भारत विविध भाषाओं का देश है। यहाँ प्रत्येक भाषा का अपना विशिष्ट सम्मान और महत्व है। ऐसे देश में हिंदी एक संपर्क भाषा के रूप में भाषाई समन्वय की सेतु बनकर कार्य कर रही है। 10 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय (विश्व) हिंदी दिवस मनाने का आशय भी इसी समन्वय भावना को स्मरण करना है।
हिंदी किसी एक क्षेत्र तक सीमित भाषा नहीं है। जनता की आवश्यकताओं और पारस्परिक संवाद के माध्यम से इसका विस्तार हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी ने देशभर के लोगों को एक ही भावना में बाँधने का कार्य किया। इस ऐतिहासिक भूमिका को भुलाया नहीं जाना चाहिए। वर्तमान समय में भाषाई विषयों को राजनीतिक रंग देने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है, जिसे सावधानीपूर्वक समझने की आवश्यकता है। भाषाओं का सम्मान आवश्यक है, किंतु वह सम्मान राष्ट्रीय एकता को क्षति पहुँचाने वाला नहीं होना चाहिए। हिंदी को स्वीकार करने का अर्थ अन्य भाषाओं की उपेक्षा करना नहीं है।

हिंदी भारतीय संविधान में स्थान प्राप्त भाषा है। प्रशासन, शिक्षा और सार्वजनिक संवाद के क्षेत्र में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। देश के करोड़ों नागरिकों के लिए हिंदी द्वितीय भाषा के रूप में उपयोगी सिद्ध हो रही है। इस वास्तविकता को समझना और स्वीकार करना आवश्यक है। सांस्कृतिक दृष्टि से हिंदी भारतीय चेतना की प्रतीक है। इसने अन्य भाषाओं के शब्दों और भावों को आत्मसात कर स्वयं को और अधिक समृद्ध बनाया है। यही हिंदी की विशेषता है।
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अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस के अवसर पर यह स्पष्ट रूप से कहना आवश्यक है कि हिंदी के प्रति द्वेष राष्ट्रीय भावना के लिए घातक है। भाषाओं के बीच सम्मान, सहअस्तित्व और पारस्परिक स्वीकार्यता को सुदृढ़ करना चाहिए। यह भावना विकसित करनी होगी कि भाषाएँ हमें विभाजित करने के लिए नहीं, बल्कि जोड़ने के लिए हैं। हिंदी के प्रति द्वेष नहीं, बल्कि समझ और संवेदनशीलता की आवश्यकता है। यही भारत की मजबूती का मूल आधार है। हिंदी भारतीय एकता का अक्षर–रूप है। इसे समझना ही सच्ची देशभक्ति है।

— कमलेकर नागेश्वर राव ‘कमल’
कवि, लेखक, अनुवादक
