी ने सारगर्भित, दार्शनिक और साहित्यिक पक्ष प्रस्तुत किया। डॉ. मनोरमा सिंह ने उत्तम कोटि की साहित्यिक व्याख्या की और विभिन्न कवियों की वाणी का संदर्भ रूप में उल्लेख किया। डॉ. किरण सिंह ने अपने वक्तव्य में प्रकृति से शून्य, और शून्य से शून्य में विलीनीकरण का रहस्यवादी पक्ष प्रस्तुत किया। डॉ पिंकी श्रीवास्तवा “देह से देवालय तक” पर पाश्चात्य दार्शनिकों डेकार्ट के “cogito ergo sum” (मैं सोचता हूं, इसलिए मैं हूं) मैं देह नहीं, चेतना हूं, से वार्ता प्रारंभ किया और स्पिनोजा, बर्कले, ह्यूम से लेकर अस्तित्ववादियों का दृष्टिकोण को रखा। अंत में सभी वक्ताओं के विचारों को दार्शनिक सिद्धान्त में समाहित करते हुए, सबको “अस्ति” और “भवति” के सूत्र में समाहित कर दिया और देह से देवालय तक के दार्शनिक दृष्टिकोण को विस्तार से प्रस्तुत किया।

डॉ जयप्रकाश तिवारी ने कहा कि प्रदत्त शीर्षक देह से देवालय तक देखकर तथा विद्वानों के वक्तव्य को सुनकर मुझे दार्शनिक सिद्धांत अस्ति, करोति और भवति का स्मरण हो आया। अस्ति अर्थात (अस्तित्व, being), करोति अर्थात (क्रिया, doing) और भवति अर्थात (वही बन जाना, becoming)। यदि मन, बुद्धि की रुचि के अनुसार देह की समस्त क्रियाओं को सूक्ष्मता से देखें तो यह अभिरुचि तीन प्रकार की होती है; सात्विक, राजसिक और तामसिक। इसी में विश्व के सभी दर्शन समाहित हैं। और इस दृष्टिकोण से विवेच्य विषय देह से देवालय तक को सात्विक रुचि के अंतर्गत निर्धारित किया जाएगा।

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प्रदत्त शीर्षक में देह शब्द अस्तित्व का प्रश्न उठाता है। क्या मैं देह हूं? इस प्रश्न पर विचार करते करते भारतीय मनीषी “मात्र देह है”, चार्वाक की इस धारणा को नकार देते है। चार्वाक दर्शन में देह (शरीर) को ही ‘आत्मा’ माना गया है, जिसे ‘देहात्मवाद’ कहते हैं। वह केवल चार भौतिक तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु) के संयोग से उत्पन्न चेतन शरीर ही जीव है, जो मृत्यु के बाद नष्ट हो जाता है। परलोक, पुनर्जन्म या शरीर से भिन्न आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है। जीवन का लक्ष्य भौतिक सुख प्राप्त करना है – “यावत जीवेत सुखम जीवेत ऋणों कृत्वा घृतम पिबेत” पर उसका दृढ़ विश्वास है। किंतु नैतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास के साथ शीघ्र ही यह धारणा बदल गई।

विचारशील बुद्धि इसे पंचमहाभूतों से निर्मित मान बैठता है। किंतु ये पंचमहाभूत तो जड़ तत्व हैं, यह देह प्रकृति की विकृति है, तो यह देह चैतन्य कैसे है? अपने सुदीर्घ चिंतन यात्रा में मानवीय बुद्धि ने यह जान लिया कि “स्वयं प्रकृति” और “प्रकृति की विकृति” भी चैतन्य पुरुष के कारण ही चेतान्वित है। ध्यान रहे देह भी प्रकृति की एक विकृति है। प्रश्न है विकृति क्या है? इसका उत्तर है जो “अस्ति और नास्ति”, “जायते और म्रियते” के मध्य दोलायमान हो, जिसका जन्म हो, वर्धन हो, परिवर्तन हो, क्षीणता हो, मृत्यु हो जाए; वह विकृति है- “जायते वर्धते विपरिणमते अपक्षीयते विनश्यति”। यह देह ऐसा ही है। देह के यही विकार हैं। यही इस देह का अर्थ है, जीवन चक्र का हिस्सा है। रत्नावली का फटकार “देह और देही”, “देह और देव” के अंतर को भलीभांति स्पष्ट कर देता है – “अस्थि चर्म यह देह मम या में जैसी प्रीत। वैसी जो श्रीराम मह होती तो भव भीति”। कहां से आई रत्नावली में यह चेतना? यह बोध शंकराचार्य जैसे आध्यात्मिक, दार्शनिक मनीषियों की शिक्षा का प्रभाव है।

