[नोट- इस लेख के लेखक तेलुगु दैनिक ‘दिशा’ के संपादक है। इतना ही नहीं, वे लगभग 17 साल (1983-2000) तक नक्सवादी आंदोलन में भूमिगत रह चुके है। कुछ निजी कारणों से वे भूमिगत से बाहर आये हैं। हमने उनके इस लेख को तेलुगु से अनुवाद किया है। विश्वास है कि पाठकों को यह लेख उपयोगी साबित होगी। आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है।]
क्या ऑपरेशन कगार के आकलन करने में हुई गलती के कारण माओवादी पार्टी को अपने इतिहास में इतना बड़ा नुकसान हुआ जितना पहले कभी नहीं हुआ? क्या पार्टी सचिव बसवराज, कईं सीसी, एसजेसी और डीवीसी सदस्य और हिडमा समेत पीएलजीए बटालियन, कंपनी और प्लाटून के कमांडर की मौतें पोलित ब्यूरो के गलत फैसले के कारण हुए है? अगर अगस्त 2024 में जारी सर्कुलर में पार्टी के सदस्य और गुरिल्ला फोर्स के लिए सही रणनीति और उतार-चढ़ाव बताए गए होते, तो क्या इतना बड़ा नुकसान नहीं होता? ऑपरेशन कगार हमले की गंभीरता को पार्टी और पीएलजीए नेतृत्व कमेटियों की ओर से कम आंकने की वजह से नुकसान हुआ और हो रहा है (2024 जनवरी से जुलाई तक)। इसकी पहचान कर चुकी पोलित ब्यूरो ने निचली कमेटियों की ओर से की गई गलतियों की तरह क्या उसने भी गलतियां की है? इन सवालों का जवाब हाँ ही में मिलता है।
पोलित ब्यूरो ने अगस्त में जारी सर्कुलर में ऑपरेशन कगार की सटिक जानकारी दी थी। सर्कुलर में यह भी बताया गया कि जनवरी 2024 में शुरू हो चुके इस युद्ध हमले में दुश्मन पहले कभी नहीं किये गये ऐसे बड़े हमले की तैयारी कर रहा है। यह ऑपरेशन कगार पिछले ऑपरेशन ग्रीनहंट-1 तथा 2 और ऑपरेशन समाधान से बिल्कुल भिन्न है। इसबार दुश्मन कालीन शिविर (Carpet Camping) का तरीका अपना रहा है और 2019-2023 के दौरान बनाए गए 199 पुलिस कैंप के अलावा और भी कैंप लगा रहा है। इन कैंप में 500 से 1000 सीआरपीएफ कोबरा और बीएसएफ फोर्स आदि शामिल हैं। इन कैंपों को फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (एफओबी) कहा जा रहा है और भविष्य में इनकी संख्या और बढ़ने की संभावना है। ग्रीनहंट के समय 200 पुलिस कैंप लगाए गए थे और 2200 कम्युनिकेशन टावरों का निर्माण किया गया।
सर्कुलर में आरोप लगाया गया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने निर्देश दिया है कि ऑपरेशन कगार युद्ध का मकसद 2025 मार्च के आखिर तक बस्तर इलाके, खासकर अबूझमाड़ और दक्षिण बस्तर के गुरिल्ला ठिकानों को माओवादियों से आज़ाद कराना है। सर्कूलर में स्पष्ट किया है कि राज्य और केंद्रीय बल, सेना, एनएसजी कमांडो और एयर फोर्स को मिलाकर पहले ही बस्तर में करीब सात लाख दुश्मन सेनाएं हैं। ये सेनाएं आधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल कर रही हैं और सैटेलाइट, ड्रोन और नाइट विजन डिवाइस का अंधाधुंध प्रयोग कर रही हैं।
पोलित ब्यूरो ने सही अनुमान लगाया था कि ऑपरेशन कगार हमला मुख्य रूप से चारों ओर से घेरकर किया जाएगा। यह भी स्पष्ट किया कि कारपेट कैंपिंग का मतलब है कि मूवमेंट एरिया को छोटे-छोटे ग्रुप में बांटना और हर 5 से 10 किलोमीटर पर एक कैंप लगाना है। पोलित ब्यूरो ने साफ किया कि परिणामस्वरूप पीएलजीए बल की मूवमेंट सीमित हो जाएगी और बटालियन और कंपनी लेवल पर बड़ी टुकड़ियों में आगे करना मुश्किल होगा। पार्टी ने सुझाव दिया कि इन हालात में किये जा रहे हमलों की घटनाओं को छोड़कर बाकी समय में चार सदस्यों वाली दो टीम के साथ मिलकर आठ सदस्यों के साथ गठित दल के साथ आगे बढ़े और गुरिल्ला लड़ाई के लिए ज़रूरी रहस्य तरीकों का सख्ती से पालन करे और सेल्फ-डिफेंस को प्रमुखता दें। माओवादी पार्टी ने मिलिट्री स्ट्रक्चर के बारे में कई और फैसले भी लिए। साथ ही बिना संख्या वाले निर्मोंणो को खत्म कर दिया।
