हैदराबाद: छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के जीरमघाटी में 25 मई 2013 को हुए परिवर्तन रैली मामले में 10 आदिवासियों को एनआईए कोर्ट द्वारा दी गई मौत की सजा को तुरंत रद्द करने की मांग पूर्व माओवादी पार्टी के पूर्व शीर्ष नेताओं ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, छत्तीसगढ़ राज्य सरकार के साथ ही केंद्र सरकार से की है। इस फैसले को तुरंत रद्द कर 10 आदिवासियों को जेल से रिहा करने की मांग करते हुए माओवादी पार्टी के पूर्व केंद्रीय, राज्य कमेटी सदस्य देव जी, संग्राम, चंद्रन्ना, वैनक्का, संजीव, मुप्पिडि सांबय्या, दामोदर, हुसैन, बंडी प्रकाश, नरहरि, नून नरसिंह रेड्डी, चंदू व कंकणाला राजीरेड्डी ने हाल ही में प्रेस विज्ञप्ति जारी की।
विज्ञप्ति में कहा कि घटना के 13 साल बाद एनआईए कोर्ट ने 10 आदिवासियों को मौत की सजा सुनाई। भारतीय संविधान लागू होने के 76 साल में एक ही अदालत द्वारा एक ही मामले में 10 लोगों को मौत की सजा देना पहली बार है। इससे देश के आदिवासी, पीड़ित लोग, लोकतंत्रवादी गंभीर रूप से चिंतित हैं और इस सजा को रद्द करने की मांग कर रहे हैं।
दुनिया भर में सामाजिक व्यवस्थाओं को पूरी तरह बदलने वाली क्रांति के लिए, जातियों की मुक्ति के लिए, देशों की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष संगठनों ने काम किया। सरकारी सशस्त्र बलों और सशस्त्र संघर्ष संगठनों के बीच सशस्त्र टकराव और युद्ध हुए। इसी क्रम में कहीं सरकारी सशस्त्र बलों ने कुछ संघर्ष संगठनों को दबाया, तो कहीं शांति वार्ता के जरिए दोनों पक्षों ने युद्ध विराम किया। कहीं संघर्ष संगठनों ने आत्मसमर्पण किया। ऐसे मामलों में समस्या को राजनीतिक रूप से सुलझाने के हिस्से के रूप में दोनों पक्षों को अतीत को खोदे बिना बदले की कार्रवाई किए बिना शांति बनाए रखने में मदद करने वाले तरीके से व्यवहार करना चाहिए।
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ऑपरेशन कगार के दौरान माओवादी पार्टी ने शांति वार्ता के जरिए समस्या को सुलझाने का प्रस्ताव केंद्र व राज्य सरकारों को दिया था। सरकार शांति वार्ता के लिए राजी नहीं हुईं और सरेंडर करने पर अड़ी रहीं। इससे कई राज्यों के माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर अपने हथियार सरकार को सौंप दिए। इससे 30 मार्च को अमित शाह ने भारत को माओवादी मुक्त देश घोषित किया। तब से माओवादियों की ओर से कहीं भी सशस्त्र कार्रवाई नहीं हुई। इस स्थिति में केंद्र व राज्य सरकारों की नीतियां शांति बनाए रखने में मदद करने वाली होनी चाहिए, उसे तोड़ने वाली नहीं होनी चाहिए।
माओवादी गतिविधियों में शामिल होने के नाम पर कुछ और गरीब लोगों को सरकारें व अदालतें सजा दे रही हैं। 22 जुलाई को विशाखापत्तनम सेशन कोर्ट ने देवेंद्र, शिल्पा व स्वप्ना को 5 साल की जेल की सजा सुनाई। सितंबर में ही कांकेर सेशन कोर्ट ने बलमूरी नारायण राव (प्रभाकर) व राजे को 7 साल जेल की सजा सुनाई। 16 सितंबर को जीरमघाटी केस में 10 आदिवासियों को एनआईए कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई। 24 सितंबर को कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर एडिशनल सेशन कोर्ट ने पीलूराम आचला को आजीवन सजा सुनाई।
आरोप लगाया कि आने वाले दिनों में बहुत से लोगों को इसी तरह सजा देने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें और अदालतें तैयार हो रही हैं। माओवादियों के सरेंडर होने के बाद जेल में बंद लोग उम्मीद कर रहे हैं कि सरकारें उन्हें रिहा कर देंगी, इस स्थिति में ये सजाएं उन्हें गंभीर असुरक्षा और चिंता में धकेल रही हैं। केंद्र-राज्य सरकारों द्वारा अपनाए जा रहे बदले की भावना वाले रवैये को छोड़ने की मांग की।
पूर्व माओवादियों ने न्यायिक प्रक्रिया से नहीं बल्कि राजनीतिक प्रक्रिया से इस समस्या को हल कर शांति को स्थायी बनाने की मांग केंद्र व राज्य सरकारों से की। मांग की कि जेल में बंद माओवादियों और सरेंडर कर चुके माओवादियों पर लगे सभी केस रद्द करते हुए सरकारें जीओ जारी करें। जीरमघाटी केस में 10 आदिवासियों को एनआईए कोर्ट द्वारा दी गई मौत की सजा को रद्द करने के लिए केंद्र व राज्य सरकारों को मनाने की अपील देश की सभी विपक्षी पार्टियों से कर रहे हैं और इस मौत की सजा को रद्द करने के लिए लीगल एड देने के लिए आगे आने का आह्वान जन-पक्षधर, आदिवासी हितैषी वकीलों से किया।