उन्होंने विवेक चूड़ामणि में यही कहा है- “त्वङ्मांसरुधिरस्नायुमज्जामेदोस्थिसङ्कुलम्। अपवित्रमिदं देहं मूढः पण्डितमान्यते”। अर्थात् त्वचा, मांस, रक्त, स्नायु, मज्जा और हड्डियों के इस समूह रूपी, अपवित्र शरीर को मूर्ख ही ‘मैं’ मानता है, जबकि ज्ञानी इसे शरीर, देह मात्र ही मानता है। पुनः कहते है- “चर्मच्छन्नं क्षुद्रवस्तु यन्त्रं चर्मार्मेधिकम्। विण्मूत्रपूयपूर्णं च कथं पण्डितमान्यते”। अर्थात् जो चमड़े से ढका हुआ है, मल-मूत्र और पीब से भरा हुआ है, ऐसा यह नीच शरीर है, इसे पंडित (ज्ञानी) इसे कैसे अपना मान सकता है? देह के साथ एक अच्छाई यह है कि अंतःकरण चतुष्टय को साधन बनाकर देव तत्त्व तक की यात्रा सहज ही की जा सकती है।

“देह से देव”, “रूप से अरूप” का चिंतन:

बात चार्वाक से आगे बढ़ती है, विचारक सोचता है, मै कौन हूं? क्या मिट्टी से उगे अन्न, पौधे, वनस्पतियों का परिणाम हूं, क्या अन्मयमय कोश हूं? नहीं। क्या मनोनय कोश हूं? नहीं। क्या प्राणमय कोश हूं? नहीं। क्या विज्ञानमय कोश हूं? नहीं। क्या आनंदमय कोश हूं? … नहीं।… तो … फिर हूं क्या….????? अंतिम उत्तर मिलता है, मैं इन सभी कोशो का, इन पंच महाभूतों का साक्षी हूं, चैतन्य हूं। यह निर्णय “मैं कौन हूं?” की खोज का अंतिम निष्कर्ष है। आइए इस खोज पर, इस प्रक्रिया पर थोड़ा और विचार करते हैं।

चिंतनशील मानव बुद्धि इस देह का विश्लेषण करते हुए इसके कारण और कारणत्व पर विचार करते हुए इसके स्थूल शरीरा, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर तक पहुंचा। यह कारण शरीर ही “देव तत्त्व” या ईश्वर तत्त्व है। मानव देह लघु है, ईश्वर विराट है। मानव कण है तो ईश्वर विभु है। मानव अल्पज्ञ है तो ईश्वर सर्वज्ञ है। मानव कमजोर है तो ईश्वर सर्वशक्तिमान है। मानव भक्त है तो ईश्वर भगवान है। यह द्वैत भाव है, मनसा – वाचा – कर्मणा भक्ति का परिणाम सालोक्य, सारूप्य, सार्ष्ष्टि, समीप्य और सायुज्य मुक्ति की यात्रा ही मानव का सर्वोच्च उत्कर्ष है, अंतिम पुरुषार्थ है और यही “देह से देवालय” तक की यात्रा भी है। इस लेख का विवेच्य विषय भी।

अब एक प्रश्न है, इस देव या ईश्वर तत्त्व की उपलब्धि स्थान कहां है? मानवीय चिंतन, दार्शनिक अन्वेषी वृत्ति ने एक मत से उत्तर दिया अपनी ही हृदय गुफा में। वहीं इस देव तत्त्व या ईश्वर तत्त्व का साक्षात्कार करना है? अब दूसरा प्रधान है, क्या भौतिक देव स्थल, देवालय और शिवालय का महत्व नहीं? यदि इनका कोई महत्व नहीं तो इस उपलब्धि के बाद भी इनका महत्व क्यों? उत्तर है ये ही साधना स्थल हैं, विराट को कण में देख पाने का, सागर को विंदु में निहारने का, महाकाल को काल में, शिव को शिवलिंग और विष्णु को शालिग्राम में दर्शन का। इस वृत्ति के सुदृढ़ हो जाने के बाद वह चैतन्य अपने ही अंतःकरण में दिखने लगता है। आत्म साक्षात्कार हो जाता है। जबतक यह सायुज्य या आत्म साक्षात्कार न हो इन देवालयों और शैवालों का, माला- जप- तप- यज्ञ, स्नान-ध्यान-पूजा का महत्व बना रहेगा। यहां तक द्वैत है। यह पौराणिक चिंतन है। “देह से देवालय तक” का चिंतन पौराणिक चिंतन है। सगुण ब्रह्म का चिंतन है। यह आपको देवलोक तक की यात्रा कर देगा। रुचि और साधन के बल पर साधक को ब्रह्मलोक, शिवलोक, विष्णुलोक, गोलोक, साकेत लोक… तक पहुंचा देगा किंतु स्मरण रहे पंकमों के भोग के पश्चात पुनः धारा पर आना ही होगा। यहां पुनर्जन्म से छुटकारा नहीं है। पुनर्जन्म से मुक्ति आत्मबोध, स्वरूप ज्ञान से ही होगा। कर्म से मुक्ति संभव नहीं।