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हालांकि, ऑपरेशन कगार हमले को लेकर इतनी जानकारी और निर्माण में बदलाव और सुधार तथा रणनीति और उतार-चढ़ाव में सावधानियों के बारे में बतानी वाली पोलित ब्यूरो ने अहम फैसले को लेकर एक बड़ी गलती की। उनके सर्कूलर 31 पृष्ठ (इंग्लिश) के पृष्ठ 25 और दूसरे अन्य पृष्ठों में इस प्रकार कहा गया है-
चीनी सांस्कृतिक क्रांति के महान योद्धा माओ त्से तुंग ने कहा, “हमारी सेना को जितना हो सके उतना बचाते हुए दुश्मन की सेना को जितना हो सके उससे ज्यादा खत्म करना ही युद्ध का लक्ष्य होना चाहिए।’’ माओ की इस टिप्पणी को ध्यान में रखते हुए माओवादी पार्टी की पोलित ब्यूरो ने कहा, “हमारी मुख्य सेनाओं को और मुख्य नेतृत्व को युद्ध मैदान से दूर हटाना, पाक्षिक रूप से लंबे समय तक के लिए दूर हटाना रणनीतिक वापसी (Strategic Retreat) के अंतर्गत आता है। मुख्य सेनाओं को छोड़कर द्वितीय (Second) और तृतीय (Third) सेनाओं के कुछ हिस्से को और पार्टी नेतृत्व के कुछ हिस्से को युद्ध मैदान से दूर हटाना पाक्षिक रूप से कम समय के लिए हटना सामरिक वापसी (Tactical retreat) के अंतर्गत आता है। इन युद्ध सिद्धांतों को ध्यान में रख ले तो वर्तमान (अगस्त 2024) दंडकारण्य गुरिल्ला ज़ोन में हमें टैक्टिकल रिट्रीट (Tactical Retreat) किया जाना चाहिए। अर्थात मुख्य सेनाओं को वहीं पर रखकर और अन्य सेनाओं और पार्टी नेतृत्व के कुछ हिस्से को कारपेट सिक्योरिटी वाले इलाकों रहने वाले इलाकों से अन्य इलाकों को भेज देना चाहिए। अब मुख्य सेनाओं को बदलते हालात में छोटी-छोटी टुकड़ियों में घुमना चाहिए। हमले के समय में मिलना और फिर अलग होना प्रस्तावित आधार पर अबूझमाड़ और साउथ बस्तर बटालियन को काम करना चाहिए।”
इसके बाद घटित घटनाओं के आधार पर ऐसा कहा जा सकता है कि उपर्युक्त फैसला ही माओवादी पार्टी और पीएलजीए सेनाओं के लिए बड़ा घातक साबित हुआ। इस सर्कुलर में पोलित ब्यूरो द्वारा बताई गई सरकार की ऑपरेशन कगार युद्ध रणनीति और उतार-चढ़ाव को मिलिट्री नजरिए से विश्लेषण करें, तो अबूझमाड़ और साउथ बस्तर इलाकों से माओवादी पार्टी को टैक्टिकल रिट्रीट नहीं करना चाहिए था। सच में देखा जाये तो सामरिक वापसी (Strategic retreat) करना चाहिए था। भारतीय मिलिट्री और पैरामिलिट्री फोर्स की संख्या, हथियारों का भंडार और रिसोर्स की तुलना करें तो माओवादी सेनाओं में जमीन-आसामान का अंतर स्पष्ट दिखाई देता हैं। केवल नारायणपुर, बीजापुर और सुकमा जिलों की जमीनी हिस्सों के साथ लिमिटेड एरिया में माओवादियों की मेन फोर्स की दो बटालियन और सेकंडरी फोर्स की कुछ और कंपनियां तथा प्लाटून अपने-अपने क्षेत्र में काम कर रही हैं। दुश्मन हर 5 से 10 किलोमीटर क्षेत्र में 500-1000 सैनिकों के साथ एक कैंप को कारपेट सिक्योरिटी के हिस्से के रूप में स्थापित करते हुए देखकर पोलित ब्यूरो को इस विषय को गंभीरता से लेना चाहिए था।
पोलित ब्यूरों को यह नतीजा निकालना चाहिए था कि साल 2024 में ही यही हालात भविष्य में वह जल्द ही और कैंप लगाएगी और गुरिल्ला इलाके को पूरी तरह से घेरकर हमले करेगी। क्योंकि ऑपरेश कगार की शुरुआत से लेकर यानी जनवरी 2024 से 7 अक्टूबर 2025 तक सरकार ने पुराने 200 कैंप के अलावा 100 नए कैंप लगाए हैं। यह देखते हुए पोलित ब्यूरो को यह भी समझ लेना चाहिए था कि तीन जिलों के इलाके में कुल 300 कैंप होने की स्थिति में गुरिल्ला बलों के लिए टिके रहना मुश्किल हो जाएगा।
