विशेष लेख : विश्व-मानचित्र के परिप्रेक्ष्य में हिंदी, ऐसे चला आ रहा है एक भाषिक प्रवाह

(वैश्विक प्रसार, भाषिक भूगोल और प्रथम स्थान का विश्लेषण)

किसी भाषा की वैश्विक स्थिति को केवल बोलने वालों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके भौगोलिक विस्तार, बहु-महाद्वीपीय उपस्थिति और पारस्परिक बोधगम्यता के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। विश्व-मानचित्र पर यदि हिंदी (हिंदुस्तानी/उर्दू शैली सहित) को देखा जाए, तो यह भाषा केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं, बल्कि एशिया, अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका और ओशिनिया (ऑस्ट्रेलिया) – पाँचों महाद्वीपों में फैली हुई दिखाई देती है। हिंदी/उर्दू/हिंदुस्तानी मौखिक स्तर पर अत्यधिक बोधगम्य है। इस कारण इसके भाषिक क्षेत्र को मानचित्र पर अलग-अलग नहीं, बल्कि एक संयुक्त भाषिक पट्टी (लिंगविस्टिक बेल्ट) के रूप में देखना अधिक यथार्थपरक है। विश्व-मानचित्र के दक्षिण एशियाई भाग में भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश का क्षेत्र इसका मूल और सघन क्षेत्र है।

हिंदी की बोधगम्यता की दृष्टि से, भारत को तीन भाषिक क्षेत्रों – क, ख और ग – में विभाजित कर हिंदी-ज्ञान की गणना की जाती है। डॉ. जयंती प्रसाद नौटियाल के शोध (2015 की रिपोर्ट) के अनुसार यह गणना इस प्रकार है-

क- क्षेत्र (11 हिंदीभाषी राज्य): लगभग 65.5 करोड़ हिंदी-मातृभाषा-भाषी,
ख- क्षेत्र (हिंदी से निकट भाषाएँ): लगभग 20.24 करोड़ हिंदी-ज्ञाता,
ग- क्षेत्र (हिंदीतर राज्य): लगभग 29.78 करोड़ हिंदी-ज्ञाता।

इस प्रकार केवल भारत में ही हिंदी जानने वालों की संख्या लगभग 116 करोड़ सिद्ध होती है। यह संख्या विश्व-मानचित्र के एक ही भौगोलिक खंड में हिंदी भाषा की असाधारण सघनता को दर्शाती है।

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विचारणीय है कि पाकिस्तान को यदि उर्दू का क्षेत्र माना जाए, तो भाषिक यथार्थ यह है कि प्रत्येक उर्दू भाषी व्यवहारतः हिंदी भी समझता है। एथ्नोलॉग के आँकड़ों के अनुसार विश्व में उर्दू जानने वालों की संख्या लगभग 17 करोड़ है। डॉ. नौटियाल के शोध में इन्हें हिंदी-ज्ञान में सम्मिलित करना भाषावैज्ञानिक दृष्टि से उचित माना गया है, क्योंकि अन्य भाषाओं के मामले में द्वितीय-भाषा वक्ताओं को इसी प्रकार जोड़ा जाता है। मानचित्रीय दृष्टि से यह दक्षिण एशिया में हिंदी/उर्दू/हिंदुस्तानी के एक संयुक्त भाषिक विस्तार को पुष्ट करता है।

विश्व-मानचित्र में मध्य पूर्व – विशेषतः संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, क़तर, कुवैत, बहरीन और ओमान – हिंदी/उर्दू/हिंदुस्तानी के प्रवासी भाषिक क्षेत्र (डायस्पोरा ज़ोन) के रूप में उभरता है। यहाँ हिंदी/उर्दू/हिंदुस्तानी न तो राजभाषा है और न ही शैक्षणिक माध्यम, किंतु दैनिक जीवन, श्रम, बाज़ार और सामाजिक संवाद में यह संपर्क भाषा बन चुकी है। यह क्षेत्र हिंदी के उस विस्तार को दर्शाता है, जो आजीविका-आधारित प्रवास से उत्पन्न हुआ है।

अफ्रीकी महाद्वीप के पूर्वी और दक्षिणी भाग – दक्षिण अफ्रीका, केन्या, तंज़ानिया, मॉरीशस और सेशेल्स – हिंदी के ऐतिहासिक प्रवासी क्षेत्र हैं। विशेष रूप से मॉरीशस में हिंदी को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। यह क्षेत्र यह स्पष्ट करता है कि हिंदी केवल आधुनिक प्रवास की भाषा नहीं, बल्कि औपनिवेशिक काल से चला आ रहा एक भाषिक प्रवाह है।

यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड्स, नॉर्वे, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा – आज ये क्षेत्र हिंदी के सांस्कृतिक और डिजिटल विस्तार के द्योतक बन गए हैं। यहाँ हिंदी साहित्य, कविता, फ़िल्म, मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से जीवित और सक्रिय है। अतः यह कहना अधिक सटीक होगा कि यह क्षेत्र भाषा की संस्थागत उपस्थिति से अधिक सांस्कृतिक उपस्थिति को रेखांकित करता है।

अगर फ़िजी, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, मलेशिया, सिंगापुर और जापान की बात करें, तो पता चलता है कि ये वे क्षेत्र हैं जहाँ हिंदी की उपस्थिति संख्यात्मक रूप से सीमित, किंतु स्थायी है। फ़िजी हिंदी इसका विशिष्ट उदाहरण है, जो हिंदी के एक स्थानीय रूप के की तरह विकसित हुई है।

डॉ. नौटियाल के शोध के अनुसार, यदि-

भारत में हिंदी-ज्ञाता (116 करोड़),
उर्दू-ज्ञाता (17 करोड़),
भारत के बाहर हिन्दी-ज्ञाता (एथ्नोलॉग के अनुसार 42 लाख),
तथा हिंदी बोलने वाले आप्रवासी (1.6 करोड़)
को जोड़ा जाए, तो विश्व में हिंदी जानने वालों की संख्या 135 करोड़ से अधिक सिद्ध होती है।

इस आधार पर तुलनात्मक रैंकिंग इस प्रकार बनती है:

  1. हिंदी — 135 करोड़
  2. अंग्रेज़ी — 126.8 करोड़
  3. मंदारिन — 116.8 करोड़

इन आँकड़ों से स्वतःसिद्ध है कि हिंदी तथ्यतः विश्व में प्रथम स्थान पर है।

निष्कर्षतः, विश्व-मानचित्र पर हिंदी एक ऐसे भाषिक क्षेत्र के रूप में उभरती है, जो
सघन (दक्षिण एशिया में),
विस्तृत (डायस्पोरा क्षेत्रों में),
और बहु-महाद्वीपीय (वैश्विक उपस्थिति में)

  • तीनों गुणों से युक्त है।

स्मरण रहे कि हिंदी का प्रश्न केवल भाषा-गणना का नहीं, बल्कि भाषिक न्याय और मानदंडों की समानता का प्रश्न है; और हिंदी/उर्दू/हिंदुस्तानी केवल भाषा नहीं, बल्कि विश्व-मानचित्र पर खिंची हुई जीवित सांस्कृतिक रेखा है।

ऋषभदेव शर्मा

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