अधिक समय नहीं गुज़रा, जब हम सबने अति उल्लास से, भाषा, साहित्य, संस्कृति और समाज की सेवा में तन-मन-धन से समर्पित डॉ. अहिल्या मिश्र (ज. 1948-2025) के अमृतोत्सव के अवसर पर यह हार्दिक शुभकामना की थी कि वे शतायु हों; दिव्य आयु प्राप्त करें। लेकिन कामना कामना ही रह गई; और वे दिव्यलोक की यात्रा पर निकल गईं – अभी गत 25 दिसंबर, 2025 के सूर्योदय के साथ!
‘तेलंगाना समाचार’ के संपादक के. राजन्ना जी उन्हें बहुत मानते थे। अपने ऑनलाइन समाचार पत्र में लगातार उन पर सामग्री छाप रहे हैं। मुझसे भी कई बार कह चुके। उन्हें कैसे बताऊँ कि मैं अभी सहज नहीं हूँ। स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ कि अहिल्या जी नहीं रहीं। यों, अभिनंदन ग्रंथ ‘वट वृक्ष की छाँव’ के लिए जो लिखा था; उसी का आरंभिक अंश पुनः उनकी स्मृति में दोहरा रहा हूँ।…
यों तो अहिल्या जी के लेखन से मैं काफ़ी पहले से परिचित था, लेकिन 1995 में जब मेरा स्थानांतरण चेन्नई से हैदराबाद हुआ, तो उनसे प्रत्यक्ष परिचय का अवसर मिला। डॉ. रोहिताश्व, स्वाधीन और पुरुषोत्तम प्रशांत इस परिचय के माध्यम बने। इन त्रिदेवों ने ही मुझे कादंबिनी क्लब (हैदराबाद) के मासिक कार्यक्रमों में शिरकत के लिए प्रेरित किया। यह जानकर अच्छा लगा कि इस संस्था की गोष्ठी हर हाल में हर महीने तीसरे इतवार को एक ही स्थान पर एक ही समय हुआ करती थी। गोष्ठियों की विषयवस्तु से अधिक उनके पारिवारिक स्वरूप ने मुझे विशेष आकर्षित किया।
ध्यान से पढ़ें-
शहर भर के हिंदी कवि-कवयित्री इन गोष्ठियों में जिस आत्मीय भाव से तब जुड़ते थे, उसी से आज भी जुड़ते हैं। सबका डॉ. अहिल्या मिश्र के साथ घरेलू रिश्ता है (रहा)। मुझे भी साल, दो साल परखने के बाद उन्होंने भाई बना लिया। मैं भाग्यशाली हूँ कि अहिल्या जी जैसी बड़ी बहन हैदराबाद में मेरी अभिभावक हैं (थीं), संरक्षक हैं (थीं)। जब वे स्नेह से ‘इन्हें’ भाभी कह कर पुकारतीं और ममता से गले मिलतीं, तो ‘ये’ भी गद्गद हो उठतीं! ऐसा निश्छल और अहैतुक वात्सल्य आज की दुनिया में भला सबको कहाँ नसीब होता है? लेकिन कादम्बिनी क्लब (हैदराबाद) परिवार के सब सदस्यों को अहिल्या जी से समभाव से यह वात्सल्य मिलता है (रहा)। वे सहज वत्सलता का अवतार हैं (थीं)।
मैंने देखा है, कई बार ऐसा हुआ कि किसी ने अहिल्या जी के इस वत्सल भाव पर आघात किया, तो वे छटपटा कर वेदना और आक्रोश से भर उठीं। उन्हें छली और प्रपंची लोग क़तई पसंद नहीं है (थे)। कुछ लोग ऐसी स्थितियों में चुपचाप किनारे हो जाते हैं, लेकिन अहिल्या जी ऐसे लोगों को तब तक खदेड़ती हैं (थीं), जब तक वे अपने बिलों में न घुस जाएँ। एक ख़ास तरह की ज़मींदारना दबंगई भी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है (थी) – लेकिन सकारात्मक। दरअसल, वे सहज प्रेम पर प्रहार उसी तरह बरदाश्त नहीं कर पाती (थीं), जिस तरह आदिकवि वाल्मीकि क्रौंच पक्षी पर बहेलिये के हमले को बर्दाश्त नहीं कर पाए थे।
इसीलिए वे जब कहीं कुछ अघटनीय घटित होते देखती हैं (थीं), तो उनके भीतर का यह आदिकवि विचलित हो उठता है (था)। यही वजह है कि वे केवल काग़ज़ रंगते रहने वाले निष्क्रिय बुद्धिजीवियों की जमात में शामिल नहीं हैं (थीं)। बल्कि 75 वर्ष की अवस्था में भी, ख़ासतौर से स्त्रियों और बच्चों के लिए, कर्मरत रहने वाली सक्रिय कार्यकर्ता हैं (थीं)। प्रश्न भाषा का हो या साहित्य का, स्त्रियों का हो या संस्कृति का, वे उससे सीधे टकराती हैं (थीं)। उनके व्यक्तित्व के ये दोनों आयाम – वात्सल्य और जुझारूपन – उनके समग्र साहित्य की आधार भित्ति का निर्माण करते हैं।
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अहिल्या जी ने खूब लिखा है, लगातार लिखा है और सार्थक लिखा है। कविता हो या कहानी, नाटक हो या निबंध, संस्मरण हो या आत्मकथा – वे वाग्जाल नहीं फैलातीं। वे अत्यंत प्रभावशाली वक्ता भी हैं (थीं), लेकिन वहाँ भी उतनी ही बे-लाग-लपेट दिखती हैं थीं), जितनी अपने लेखन में हैं। उन्होंने अपने लेखन में व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय सरोकारों को हमेशा सीमित व्यक्तिगत सरोकारों पर तरजीह दी है। उन्हें अपनी कविताओं में भारतवर्ष के सभी क्षेत्रों में बसने वालों की एकात्मता के लिए प्रार्थना करते, गौरवशाली इतिहास को बार-बार दोहराते और जागरण, बलिदान, परिवर्तन व नवनिर्माण के गीत गाते देखा जा सकता है। अहिल्या जी की पक्षधरता में किसी भ्रांति की गुंजाइश नहीं है। वे हमेशा बच्चों, स्त्रियों, दलितों, युवकों और वंचितों के पक्ष में तथा वर्चस्ववादियों और शोषकों के ख़िलाफ़ चुनौती की मुद्रा में खड़ी दिखाई देती हैं (थीं)।
… प्रिय भाई राजन्ना जी के आग्रह का मान रखने को मैंने इन पंक्तियों में ‘वर्तमान काल’ को कोष्ठक में ‘भूतकाल’ कर तो दिया है, लेकिन अहिल्या जी के स्नेहभाजन रहे मेरे जैसे अनेकों के मानस में वे सदा वर्तमान ही रहेंगी – ‘नित्य वर्तमान’! कहा भी तो गया है न कि-
जयंति ते सुकृतिनो
रससिद्धा: कवीश्वरा:।
नास्ति येषां यश:काये
जरा मरणजं भयं।।
इन्हीं शब्दों के साथ डॉ. अहिल्या मिश्र को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि…
- ऋषभदेव शर्मा
(हैदराबाद)
