राष्ट्रसंत गाडगे महाराज की 150वीं जयंती की तैयारियां जोरों पर, सबको आकर्षित कर रहा है ‘WORDD’

हैदराबाद/लखनऊ : वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन फॉर रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑफ धोबी (WORDD) उत्तर प्रदेश के नेतृत्व में राष्ट्रसंत गाडगे महाराज की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में आगामी 22 फरवरी को एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया जाएगा। संगोष्ठी आयोजक नरेंद्र दिवाकर ने ‘तेलंगाना समाचार’ को बताया कि एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी की तैयारियां जोरों पर जारी है। इसके कार्यक्रम के स्थल, समय और अन्य जानकारी दी जाएगा।

दिवाकर ने आगे बताया कि इस संगोष्ठी में संत गाडगे का व्यक्तित्व, कृतित्व, दर्शन एवं सामाजिक आन्दोलन विषय पर विस्तार से विचार-विमर्श किया जाएगा। मुख्य रूप से बाबा संत गाडगे के विषय में महात्मा बुद्ध, महात्मा कबीर की परम्परा में महात्मा फुले एवं डॉ. अम्बेडकर के समान बीसवीं सदी के समाज-सुधार आन्दोलन में जिन महापुरूषों का विशेष योगदान रहा है। उसमें संत गाडगे बाबा का नाम बुद्धिजीवियों के बीच ओझल रहा है, किन्तु इधर कुछ वर्षों से विद्वानों का ध्यान इस ओर गया।

मुख्य रूप से गाडगे बाबा गृह त्याग कर जिस प्रकार से मानवता की भलाई का बीड़ा उठाया वह बहुत सरल नहीं था, क्योंकि उनका भोजन-पानी, सोना, चांदी के बर्तन में नहीं बल्कि मिट्टी के बर्तन में होता था। इसलिए उन्होंने अपने साथ सदैव मिट्टी (गडगा) का बर्तन रखा। अच्छा कपडा नहीं, पैरों में चप्पल नहीं, जहाँ भी गंदगी देखते वहीं सफाई में लग जाते। साथ ही जनता में जागरूकता हेतु झाड़ू से मलिन बस्तियों की सफाई करते एवं कीर्तन के माध्यम से लोक कल्याण हेतु संत कबीर, संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर आदि के पदों का गायन भी करते थे।

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गाडगे महाराज का सबसे बडा योगदान समाज वंचित तबके के लिए शिक्षा, समानता और स्वच्छता के लिए प्रेरित कर उन्हें धर्मान्धता, पाखंड और अंधविश्वास से मुक्ति की राह दिखाना था। उन्होंने सिद्ध करके दिखाया कि विषमता का सबसे बडा कारण कुरीतियाँ, कुप्रथाएं, अन्धविश्वास, धार्मिक पाखंड एवं अशिक्षा है। इसलिए अन्य बहुजन चिंतकों के समान उन्होंने भी शिक्षा और स्वच्छता पर विशेष बल दिया। यही कारण है कि महाराष्ट्र में उनके नाम पर अनेक धर्मशालाएं, गोशालाएं, महिलाश्रम, वृद्धाश्रम, विद्यालय एवं छात्रावास का निर्माण हुआ है। डॉ. अम्बेडकर भी उनके कार्यों से प्रभावित थे और समय-समय पर उनसे मंत्रणा किया करते थे।

संगोष्ठी के विषय में बाबा गाडगे का जीवन संघर्ष बहुतायत समाज को प्रेरित करने वाला है, जो महाराष्ट्र की भूमि से निकलकर सम्पूर्ण देश को समता, समानता, सामाजिक न्याय और भाई-चारा का सन्देश देता है। साथ ही उनके द्वारा चलाए गए स्वच्छता, शिक्षा एवं जागरूकता, अभियान समाज के लिया मिसाल बना। इतना सब होने के बावजूद गाडगे बाबा के योगदान से आज भी विस्तृत फलक अपरिचित है। जिसकी समाज को गंभीरतापूर्वक जानने व समझने की जरूरत है। इसलिए उनके विचारों को गहन अध्ययन की दृष्टि से पड़ताल की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए इस संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। जिससे समाज अवश्य लाभान्वित होगा साथ ही ज्ञान परम्परा का विस्तार भी। यह एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संत गाडगे महाराज के विचारों को अकादमिक विमर्श के केंद्र में लाने का एक गंभीर प्रयास है।यह संगोष्ठी इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, दर्शन, समाजकार्य, स्त्री अध्ययन, शिक्षा एवं दलित अध्ययन जैसे विषय क्षेत्रों के अंतर्विषयी विमर्श को प्रोत्साहित करेगी।

