हैदराबाद: केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद तथा विश्व हिंदी सचिवालय के तत्वावधान में भारतीय उच्चायोग फ़िजी, स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र फीजी एवं वैश्विक हिंदी परिवार की ओर से भाषा विमर्श की श्रृंखला के अंतर्गत बारहवाँ ‘विश्व हिंदी सम्मेलन’ (फ़िजी) विषय पर साप्ताहिक ई- आभासी संगोष्ठी आयोजित की गई।
सर्वविदित है कि हिंदी भारत के अलावा विश्व की भी प्रमुख भाषा है। विश्व हिंदी सम्मेलन हिंदी का महाकुंभ है जो 1975 में भारत के नागपुर से शुरू हुआ था और अब तक ग्यारह विश्व हिंदी सम्मेलन हो चुके हैं। बारहवाँ सम्मेलन प्रशांत क्षेत्र फिजी में पहली बार 15 से 17 फरवरी 2023 को होना सुनिश्चित है। इसके लिए लोगो एवं वेबसाइट आदि विधिवत जारी हो चुकी है। सम्मेलन से संबन्धित परिकल्पना, वर्तमान स्थिति और अन्य तैयारियों के बारे में आज रविवारीय वेब संगोष्ठी में प्रमुख विद्वानों द्वारा विचार प्रकट किए गए।
पृष्ठभूमि
आरंभ में कार्यक्रम संयोजक डॉ राजेश कुमार द्वारा विमर्श की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की गई। तदोपरांत केंद्रीय हिंदी संस्थान के हैदराबाद केंद्र के क्षेत्रीय निदेशक डॉ गंगाधर वानोडे द्वारा बड़े ही संयत भाव और आत्मीय ढंग से माननीय अध्यक्ष जी, विशिष्ट अतिथि, पैनल के वक्ताओं और देश-विदेश से जुड़े सैकड़ों सुधी श्रोताओं का विधिवत स्वागत किया गया। उन्होंने फीजी से जुड़े अनेक विद्वानों का भी विशेष रूप से स्वागत किया।

कार्यक्रम के संचालन का बखूबी दायित्व संभालते हुए स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र फीजी के पूर्व निदेशक संतोष कुमार मिश्र ने अनुभवजन्य नपे-तुले, सधे और संतुलित शब्दों में सबका आदर करते हुए विश्व हिंदी सम्मेलन सलाहकार समिति के सदस्य सच्चिदानंद जोशी से अपना मन्तव्य प्रकट करने का आग्रह किया। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सचिव सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि बारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन के केंद्र में कृत्रिम मेधा को भी रखा गया है। इसके साथ हर क्षेत्र के युवाओं को जोड़ना श्रेयस्कर होगा। हमें दुनियाँ की सभी भाषाओं का सम्मान करते हुए हिन्दी के प्रति हीनता बोध हटाना चाहिए। अब भारत में मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई का भारतीय भाषाओं में शुरुआत होना संतोषप्रद है।
यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ पैसिफिक फीजी की पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ इंदू चंद्रा ने इस आयोजन पर अपार हर्ष प्रकट किया और गिरमिट काल के पूर्वजों की स्मृति को प्रणाम करते हुए उनकी अत्यंत कष्टप्रद साधना को नमन किया जिनकी बदौलत विषम परिस्थितियों में भी अगली पीढ़ी पढ़ाई कर अग्रसर हुई। उनका कहना था कि फिजी में शिक्षा में हिंदी को प्रधानता दी जाती है। अन्य भाषा भाषियों के मुखारबिन्दु से हिंदी सुनने पर बहुत खुशी होती है। हम सब विश्व हिंदी सम्मेलन की शानदार सफलता हेतु कटिबद्ध हैं।

श्री सत्संग रामायण मंडली फीजी के अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद ने बताया कि रामायण के माध्यम से ही उन्होने बचपन में हिंदी सीखी है। इस समय फीजी में लगभग 2000 रामायण मंडलियाँ सेवारत हैं जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वकील एवं अन्य समाज के लोग भी सक्रियता से जुड़े हैं। इनके माध्यम से बाल विकास के कार्यक्रम भी संचालित होते हैं। हमें विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर समाज के सभी वर्गों को समादर सहित समुचित प्रतिनिधित्व देना चाहिए ताकि हिंदी की जड़ें गहरी हो सकें।
