तेलंगाना में एमएलसी चुनाव में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। वहीं बीजेपी ने तीन में से दो एमएलसी सीटें जीतकर अगले चुनाव में तेलंगाना में डबल इंजन सरकार बनाने का सपना देख रही है। तेलंगाना में एमएलसी चुनाव के लिए 27 फरवरी को मतदान हुआ था। बीजेपी समर्थित उम्मीदवार मल्का कोमरय्या को मेदक-निजामाबाद-आदिलाबाद-करीमनगर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से एमएलसी चुना गया। वरंगल-खम्मम-नलगोंडा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की एमएलसी सीट पीआरटीयू (Progressive Recognized Teacher’s Union Telangana State) के उम्मीदवार पिंगिली श्रीपाल रेड्डी जीत गये। भाजपा उम्मीदवार अंजी रेड्डी ने करीमनगर-मेदक-निजामाबाद-आदिलाबाद स्नातक एमएलसी चुनाव में जीत हासिल की है। बीजेपी ने तीनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जबकि सत्ताधारी कांग्रेस ने केवल स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव लड़ा और हार गई। बीआरएस इस चुनाव से दूर रही।
बीजेपी के नेता कह रहे है कि दो सीटों पर मिली जीत से उसका मनोबल बढ़ा है। अब वह साल 2028 में होने वाले अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए एक मजबूत विकल्प के रूप में देख रही है। केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी, बंडी संजय और अन्य बीजेपी नेताओं ने चुनाव में व्यापक प्रचार किया था। यूं कहना ठीक होगा कि पूरी ताकत झोंक दी थी। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बी महेश कुमार गौड़ और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में अपने पार्टी उम्मीदवार के समर्थन में प्रचार किया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेलंगाना में एमएलसी चुनाव जीतने वाले दोनों बीजेपी उम्मीदवारों को बधाई दी। बधाई संदेश में पीएम मोदी ने कहा कि मैं तेलंगाना के लोगों को एमएलसी चुनावों में @BJP4Telangana को इतना शानदार समर्थन देने के लिए धन्यवाद देता हूं। हमारे नवनिर्वाचित उम्मीदवारों को बधाई। मुझे अपने पार्टी कार्यकर्ताओं पर बहुत गर्व है जो बड़ी लगन से लोगों के बीच काम कर रहे हैं। बीजेपी तेलंगाना अध्यक्ष किशन रेड्डी ने भी कहा कि तेलंगाना के लोगों के फैसले से हमारी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। युवाओं और शिक्षकों ने लोगों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं करने पर कांग्रेस को दूर कर दिया है। आने वाले दिनों में तेलंगाना में बीजेपी सरकार आएगी। नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में तेलंगाना में डबल इंजन सरकार बनेगी।
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मीडिया में खबरें आई है कि हर दल ने इस एमएलसी चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाया है। एक वोट के लिए एक से पंद्रह हजार रुपये तक बांटे गये हैं। जहां कहीं पैसे बांटे नहीं गये, वहां वोटरों ने चुनाव में हिस्सा नहीं लिया। ये वोटर यह कहकर रूठकर बैठ गये कि उन्हें पैसे नहीं मिले हैं। जब पैसे बांटे गये और आश्वासन दिया तब जाकर वोट दिया है। इस चुनाव में ध्यान देने और सबसे ज्यादा शर्म करने वाली बात यह है कि ये वोटर स्नातक और शिक्षक है। ये वोटर समाज में पढ़ें-लिखे और बुद्धिजीवी के रूप में जाने जाते हैं। इन वोटरों से देश के उज्जवल भविष्य की उम्मीद की जाती है। एक स्नातक और शिक्षक वोट के लिए पैसे लेता है तो एक कुली, दिहाड़ी मजदूर, खेतीहर मजदूर, घरों में बर्तन साफ करने और कपड़े धोने वाले वोट के लिए पैसे मांगते या लेते है तो गलत क्या है?
सबसे अहम बात यह है कि करीमनगर जिला एक जमाने में नक्सलियों का गढ़ माना जाता था। यहां से अनेक युवक बड़े-बड़े नक्सली नेता बनें है। इसीलिए इस जिले के निवासी होने में गर्व महसूस करते हैं। क्योंकि अन्याय के खिलाफ लड़ने और आवाज उठाने वाले इस जिले से आते है। साल 1969 से आरंभ हुआ तेलंगाना आंदोलन की जननी भी करीमनगर जिला रहा है। ऐसे जिले में संसद चुनाव में आदिलाबाद, निजामाबाद और करीमनगर में बीजेपी के तीन उम्मीदवार विजयी हुए हैं। कुछ विधायक भी चुने गये हैं। यह बीजेपी के लिए हर्ष की बात हो सकती है। आम लोगों को यह जीत क्या संदेश देती है। यह चुनाव यह संदेश यह संकेत देता है कि आने वाले चुनाव में बीजेपी प्रभावित करेगी। इसीलिए इस चुनाव पर विचार करने की जरूरत है।
स्नातक एमएलसी चुनाव में अंजी रेड्डी को 75 हजारे से अधिक, कांग्रेस के उम्मीदवार को 70 हजार से अधिक और बीएसपी उम्मीदवार प्रसन्न हरिकृष्णा को 60 हजारे से अधिक वोट मिले हैं। प्रसन्न को उम्मीद थी कि कांग्रेस पार्टी उसे टिकट देगी। हालांकि, ऐसा नहीं हुआ। अगर कांग्रेस पार्टी प्रसन्न हरिकृष्णा को टिकट देती तो उसकी जीत बहुत आसान हो जाती। यहां कांग्रेस की गलती से उसकी हार हुई है। इसी तरह अन्य चुनाव के नतीजे का भी कुछ ऐसा ही हाल है।
ध्यान देने और सोचने वाली बात यह है कि तेलंगाना में वोटरों में हजारों रुपये बांटने की प्रथा हुजूराबाद निर्वाचन क्षेत्र से ज्यादा हो गई है। इस निर्वाचन क्षेत्र में तत्कालनी सरकार और अन्य दलों ने एक वोट के लिए दस हजार से अधिक रकम बांटी थी। वोटरों ने खुलेआम पैसों की मांग की थी। जब शाम तक पैसे दिये तो वोटर्स वोट डालने नहीं गये थे। यह खेद कि बात है कि तब लोकतंत्र की रखवाले कह जाने वाले किसी भी तंत्र ने किसी के खिलाफ भी किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं की। इस एमएलसी चुनाव में भी धड़ल्ले से पैसे बांटने का खेल आखें बंद करके सभी तंत्र देखते रह गये। जैसे महात्मा गांधी के तीन बंदर लोगों को संदेश देते हैं।
दुनिया में सबसे बड़े लोकतंत्र कह जाने वाले भारत के वोटर इसी तरह पढ़े-लिखे भी बिकते गये तो भावी पीढ़ी के भविष्य का क्या होगा। कानून बनाने वाले ही कानून तोड़े तो सजा कौन देगा और यह दोष किसका है? यह कब तक ऐसा जारी रहेगा? इसीलिए वोटरों से मार्मिक अपील है कि वे समय रहते जाग जाये। वर्ना जिस तरह से प्रकृति का संतुलन बिगड़ता जा रहा है, उसी तरह देश के बड़े लोकतंत्र ता भी संतुलन बिगड़ जाने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। सावधान!
