हैदराबाद : वीकेंड आते ही नॉन-वेज के शौकीन चिकन और मटन की दुकानों पर कतारें दिखाई देते हैं। वीकेंड पर ही इनके रेट में उतार-चढ़ाव दर्ज होता है। हर हफ्ते रेट बढ़ते देख हम आसमान को छूते चिकन दाम जैसी खबरें पढ़ते हैं। लेकिन इस हफ्ते मुर्गी नहीं, अंडा ही झटका दिया है।
रिटेल मार्केट में अप्रैल महीने में एक अंडे का दाम 4 रुपये था, जो मई आते-आते 5 रुपये तक पहुंच गया। जून के पहले हफ्ते में वही अंडा 6 रुपये का हो गया और जून के आखिरी हफ्ते तक 8 रुपये पर पहुंच गया। जल्द ही 10 रुपये तक पहुंचकर खरीदारों को झटका देने के लिए तैयार है। आम आदमी पर ही इसका बोझ ज्यादा पड़ेगा। उपभोक्ता दुख जता रहे हैं कि अंडे का दाम इतना बढ़ने के कारण क्या हैं? बच्चों से लेकर बड़ों तक पौष्टिक आहार के रूप में रोज खाया जाने वाला अंडा ही 10 रुपये का हो जाए तो और क्या खरीदें? क्या खाएं?
तेलंगाना में करीब 4 हजार पोल्ट्री लेयर उद्योग हैं जिनमें रोजाना लगभग 4 करोड़ अंडे का उत्पादन होता है। इसमें से 50 फीसदी राज्य में और 50 फीसदी दूसरे राज्यों को निर्यात होता है। हालांकि इस साल गर्मी में भीषण गर्मी बर्दाश्त न कर पाने से 10 फीसदी मुर्गियां मर गईं। इसके चलते अंडों का प्रोडक्शन घटा और मांग के मुताबिक सप्लाई न होने से दाम बढ़ गया। इतना ही नहीं, मुर्गियों के चारे, दवा के दाम भी बढ़ने से उसका असर अंडे के रेट पर भी पड़ा।
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इस पर नेशनल उत्तर तेलंगाना एग को-ऑर्डिनेशन कमेटी के चेयरमैन एर्रबेल्ली प्रदीप राव ने कहा कि अंडा उत्पादन किसान को एक अंडा 6 रुपये में पड़ता है तो रिटेल मार्केट तक आते-आते 8 रुपये का हो जाता है। उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले तक पश्चिम एशिया युद्ध के कारण अंडों का निर्यात न होने से नुकसान उठाना पड़ा है। एक मुर्गी से अंडा दिलाने के लिए चारे, दवा पर ही हमें 7 रुपये खर्च होता है। प्रदीप राव का मानना है कि हाल तक पोल्ट्री किसानों को भारी नुकसान हुआ था। अब अंडे का दाम बढ़ने से किसान उस नुकसान से उबर पाएंगे। किसानों को नुकसान होने से उपभोक्ताओं पर वह बोझ पड़ना लाजिमी है।