धर्मशाला केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलाधिपति पद्मश्री हरमिंदर सिंह बेदी ने कहा कि भारतीय भाषाओं के मद्देनजर बारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन की महत्ता अत्यंत व्यापक है। प्रवासी चेतना द्वारा भारतीय भाषाओं में लेखन बहुत महत्वपूर्ण है। इस सम्मेलन में एशिया के देशों में हिंदी की स्थिति की पुनरीक्षा होनी चाहिए। इससे दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन, सार्क देशों में नए आयाम स्थापित होंगे। इस सम्मेलन में समाज विज्ञान के अलावा ज्ञान विज्ञान के हर क्षेत्र से जुड़े विद्वानों की सहभागिता सुनिश्चित होनी चाहिए। हमें पूरा विश्वास है कि सम्मेलन के बाद जारी होने वाला दस्तावेज़ मील का पत्थर साबित होगा।

आर्य प्रतिनिधि सभा फीजी के वरिष्ठ पदाधिकारी कमलेश आर्य ने कहा कि टापू द्वीप फीजी में हम सम्मेलन के लिए बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षारत हैं और शानदार आयोजन हेतु अनवरत सामूहिक सत प्रयत्न जारी है। हमारी सदिच्छा है कि समाज के सभी क्षेत्रों से जुड़े भाषा प्रेमी, संस्कृतिकर्मी और राष्ट्रधर्मी सक्रियता और पूरे मनोयोग से शामिल होकर लाभान्वित हो सकें।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के वयोवृद्ध मानद अध्यक्ष नारायण कुमार ने अवगत कराया कि नागपुर और लंदन में आयोजित सम्मेलनों में तत्समय पंडित विवेकानंद शर्मा ने फीजी में सम्मेलन आयोजित करने का प्रस्ताव रखा था जो अब चरितार्थ होना संतोषप्रद है। आरंभ में स्वयं सेवी संस्थाओं की सहयात्रा से चलकर अब सरकारी स्तर पर आयोजन सुखद है।इसकी व्यापकता के मद्देनजर जन सहभागिता जरूरी है।
केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष एवं इस कार्यक्रम के संरक्षक अनिल जोशी ने माननीय अध्यक्ष एवं फिजी और भारत के महामहिम द्वय की गरिमामयी उपस्थिति पर प्रसन्नता प्रकट की तथा फीजी से विशेष रूप से उपस्थित अनेक विद्वानों का समादर किया। उन्होंने फीजी में अपनी राजनयिक सेवाओं से व्युत्पन्न अनुभव से कहा कि इस सम्मेलन से वहाँ साहित्य, शिक्षण और पत्रकारिता को विशेष रूप से बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने फीजी में भाषा और साहित्य सेवा के क्षेत्र में स्थापित साहित्यकार पंडित कमला प्रसाद मिश्र, जोगिंदर सिंह कंवल और प्रो. शुक्ल आदि की स्मृति को नमन किया। श्री जोशी ने मनसा प्रकट की कि भाषाएँ मात्र बोली बनकर न रहें बल्कि ज्ञान विज्ञान का भी माध्यम बनें। गिरमिट का इतिहास जगजाहिर हो। शांति दूत, सक्रिय रहे और युवाओं को मौका मिले। सम्मेलन से पहले प्रतियोगिताएँ आयोजन से युवा प्रतिभाओं को चयनित कर सम्मेलन में सहभागिता सुनिश्चित की जाए। केंद्रीय हिंदी संस्थान हर संभव सहयोग के लिए तत्पर है। इस सम्मेलन से न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया को विशेष रूप से जोड़ना श्रेयस्कर होगा। इसके अलावा गैर भाषा भाषी भी सक्रियता से जुड़ें और मिलकर सत प्रयत्न जारी रहे।
भारत में फीजी के महामहिम उच्चायुक्त कमलेश प्रकाश ने इस कार्यक्रम के आयोजन पर अपार हर्ष प्रकट किया। उन्होने कहा कि फीजी और भारत का प्रगाढ़, अटूट और ऐतिहासिक संबंध है। भारत के माननीय विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर के कर कमलों से 27 अक्तूबर को लोगो और वेबसाइट जारी हो चुकी है। बारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन से दोनों देशों के बीच नए आयाम स्थापित होंगे। यह फीजी में अब तक का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होगा। व्यक्ति से व्यक्ति के बीच सद्भाव बढ़ेगा। फीजीवासी उत्सुकता से स्वागत हेतु प्रतीक्षारत हैं। फीजी में हिन्दी तीन में से एक औपचारिक राष्ट्रीय भाषा और चाहत की भाषा है। हमारी मनसा है कि दबे हुए गिरमिटिया पर्यटन को बढ़ावा मिले। डिजिटल माध्यम से भी हिंदी का विश्वव्यापी प्रचार प्रसार, पठन पाठन और प्रयोग हो। फीजी में हिंदी के विविध आयाम पर पुस्तक प्रकाशित होना सुखद आश्चर्य है। हम पिछले सम्मेलनों के अनुभवों के आधार पर अग्रसर रहेंगे। इसका फलितांश अगले सम्मेलन से पहले उजागर होगा। फीजी देश आपकी राह देख रहा है। सबका स्वागत है।