संगोष्ठी का उद्देश्य के बारे में दिवाकर ने कहा कि संत गाडगे महाराज के सामाजिक, धार्मिक एवं शैक्षिक विचारों का अकादमिक पुनर्मूल्यांकन करना। बहुजन–दलित समाज सुधार आंदोलनों की वैचारिक परंपरा में गाडगे महाराज के योगदान को रेखांकित करना। जाति, अंधविश्वास, पाखंड एवं सामाजिक असमानता के विरुद्ध उनके संघर्ष को समकालीन संदर्भ में समझना। युवा शोधार्थियों, शिक्षकों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को वैकल्पिक इतिहास लेखन हेतु मंच प्रदान करना।

गौरतलब है कि WORDD संगठन की स्थापना वर्ष 2010 में अनौपचारिक शुरुआत समाज में सकारात्मक बदलाव की ओर अग्रसर करने के उद्देश्य से की गई थी। 2015 से सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप्प के एक समूह के जरिए समुदाय के तरक्की पसंद युवाओं के साथ गांव-गांव जाकर जागरूकता बैठकों के माध्यम से शैक्षणिक, वैचारिक, सामाजिक बदलाव आदि के लिए प्रयासरत रही। यह संस्था शुरू से ही यह मानती रही है कि वास्तविक विकास केवल भौतिक उन्नति से नहीं, बल्कि शैक्षिक जागरूकता, सामाजिक संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों के सुदृढ़ीकरण से संभव है। अपने स्थापना काल से ही WORDD संगठन ने समाज में व्याप्त रूढ़ियों, अपव्यय और दिखावे के विरुद्ध वैकल्पिक, सार्थक और जनकल्याणकारी सोच को बढ़ावा दिया। कोरोना काल/लॉकडाउन जैसे कठिन समय में संस्था ने जरूरतमंदों तक अनाज और आवश्यक सामग्री पहुँचाकर मानवता की मिसाल पेश की। उस समय जब बहुत से लोग असहाय थे, WORDD संगठन ने सेवा और सहयोग को अपना धर्म बनाया।

संस्था की एक महत्वपूर्ण पहल रही “बुके के स्थान पर बुक” जिसके माध्यम से फूलों पर होने वाले अनावश्यक खर्च की जगह पुस्तकों को प्रोत्साहित किया गया, ताकि ज्ञान का प्रसार हो और नई पीढ़ी शिक्षित व जागरूक बने। इसी प्रकार भव्य शादियों में लिफाफा देने की परंपरा के स्थान पर अस्पतालों और जरूरतमंदों की सहायता जैसी सोच को समाज के सामने रखा गया, जिसने लोगों को दिखावे से हटकर सेवा की ओर सोचने के लिए प्रेरित किया। सामाजिक धरोहरों के संरक्षण, जीर्णोद्धार, नव निर्माण आदि कार्यों के जरिए अपने समाज के पुरखों की विरासत को सँभालने का प्रयास जारी है।

WORDD संगठन ने पुस्तकालयों की स्थापना कर शिक्षा को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने का कार्य किया। इसके साथ ही तेरहवीं जैसे खर्चीले और रूढ़िवादी कर्मकांडों के बहिष्कार का संदेश देकर सादगी, विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व को बढ़ावा दिया। समय-समय पर प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और विभिन्न क्षेत्रों में अपना परचम लहराने वाले युवाओं को प्रोत्साहित करने तथा आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों व गंभीर रोगियों की मदद करने व उन्हें अपने मुकाम हासिल करने हेतु सुदूर क्षेत्र तक भेजने में भी भूमिका निभाई। छात्रों के लिए किराए का कमरा लेकर भी उन्हें रहने को दिया गया जिससे वे अपनी शिक्षा निर्बाध जारी रख सकें। ऐसी तमाम पहलों/प्रयासों का प्रभाव यह रहा कि समाज में न केवल चर्चा हुई, बल्कि व्यवहारिक बदलाव भी देखने को मिला और लोग साथ आते गए और कारवां बढ़ता ही जा रहा है।

शैक्षणिक व सामाजिक परिवर्तन के सद्प्रयासों को और अधिक संगठित व प्रभावी रूप देने के उद्देश्य से WORDD संगठन को वर्ष 2025 में औपचारिक रूप से पंजीकृत किया गया। आज WORDD संगठन केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक विचार, एक आंदोलन और एक सामाजिक चेतना बन चुका है, जो समाज को अपव्यय से सेवा की ओर, अंधविश्वास से विवेक की ओर और दिखावे से वास्तविक मानव कल्याण की ओर ले जाने के लिए निरंतर कार्यरत है और समाज के विभिन्न वर्गों के साथ जुड़ने व कार्य करने के लिए सदैव तत्पर रहेगा। ऐसे महान संत गाडगे बाबा का जन्म 23 फरवरी, 1876 ई. को महाराष्ट्र के अमरावती जिले की तहसील अंजन गांव सुरजी के शेंगाँव नामक गांव में हुआ था। उनके माता का नाम सखूबाई और पिता का नाम झिंगरा जी था। अन्तत: ऐसे महापुरूष का देहावसान 20 दिसम्बर, 1956 को हो गया, परन्तु उनके विचार हमारे लिए किसी औषधि से कम नहीं है।

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