[13 नवंबर तेलुगु दैनिक आंध्रज्योति का संपादकीय। पाठकों की प्रतिक्रिया अपेक्षित है]
इतनी बेरहमी से पिटाई करे तो क्या किसी का भी दिल रुक नहीं जाता? एक दलित महिला मरियम्मा की लॉकअप डेथ मामले में तेलंगाना हाईकोर्ट की गंभीर टिप्पणी के अगले ही दिन इसी तरह का एक और दिल दहला देने वाला मामला प्रकाश में आया है। सूर्यापेट जिले में बुधवार को एक आदिवासी युवक की पुलिस की बर्बरता से की गई पिटाई के बारे सोचे तो ही रोंगटे खड़े हो जाते है। चोरी के मामले में हिरासत में लिये गये उस युवक की केवल पिटाई नहीं की बल्कि भयंकर यातनाएं देकर खुशी से नाच उठे। पीड़ित युवक को दीवार की कुर्सी बनाया गया। उसका पेशाब उसको ही पिलाकर आनंद लिया। पुलिस की बर्बरता की जीती जागती यह घटना हाल ही रीलिज हुई फिल्म ‘जय भीम’ अनेक लोगों को याद दिलाती है।
पुलिस ने आत्मकूर मंडल के रामोजीतांडा निवासी गुगुलोत वीरशेखर नामक युवक को खेत में काम करते समय बिना कारण बताये थाने ले गई। मफ्टी में आई पुलिस ने सुबह से देर रात तक उसकी बेरहमी से पिटाई की। पुलिस की पिटाई से वह पेशाब कर दिया। पीड़ित युवक ने बताया कि एसआई और कांस्टेबलों ने उसे लातों से मारे और मेरा पेशाब मुझे ही पिलाते हुए हंसने लगे। पुलिस को संदेह है कि कुछ समय से आसपास के इलाकों में हो रही चोरी के मामलों में वीरशेखर का हाथ है। हाल ही में खेतों में लगाये गये मोटर, उपकरण और प्राथमिक स्कूल की कुछ चीजें चोरी हो गई। इसी बीच एक बेल्टशॉप में भी चोरी हुई। पुलिस ने इस मामले के संबंध में सीसीटीवी फुटेज के आधार पर उसी तांडा के एक युवक को हिरासत में लिया। पुलिस की पूछताछ में उसने बताया कि इस चोरी के मामले में कुछ और युवक शामिल है। इसी दौरान उसने वीरशेखर का नाम लिया।

इसके चलते पुलिस उसे थाने लेकर आई और आधी रात तक बुरी तरह से उसकी पिटाई की। पुलिस की पिटाई के दौरान वह बेहोश हो गया। इसके चलते पुलिस ने तुरंत उसके भाई को थाने बुलाया और घर ले जाने को कहा। अलसुबह वीरशेखर भयंकर पीड़ा से चकराने लगा। यह देख परिजन उसे अस्पताल ले गये। वह चलने की हालत में भी नहीं था। यह देख तांडा के सैकड़ों लोग वीरशेखर को टैक्टर में बिठाकर थाना ले गये और आंदोलन पर उतर आये। इस अवसर पर एसआई लिंगय्या ने कहा कि चोरी का मामला साबित हुआ है। इस बात को छिपाने के लिए आरोपी के परिजन पुलिस पर असत्य आरोप लगा रहे हैं। वीरशेखर के साथ मारपीट नहीं की गई है। केवल पूछताछ के बाद घर भेज दिया है। इस घटना के बाद उस एसआई के अनेक कारनामे मीडिया उदाहरणों को उजाकर कर रही है।
इस साल जून में राचकोंडा आयुक्तालय क्षेत्र के अड्डगूडुर थाने में मरियम्मा नामक दलित महिला को चोरी के आरोप में पुलिस थाने ले गई और बेरहमी से पिटाई करने कारण उसकी मौत हो गई। इस मामले को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट सवाल किया कि क्या पीट-पीट हत्या करने वाले पुलिस को निलंबति किया गया तो काफी है? उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज क्यों नहीं किया गया है? हाईकोर्ट ने कहा कि मरियम्मा का मामला गभीर है। इसे सीबीआई को सौंपा जाना चाहिए। साथ ही सवाल किया कि पिछले साल मई महीने में मंथनी थाने में पुलिस की पिटाई के दौरान मारे गये शीलम रंगय्या के मामले में पुलिस के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है? पुलिस पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी के दिन ही रामोजीतांडा में यह मामला प्रकाश में आया है।
उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि इस तरह के मामलों में शामिल पुलिस के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए एक जांच व्यवस्था के गठन की आवश्यकता दर्शाता है। अनेक समिति और आयोग ने भी इस तरह के मामलों में पुलिस को सजा देने, भारी जुर्माना लगाने वाली एक व्यवस्था पर बल दिया है। ऐसी व्यवस्था होने पर ही पुलिस अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभा पाएंगी। मगर पुलिस को अपना गुलाम बनाकर रखने वाली हमारी सरकारें इस ओर आवश्यक कदम नहीं उठाना दुख की बात हैं।