भारत के फीजी में महामहिम उच्चायुक्त पी एस कार्थिगेयन ने इस प्रतिष्ठापरक कार्यक्रम में उपस्थित अतिथितियों, वक्ताओं और सुधी श्रोताओं का अभिनंदन करते हुए खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा कि दक्षिणी गोलार्ध में आयोजित होने वाला यह पहला विश्व हिंदी सम्मेलन है जिससे नए आयाम स्थापित होंगे और फलितांश से वैश्विक लाभ मिलेगा। इस अवसर पर विशेष डाक टिकट जारी करने की योजना है और फिजी में भाषा प्रयोगशाला स्थापित करने की आयोजना है। लगभग 14 सौ प्रविष्टियों में से सर्वोत्कृष्ट लोगों का चयन किया गया। भारत के माननीय विदेश राज्यमंत्री जी की अध्यक्षता में तैयारी संबंधी विभिन्न कार्यों के लिए तीन उप समितियाँ गठित की गई हैं जिनमें फीजी के प्रतिनिधि भी सम्मिलित हैं। वेबसाइट पर सम्मेलन के स्थान एवं होटल आदि की विस्तृत जानकारी दी गई है। विश्व की अन्य भाषाओं और हिन्दी प्रेमियों के पधारने की आशा है। आइये, निर्मल मन से मिलकर प्रयास करें।
अपने अध्यक्षीय उदबोधन में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के अध्यक्ष एवं पूर्व राजदूत श्री वीरेंद्र गुप्ता ने कहा कि यह साहित्यकारों का ही सम्मेलन नहीं बल्कि ज्ञान विज्ञान को वैश्विक दिशा देने वाले सभी के लिए है। हमें भारत में भी हिंदी को समुचित स्थान और सम्मान देना चाहिए। हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी का सभी महत्वपूर्ण वैश्विक मंचों से हिन्दी में भाषाण प्रेरणापुंज है। हम भारतवासियों को गुलाम मानसिकता और अंग्रेजियत से बाहर आने की आवश्यकता है। भारतीय भाषाओं में मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई की शुरुआत अत्यंत सराहनीय है। हमारी भाषायी ऊर्जा का क्षरण नहीं होना चाहिए। जोहनसबर्ग में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन के केंद्रीय प्रभारी रह चुके श्री गुप्ता ने कहा कि विदेश में रह रहे भारतीय हिंदी के प्रति गर्व महसूस करते हैं। आज के कार्यक्रम को सफल बताते हुए उन्होंने कहा कि मंथन और पौष्टिक अवलेह हेतु इस तरह की संगोष्ठियाँ समय-समय पर आयोजित होती रहनी चाहिए।
कार्यक्रम में सभी महाद्वीपों के कई देशों के लेखक, विद्वान, साहित्यकार एवं चिंतक आद्योपांत जुड़े रहे। चैट बॉक्स में भी अनेक उत्साहवर्धक सुझाव आए। फीजी से विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञों की विशेष उपस्थिति सर्वश्री /श्रीमती मनीषा रामलखन, अंजलिना, बलराम पंडित, आशुतोष द्विवेदी, सुरेन्द्र प्रसाद, अमित अहलावत, अशोक कुमार सिंह, कमल किशोर मिश्र एवं शैफुल्लाह खान एवं शिव निगम आदि की रही। आयोजक मंडल की सभी संस्थाओं एवं कार्यक्रम संबंधी विभिन्न टीमों का विशेष सहयोग रहा। इस कार्यक्रम के संरक्षक केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल, आगरा के उपाध्यक्ष अनिल जोशी तथा मुख्य मार्गदर्शक वरिष्ठ पत्रकार एवं भाषाकर्मी राहुल देव हैं। मार्गदर्शक संतोष चौबे, नारायण कुमार तथा वी जगन्नाथन हैं। कार्यक्रम के संयोजक डॉ जवाहर कर्नावट (भारत), श्री सुमंत राउत (फीजी), श्री रोहित कुमार हैप्पी (न्यूजीलैंड) हैं। तकनीकी सहयोग डॉ मोहन बहुगुणा तथा डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ का रहा। डॉ विजय मिश्र, डॉ गंगाधर वानोडे तथा श्री विजय नगरकर का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ। रिपोर्ट लेखन कार्य डॉ. जयशंकर यादव तथा डॉ. राजीव कुमार रावत को सौंपा गया।
अंत में फीजी विश्वविद्यालय की प्रो सुभाषिनी कुमार ने आत्मीय भाव और मृदुल वाणी में माननीय अध्यक्ष, विशिष्ट अतिथियों, पैनल विद्वानों, संरक्षकों, संयोजकों, संचालकों तथा सुधी श्रोताओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। उन्होंने इस कार्यक्रम से देश-विदेश से जुड़ी संस्थाओं एवं व्यक्तियों का नामोल्लेख सहित आत्मीय ढंग से विशेष आभार प्रकट किया। फीजी में हिन्दी की उदीयमान लेखिका सुभाषिनी ने हिंदी का वैश्विक गौरव बढ़ाने हेतु सबके प्रति कृतज्ञता प्रकट की। अध्यक्षीय अनुमति के साथ कार्यक्रम का विधिवत समापन हुआ। ज्ञातव्य है कि यह कार्यक्रम वैश्विक हिंदी परिवार शीर्षक से यूट्यूब पर भी उपलब्ध है।
