भारत और भारतीय भाषाएँ एक दूसरे की परिपूरक हैं। भारत में भाषाएँ केवल बात सुन लेने, बात कह देने या बात को लिख देने का माध्यम भर नहीं हैं। इसके विपरीत भारत की प्रत्येक भाषा और उन भाषाओं से जुड़ी बोलियाँ भारतीय संस्कृति, सभ्यता, ज्ञान, विज्ञान, उत्सव आदि सभी को पहचान करने की क्षमता रखती हैं। भारत के ऋषि-मुनियों, आध्यात्मिक गुरुओं, शिक्षाविदों, दार्शनिकों ने समय-समय पर भारतीय भाषाओं के महत्व को प्रतिस्थापित किया है।
ऐसे ही महान दार्शनिक स्वामी विवेकानंद ने भी भारतीय भाषाओं तथा हिन्दी भाषा के महत्व को सुदूर विदेश तक पहुँचाया था। आज का दिन अति शुभ तथा गर्वित करनेवाला है। जहाँ आज एक तरफ तिथिनुसार स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन है। वहीं दूसरी तरफ आज ही ‘विश्व हिंदी दिवस’ भी है। भारत की राजभाषा हिंदी का प्रचार-प्रसार विदेश में करने के उद्देश्य से 10 जनवरी, 1975 को पहली बार नागपुर में ‘विश्व हिंदी सम्मेलन’ का आयोजन किया गया था। प्रश्न यह कि क्या इससे पहले विदेशी भूमि तक हिंदी के महत्व को पहुँचाने का प्रयास किसी ने नहीं किया। उत्तर होगा ‘हाँ’ अवश्य ही यह प्रयास अनेक विद्वानों, दार्शनिकों, शिक्षाविदों ने समय-समय पर किया। लेकिन आज की विशेष बेला में स्वामी विवेकानंद ने हिंदी के सम्मान के लिए क्या किया था? इस विषय की जानकारी प्राप्त करना उचित होगा।
सन् 1899 में अपने देश की भाषा के महत्व को स्वामी विवेकानंद ने अनोखे शैली में समझाया था। वे उस समय अमेरिका के दौरे पर थे, वहाँ एक अमेरिकन ने उनसे पूछा, ‘How are you Swami Ji?’ अमेरिकन को लगा कि स्वामी जी को अंग्रेजी नहीं आती इसलिए हिंदी में उत्तर दे रहे हैं। यही सोचकर अमेरिकन ने दूसरा सवाल प्रयास करके अपनी टूटी-फूटी हिंदी में पूछा लिया कि, ‘आपको अमेरिका कैसा लगा’? इस प्रश्न का उत्तर स्वामी जी ने कुछ इस प्रकार से दिया कि, ‘I am feeling good, your country is very beautiful’. अमेरिकन अचंभित हो गया। उसने पूछ ही लिया कि- स्वामी जी को जब अंग्रेजी आती है तो उन्होंने पहले हिंदी में उत्तर क्यों दिया? इस बार स्वामी जी ने सहज तरीके से समझाया, ‘जब आपने अपनी मातृभाषा में सवाल किया तो मैंने अपनी मातृभाषा में सवाल किया तो मैंने अपनी मातृभाषा का सम्मान किया। लेकिन जब आपने मेरी मातृभाषा का सम्मान करते हुए हिंदी में प्रश्न किया, तो मैंने आपकी मातृभाषा की इज्ज़त करते हुए अंग्रेजी में उत्तर दिया’।
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हाँ, बंगाली परिवार में जन्मे स्वामी विवेकानंद की मातृभाषा बांग्ला थी। लेकिन भारत में जन्में विवेकानंद की मातृभूमि भारत थी तो क्या भारत की सभी भाषाएँ उनकी मातृभाषा नहीं थी? अवश्य थी। बिना किसी नारे के, बिना किसी दिवस मनाने के चलन के स्वामी जी ने अपने जीवन के आदर्शों के द्वारा सभी भाषाओं और हिंदी के महत्व को बारंबार स्थापित किया। क्या उनका जन्मदिन पालन कर लेने से, क्या ‘विश्व हिंदी दिवस’ मना लेने से ही हमारा कर्तव्य पूरा हो जाता है? यह पावन बेला हमें सोचने का अवसर प्रदान कर रही है। भारत देश की ‘राजभाषा हिंदी’ को यथोचित सम्मान मिले और भारत देश की सभी राष्ट्रभाषाओं में रोजगार मिले, देश की जनता अपनी भाषाओं को लेकर गर्वबोध करें। इस ओर सचेत होकर आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

डॉ. सुपर्णा मुखर्जी (96032 24007)
हैदराबाद
