हैदराबाद (सरिता सुराणा की रिपोर्ट) : सूत्रधार साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, हैदराबाद, भारत द्वारा 72 वीं मासिक गोष्ठी का आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। संस्थापिका सरिता सुराणा के अनुसार यह गोष्ठी दो सत्रों में आयोजित की गई। उन्होंने गोष्ठी में उपस्थित सभी साहित्यकारों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन किया और संस्था की गतिविधियों के बारे में संक्षिप्त जानकारी प्रदान की। उन्होंने गुरुग्राम से वरिष्ठ गीतकार गोप कुमार मिश्र को गोष्ठी की अध्यक्षता करने हेतु वर्चुअल मंच पर सादर आमंत्रित किया। हर्षलता दुधोड़िया ने बहुत ही मधुर स्वर में सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की।
प्रथम सत्र में डॉ. हरिवंशराय बच्चन की जयंती के अवसर पर विशेष परचर्चा आयोजित की गई। सरिता सुराणा ने बच्चन जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर अपनी भूमिका प्रस्तुत करते हुए कहा कि वे छायावादोत्तर काल के प्रमुख कवियों में से एक थे। उन्होंने सन् 1952 में विलियम बटलर यीट्स के साहित्य पर कैंब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। स्वदेश लौटने के बाद वे आकाशवाणी के प्रोड्यूसर बने और फिर सन् 1955 में प्रधानमंत्री नेहरू जी ने उन्हें विदेश मंत्रालय में ‘हिन्दी विशेषाधिकारी’ के रूप में नियुक्त किया।

सन् 1966 में राष्ट्रपति द्वारा उन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया। सुनीता लुल्ला ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सन् 1969 में जब वे काॅलेज में पढ़ती थीं तो उन्होंने बच्चन जी की मधुशाला को आमने-सामने सुना है। उनके पास उनकी बहुत-सी पुस्तकें आज़ भी मौजूद हैं, जिनमें निशा निमंत्रण प्रमुख है। दर्शन सिंह ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि मधुशाला बच्चन जी की अमर कृति है। वे उस समय के सर्वश्रेष्ठ और लोकप्रिय मंचीय कवि थे।
अध्यक्षीय टिप्पणी देते हुए गोप कुमार मिश्र ने कहा कि सभी ने बच्चन जी के बारे में सारगर्भित बातें बताई, सभी बधाई के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि बच्चन जी ने कभी अपने जीवन में शराब को नहीं छुआ था लेकिन उन्होंने ‘मधुशाला’ जैसी अमर कृति की रचना की। उन्होंने कहा कि मधुशाला के शाब्दिक अर्थ को न देखकर हमें उसके दार्शनिक और आध्यात्मिक पक्ष को देखना चाहिए। उन्होंने मधुशाला की रुबाइयों का सस्वर पाठ प्रस्तुत करके सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने इस परिचर्चा गोष्ठी के आयोजन हेतु मंच को बधाई दी।
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द्वितीय सत्र में अशोक दोशी ने नशा मुक्ति विषय पर अपनी घनाक्षरी प्रस्तुत की और सर्दी पर अपना एक गीत सुनाया। अंशु श्री सक्सेना ने अपनी छंदमुक्त रचना – मोगरे का महकता संसार प्रस्तुत करके सबको रोमांचित कर दिया। दर्शन सिंह ने अपने चिर-परिचित अंदाज में अपनी रचना – परछाइयां प्रस्तुत की। सुनीता लुल्ला ने कुण्डलिया छंद और गज़ल प्रस्तुत की। मुम्बई से नवल किशोर अग्रवाल ने अपनी रचना – एक हाथ से क्या कभी ताली बजती है? प्रस्तुत की। सरिता सुराणा ने अपनी रचना – देवी ना बनाओ मुझे/मानवी ही रहने दो/मुझे बेटी बनकर जीने दो सुनाकर सभी को भावविभोर कर दिया।
गोप कुमार मिश्र ने अध्यक्षीय काव्य पाठ करते हुए प्रदीप छंद में लिखे गए, गाँव पर अपने मार्मिक गीत- हर घर में तुलसी का चौरा/घनी नीम की छाँव रे/नैनों में काजल बन बसता/ऐसा मेरा गाँव रे, की सस्वर प्रस्तुति दी। साथ ही साथ सभी रचनाकारों की प्रस्तुतियों पर अपनी सारगर्भित टिप्पणी प्रस्तुत की। श्रीमती तृप्ति मिश्रा और श्रीमती अमिता श्रीवास्तव भी गोष्ठी में उपस्थित थीं। अंशु श्री सक्सेना ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया।
