पुणे (महाराष्ट्र): पुणे के बावधन इलाके में रहने वाली 26 वर्षीय वैष्णवी हगवणे की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि वैष्णवी को दहेज के लिए लंबे समय से प्रताड़ित किया जा रहा था। इस मामले में उसके पति, सास, ननद, ससुर और देवर के खिलाफ गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया है।
51 तोला सोना, लग्जरी कार और 2 करोड़ रुपये की मांग
पीड़ित परिजनों के अनुसार, ससुराल वालों ने वैष्णवी के मायके से दहेज में 51 तोला सोना, एक महंगी गाड़ी और 2 करोड़ रुपये नकद की मांग की थी। इन मांगों को पूरा न कर पाने पर वैष्णवी को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। स्थिति इतनी भयावह हो गई कि आखिरकार वैष्णवी ने दम तोड़ दिया।

तीन गिरफ्तार, दो फरार
पुलिस ने वैष्णवी के पति शशांक हगवणे, सास लता हगवणे और ननद करिश्मा को गिरफ्तार कर लिया है। जबकि ससुर राजेंद्र हगवणे और देवर सुशील हगवणे फरार हैं। दोनों की तलाश में टीमें लगातार कर रही हैं।
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राजनीतिक संबंध और निष्कासन
राजेंद्र हगवणे राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी (NCP) से जुड़े थे। जैसे ही मामला प्रकाश में आया, अजित पवार के नेतृत्व वाली NCP ने तुरंत उन्हें और उनके बेटे को पार्टी से निष्कासित कर दिया।
अधर में 10 महीने की मासूम बच्ची का भविष्य
वैष्णवी की मौत के बाद उसकी 10 महीने की बेटी हगवणे परिवार के रिश्तेदारों के पास है। महाराष्ट्र महिला आयोग ने हस्तक्षेप कर बच्ची को वैष्णवी के मायकेवालों को सौंपने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
सरकार और सामाजिक संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया
राज्यमंत्री आदिती तटकरे ने स्पष्ट किया कि जो भी पुलिस अधिकारी मामले में लापरवाह पाए जाएंगे, उनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जाएगी। वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता और महिला संगठनों ने पुणे में मोर्चा निकाला और “वैष्णवी को न्याय दो” जैसे नारे लगाए। साथ ही आंदोलनकारियों ने कहा कि यह केवल एक मामला नहीं, एक चेतावनी है। समाज और कानून दोनों को जगाने वाली है। वैष्णवी अब लौटेगी नहीं, लेकिन अगर हम सब मिलकर आवाज़ उठाएं, तो अगली वैष्णवी बच सकती है।
वैष्णवी हगवणे को भावपूर्ण श्रद्धांजलि
वैष्णवी का जाना केवल एक बेटी का खो जाना नहीं है, बल्कि यह समाज के उस कठोर और चुप्पी साधे हुए चेहरे को उजागर करता है, जहाँ ‘इज़्ज़त’ की आड़ में बेटियों को उनके दर्द के साथ अकेला छोड़ दिया जाता है। जब बेटी तकलीफ़ में थी, तब उसे समझाकर ससुराल भेज देना और ज़्यादा सहन करने की सलाह देना कहाँ तक सही था? एक पिता का मौन, एक मां की मजबूरी, और समाज की चुप्पी ये सभी किसी न किसी रूप में उसकी पीड़ा के भागीदार रहे।
सिर्फ ससुराल पक्ष ही नहीं, बल्कि वो हर रिश्तेदार, हर पड़ोसी, और हर वह इंसान जो उसकी चीखें नहीं सुन सका, दोषी है। अब समय है कि हम बेटियों को समझाने की नहीं, साथ देने की संस्कृति अपनाएँ। ईश्वर वैष्णवी की आत्मा को शांति दें और हम सबको इतनी हिम्मत दे कि अगली वैष्णवी की जान बचा सकें।
