भाषा केवल भावों को व्यक्त करने का माध्यम मात्र नहीं होती, बल्कि वह किसी जाति, समाज और राष्ट्र की आत्मा होती है। हिंदी केवल एक भाषा ही नहीं, बल्कि भारत की सामासिक संस्कृति, उसकी धड़कन और उसकी पहचान का सबसे सशक्त प्रतीक होता है। जब हम ‘हिंदी दिवस’ के अवसर पर इस की चर्चा करते हैं, तो यह केवल औपचारिकता नहीं होनी चाहिए, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने और आत्ममंथन करने का एक सुअवसर भी होना चाहिए।
इतिहास और राष्ट्र निर्माण में योगदान
आधुनिक हिन्दी का यह सफर सदियों के विकास से होकर गुजरा है। अपभ्रंश और प्राकृत के पड़ावों को पार करती हुई यह भाषा जन-जन के संपर्क की भाषा बनी। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, जब देश विभिन्न रियासतों, भाषाओं और बोलियों में विभाजित था, तब हिन्दी ने ही ‘राष्ट्रभाषा’ के रूप में पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने का ऐतिहासिक कार्य किया। महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक और स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे महापुरुषों ने यह पहचाना था कि स्वराज्य का मार्ग स्वदेशी और अपनी भाषा के बिना प्रशस्त नहीं हो सकता। हिन्दी भाषा ने अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता की अलख जगाने में जनमानस को जोड़ने का जो कार्य किया, वह अविस्मरणीय है।

डिजिटल युग और वैश्विक पटल पर हिंदी
आज वैश्वीकरण और डिजिटल क्रांति के इस दौर में हिन्दी ने अपनी प्रासंगिकता को न केवल बनाए रखा है, बल्कि नए आयाम भी गढ़े हैं। आज इंटरनेट पर सामग्री उपभोग करने वालों में अंग्रेजी के बाद सबसे बड़ा वर्ग हिन्दी भाषियों का है। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और तमाम वैश्विक टेक कंपनियां अब अपनी सेवाओं में हिन्दी को प्राथमिकता दे रही हैं। विदेशों के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई और सिखाई जा रही है। यह इस बात का प्रमाण है कि भाषाएं संवाद और रोजगार के साथ समय के अनुसार खुद को ढालने में सक्षम हैं।
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वर्तमान चुनौतियां और हमारा दायित्व
भले ही हिन्दी का दायरा बढ़ा हो, लेकिन आज यह अपनी ही भूमि पर कुछ चुनौतियों से जूझ रही है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में अंग्रेजी को प्रतिष्ठा और हिन्दी को हीनता का प्रतीक मान लिया गया है। दफ्तरों, अदालतों और उच्च शिक्षा के संस्थानों में आज भी हिन्दी को उसका वास्तविक स्थान मिलने की प्रतीक्षा है। यदि हम अपनी भाषा को केवल घरों तक सीमित रखेंगे और व्यावसायिक व तकनीकी शिक्षा से दूर कर देंगे, तो वह बौद्धिक भाषा के रूप में पिछड़ जाएगी।
हिंदी में मौलिक साहित्य रचा जाए
आवश्यकता इस बात की है कि हम भाषा को लेकर हीन भावना से बाहर निकलें। इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि हम अन्य भाषाओं का सम्मान न करें; बहुभाषावाद हमारी खूबी है, लेकिन अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा की कीमत पर नहीं। प्राथमिक शिक्षा हिन्दी या मातृभाषा में हो, दफ्तरों का कामकाज सहज हिन्दी में चले और विज्ञान-तकनीक के क्षेत्र में हिन्दी में मौलिक साहित्य रचा जाए।
दैनिक जीवन में हिंदी
हिन्दी दिवस तभी सार्थक होगा जब हम केवल मंचों से भाषण देने के बजाय अपने दैनिक जीवन में हिन्दी के प्रयोग को गर्व का विषय बनाएं। आइए, इस हिन्दी दिवस पर यह संकल्प लें कि हम अपनी संस्कृति की इस अमूल्य थाती को संवारेंगे और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे और अधिक समृद्ध बनाएंगे।

राजकुमार टंडन
C.E.O.
गीता प्रकाशन बुक्सवाला
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