किंतु, जैसे ही ज्ञान से चेतन तत्व का आत्मा मेंये दर्शन हुआ। अज्ञान मिटा, तत्क्षण ही स्वरूप बोध हो मैं तो चेतन आत्मा हूं, अमृत तत्व हूं, ब्रह्म हूं। यह चिंतन अब द्वैतवादी न होकर अद्वैतवादी हो जाता है। चेतन तत्त्व का प्रसार अब हमारे अंतःकरण तक सीमित न होकर कण कण तक, यत्र तत्र सर्वत्र व्यापी हो जाता है- ईशावास्य इदं सर्वम, सर्वंखलु इदं ब्रह्म, बन जाता है वह उपनिषद दृष्टि और निर्गुण ब्रह्म बन जाता है। मुण्डक (2.2.11) और बृहदारण्यक कहते हैं- वह ब्रह्म (या आत्म तत्त्व या चैतन्य) आगे भी है, पीछे भी; ऊपर भी है नीचे भी; दाएं भी है, बाएं भी; वही दसोदिक में व्याप्त है। छांदोग्य कहता है- तत्त्वमसि तुम वही हो। (तत् त्वं असि)। “तत् त्वं असि” निर्देश वाक्य है, जिसे जिसे अनुभूत करना है। अनुभूति के पश्चात साधक स्वयं बोल उठता है- “अहं ब्रह्मास्मि”। अयमात्मा ब्रह्म।

मांडूक्य उपनिषद् चिंतन की इन उलझी गुत्थियों की सुलझाता है- “अयमात्मा ब्रह्म स: अयम आत्मा चतुष्पात” (मंत्र 2)। इसके चार पाद हैं। इसे ही क्रमशः (i) जागृत, बहिष्प्रज्ञ, स्थूल शरीर, (ii) स्वप्न, स्थूलभुक (भोक्ता देह), अंतःप्रज्ञ, सूक्ष्म शरीर, मानसिक शरीर (प्रविविक्तभुक) (iii) सुषुप्ति, प्रज्ञानघन, आनंदमय, आनंदभुक, चेतोमुख कहा है। यही ईश्वर, यही सर्वज्ञ है, यही उत्पत्ति और प्रलय का कारण तत्त्व है- “ऐष सर्वेश्वर ऐष सर्वज्ञ: ऐष अंतर्यामी ऐष योनि: सर्वस्व प्रभव अप्ययौ हि भूतानाम”(मंत्र 6)। यही कारण ब्रह्म, अपर ब्रह्म है। चौथा पाद “तुरीय” है। यही परम आत्मा है, निर्गुण है, निराकार है, नित्य है, अक्रिय है, अज है, प्रपंच रहित है, अव्याख्येय है, अरूप है, अनाम है, शिव है (मंत्र 7)।

प्रदत्त विषय का विचार क्षेत्र प्रथम तीन पाद तक ही है। किंतु ये तीनों अपर है, जो परम है वह चौथा पाद है। करोति और भवति की यात्रा यहीं तक है। यह माया और मायापति, जगत और जगतपति तक ही पहुंच पाता है। महर्षि व्यास ने श्रीविश्वनाथाष्टकं में लिखा है- “देह विलये लभते च मोक्षम”। लोक प्राप्ति ही परमपद की प्राप्ति है- “शिव लोकम आप्नोति शिवेन सह मोदते”।

अद्वैत दर्शन सर्वोच्च दर्शन है यह इसके भी आगे की चिंतन यात्रा करता है। इसका एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है- “अन्वय व्यतिरेकाभ्यां” वह अन्वय और व्यतिरेक की भांति जगत और जगतपति की बात, इसका वर्णन केवल समझने और समझने के लिए करता है। वह कहता है कि जिस प्रकार स्वप्न जगत काल्पनिक है, ठीक उसी प्रकार भौतिक दृश्य जगत भी सपना ही है, एक भ्रम है, माया है, अव्यक्ता का व्यक्त रूप है। श्रुति और युक्ति से उसे सिद्ध करने के बाद, अद्वैत तो यहां तक कहता है कि ब्रह्म या परमात्मा तो अजात है, अज है, उसका जन्म और पुनर्जन्म कैसा। दृश्य रूप जो आभासी है, वह एक अद्वितीय ही है। “नेहनानास्ति किंचनम”। अन्य कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, नानात्व का अस्तित्व ही नहीं है। यहां चेतन आत्म तत्त्व के अतिरिक्त है ही नहीं। ऐसा ज्ञान ही परमात्मबोध है। ज्ञान ही ब्रह्म है- “प्रज्ञानम ब्रह्म”, “अनंतं ज्ञानं ब्रह्म”।