इस गलती की वजह से बाद में पुलिस फोर्स ने धीरे-धीरे गुरिल्ला इलाकों को घेर लिया और हर गांव को अपने अधीन कर लिया तथा हमले करते हुए आगे बढता गया। इस तरह, माओवादी नेतृत्व, सैन शक्ति और कार्यकर्ताओं के छीपे जंगलों और माओवादी शेल्टर ज़ोन में घुसकर, उन्हें घेरकर, कॉर्डन सर्च करके खत्म कर दिया। इस तरह किये गये हमलों में सचिव बसवराज और कई सेंट्रल कमेटी के सदस्य, दूसरे स्पेशल ज़ोन, डिवीज़न और एरिया लेवल के पार्टी लीडर, कैडर, पीएलजीए कमांडर और गुरिल्ला नेता बड़ी संख्या में मारे गए।
यदि रणनीतिक वापसी (Strategic retreat) सामरिक वापसी (tactical retreat) का फैसला किया गया होता तो यह स्थिति पैदा नहीं होती। मेन फोर्स वाली दो बटालियन, उसके नेतृत्व, पार्टी सचिव बसवराज सहित कई सीसी सदस्य, मुख्य रूप से डीके एसजेडसी सदस्यों को बाहरी इलाकों को 2025 में प्रवेश करने से पहले भेज दिये गये होते तो मौजूदा स्थिति पैदा नहीं होती। स्थानीय लोगों के हौसले को बुलंद रखने और दुश्मन सेनाओं को परेशान करने वाली कार्रवाई करने के लिए पीएलजीए से संबंधित सेकेंडरी फोर्स, पीपुल्स मिलिशिया की प्लाटून और पार्टी बिल्डिंग यूनिट्स (एलओएस) को मात्र रखा जाता, तो वे लोगों के सहयोग से भूमिगत रह सकती थी। सरकारी सेनाओं के लिए उनका पता लगाना मुश्किल हो जाता।
इसके अलावा बटालियन और कंपनी स्तर की टीमों को गुरिल्ला बेस एरिया में ही रखे जाने के कारण उनकी हलचल और कैंपों को पुलिस ने ड्रोन और सैटेलाइट के जरिए बहुत ही आसानी से पता लगा पाये है। उस सर्कुलर में बताये गये अनुसार ही सरकारी सेनाओं के कंट्रोल में आ चुके गांवों में बनाए गए सूचना नेटवर्क भी उनके लिए बहुत ही मददगार साबित हुई। मिली जानकारी का इस्तेमाल करके और एरिया पर कंट्रोल रहने वाले स्थानीय आदिवासियों की डीआरजी की मदद से हमले करके भारी नुकसान पहुंचाया। चीन की सांस्कृतिक क्रांति का मार्ग ही हमारा मार्ग कहककर दीर्घकालीन प्रजा युद्ध सिद्धांत का अनुकरण करने वाली माओवादी पार्टी पोलित ब्यूरो ने माओ की ओर से चीनी क्रांति युद्ध में अपना गई रणनीति और उतार-चढ़ाव का अध्ययन करने और आचरण में लागू करने में पूरी तरह से विफल हो गई।
हमें साल 1934 में चियांग काई-शेक सरकार की सेनाओं की ओर किये गये पांचवें घेरेबंदी और दमन के हमलों के दौरान किए गए लॉन्ग मार्च को नहीं भूलना चाहिए। दुश्मन से घिरी जियांग्शी लिबरेशन एरिया में ही मुख्य सेनाएं रही तो उनके निर्मुलन होने के खतरे को महसूस करते हुए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी 86,000 सैनिकों वाली रेड आर्मी के साथ उत्तरी प्रांतों से पीछे हट गई। एक साल तक चला यह लॉन्ग मार्च आखिरकार अक्टूबर 1935 में येनान पहुँच गया। तब सिर्फ़ 8,000 सैनिक ही बचे थे। माओ ने उस सेना की तुलना दूध से निकाला गया मक्खन से की थी। वही छोटी-सी सेना बाद के समय के साथ-साथ बढ़ती गई और आखिरकार चीनी क्रांति को विजयी दिलाई। यदि दंडकारण्य में भी माओवादी पार्टी उपर्युक्त रणनीति वापसी-उतार-चढ़ाव की नीति को लागू करके छत्तीसगढ़, उड़ीसा और झारखंड से पीछे हट गई होती या अपनी मुख्य बल और नेतृत्व को देश के दूसरे हिस्सों में भेज दी होती तो शायद इतिहास कुछ और ही दिखाई देता।

मार्कण्डेय
संपादक
तेलुगु दैनिक ‘दिशा’