अद्वैत वेदांत:

अद्वैत वेदांत दर्शन का सिद्धांत “अस्ति” है। यहां ज्ञान की प्रधानता है। यह अपने अस्तित्व, सत्ता की बात करता है, “मै हूं”, “मैं चेतन हूं”, “मैं ब्रह्म हूं”, “अहम ब्रह्मास्मि” की बात करता है। यह ज्ञान है, यह बोध है, यह आत्म स्वरूप का साक्षात्कार है।

द्वैत: “करोति”:

यहां कर्म की प्रधानता है। यह भक्ति संप्रदाय से जुड़ा सिद्धांत है। एक सांख्य और योग की बात करता है। एक कर्म, क्रिया, कार्य, परिवर्तन है। यह “अहम करोमि”, कर्म और कर्म फल का सिद्धांत है। मोक्ष के लिए भक्ति अत्यंत उपयोगी साधन है किंतु कर्म होने से इसकी सीमा है, यह अपर साधन है। आदि शंकराचार्य जी ने वि.चू.म. में लिखा है- “मोक्ष कारणसामग्रया भक्तिरेव गरीयसी। स्वस्वरूप नुसंधानं भक्ति: इति अभिधीयते। स्वस्वरूप अनुभक्तिरित्यपरे जगुः। स्वात्मतत्त्वानुसन्धानं भक्तिरित्यपरे(31, 32)। यह स्पष्ट शब्दावली में निर्णय है- भक्ति: इति अपरे। भक्ति अपर है, यह परम नहीं है।

भवति:

यह होने या बनने की प्रक्रिया है। यह न्याय वैदेशिक दर्शन का सिद्धांत है। इसे आरंभवाद का सिद्धांत भी कहा जाता है। स: भवति की बात करता है, जैसे स: भवति, वैसे ही अहम भवति, जगत भवति। प्रदत्त विषय देह से देवालय, द्वैत दर्शन, भक्ति संप्रदाय में परिगणित किया जाएगा।

यदि इस प्रश्न को “पौराणिक दृष्टि” से देखें तो हमारा लक्ष्य है, देह से देवतक या देवालय तक। यदि “गीता की दृष्टि” से देखें तो क्षेत्र से क्षेत्रज्ञ तक, यदि “उपनिषद की दृष्टि” से देखें तो देह (जड़) से चेतन (आत्मा) तक।

किंतु सर्वश्रेष्ठ समन्वयवादी उत्तर तो भक्त प्रवर हनुमान जी महाराज ने अपने प्रभु श्रीराम को एक प्रखर ब्रह्मविद दार्शनिक की भांति दिया है-
देहबुद्‍ध्या तु दासोऽहं जीवबुद्‍ध्या त्वदंशकः। आत्मबुद्‍ध्या त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः(अध्यात्म रामायण)। इस श्लोक के तीन आयाम या तीन दृष्टि हैं –

(i) देहबुद्‍ध्या तु दासोऽहं: जब मैं शरीर के दृष्टिकोण (देह भाव) से देखता हूँ, तो आप भगवान हैं और मैं आपका दास (सेवक) हूँ।

(ii) जीवबुद्‍ध्या त्वदंशकः जब मैं जीव (आत्मा) के दृष्टिकोण से देखता हूँ, तो मैं आपका अंश हूँ, आप अंशी हैं। अंशी-अंश भाव दृष्टि।

(iii) आत्मबुद्‍ध्या त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः जब मैं सर्वोच्च तत्व (आत्मज्ञान/परमात्मा) की दृष्टि से देखता हूँ, तात्विक दृष्टि से देखता हूं, तो मैं ही आप हूँ, अर्थात् मैं और आप एक ही हैं; आत्मा ही हैं। ऐसी मेरी निश्चित मति (धारणा) है।

अद्वैत दर्शन के प्रखर प्रचारक/प्रवक्ता आदिशंकराचार्य जी ने भी हनुमान जी की अनुभूति का समर्थन करते हुए उसी बात को पुनः दोहराया है, देखिए – “दासस्तेऽहं देहदृष्ट्याऽस्मि शंभो जातस्तेंऽशो जीवदृष्ट्या त्रिदृष्टे। सर्वस्याऽऽत्मन्नात्मदृष्ट्या त्वमेवेत्येवं मे धीर्निश्चिता सर्वशास्त्रैः”॥ इस प्रकार उत्तम कोटि की इस परिचर्चा में यह परिसंवाद कार्यक्रम अपने निर्धारित समय को अतिक्रमित करते हुए एक बजे के साथ पर 2:30 बजे तक चला। समय के अतिक्रमित होने का एक कारण आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का होना भी था। विचारकों द्वारा इस विषय पर भी कुछ न कुछ विचार अवश्य ही व्यक्त किया गया।

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