13 अप्रैल सन 1919 के दिन घटित जलियांवाला बाग हत्याकांड के बारे में हम सभी जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि दक्षिण भारत भी इसी तरह के एक जलियांवाला बाग जैसी हत्याकांड की त्रासदी झेल चुका है। दक्षिण का जलियांवाला बाग आंध्र-प्रदेश की सीमा से महज 2 किलोमीटर दूर है। वहां पर यह त्रासदी 25 अप्रैल सन् 1938 को विदुरश्वत्था में हुई थी। यह जगह वर्तमान कर्नाटक राज्य के गौरीबिदानूर जिले में पड़ती है। विदुरश्वत्था तब मैसूर रजवाड़े के कोलार का एक गांव था। उस दिन अनंतपुर की सीमा से सटे एक बगीचे में कुछ स्वतंत्रता सेनानी एक सभा कर रहे थे और तभी उन पर वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाई थी और 32 स्वतंत्रता सेनानी उसमें शहीद हो गए थे। उनकी शहादत ने मैसूर राज्य में आजादी के आन्दोलन को और अधिक मजबूती प्रदान की। लोग ब्रिटिश शासन के खिलाफ सड़कों पर उतर आए और उनका यह संकल्प आजादी मिलने तक कायम रहा। उन शहीदों के सम्मान में विदुरश्वत्था में एक स्मारक बनाया गया।
झण्डा फहराने की कसम
ब्रिटिश राज के अधीन मैसूर राज्य के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विदुरश्वत्था ने गांधी के मार्ग को अपनाया था। यह वह समय था जब आजादी को लेकर कांग्रेस का संघर्ष अपने चरम पर था। तब मैसूर राज्य ने आदेश पारित किया था कि उनके अधिकार क्षेत्र में कोई भी राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराएगा। साथ में यह भी कहा गया था कि जो भी झंडा फहराने की हिम्मत करेगा उसे गोली मार दी जाएगी, लेकिन मैसूर के इस आदेश का विरोध करते हुए भोगराजू पट्टाभि सीतारामय्या, केटी श्याम, हारदेकर, सिद्धालिंगैया, केसी रेड्डी और अन्य कांग्रेसी नेताओं ने मंड्या जिले के शिवपुरा में आयोजित होने वाली कांग्रेस की बैठक के दौरान राष्ट्रीय ध्वज को फहराने का फैसला किया। उनके इस फैसले की जानकारी सरकार तक पहुंच गई और वहां पर पुलिस तैनात कर दी गई।
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ध्वज सत्याग्रह सभा का आयोजन
शोधकर्ता गंगाधर मूर्ति और स्मिता रेड्डी ने अपनी किताब ‘जलियांवाला बाग ऑफ कर्नाटक’ में विदुरश्वत्था नरसंहार के बाद की घटनाओं पर विस्तार से जानकारी दी है। उसमें लिखा गया है कि तीन दिवसीय बैठक के दौरान जब कांग्रेसियों ने झंडा फहराने की कोशिश की तो ब्रिटिश सैनिकों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। शिवपुर में उनके झंडा फहराने की कोशिशों को नाकाम कर दिया गया तो कांग्रेसी नेताओं ने 18 अप्रैल 1938 को राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए ‘ध्वज सत्याग्रह’ सभा का आयोजन किया। नेताओं ने कोलार जिले में घूम-घूमकर इस सभा का प्रचार किया। तब मैसूर सरकार ने दो किलोमीटर के दायरे में निषेधाज्ञा लागू करके किसी भी कार्यक्रम को आयोजित करने पर प्रतिबंध लगा दिया। तब चार दिनों तक कांग्रेसी नेताओं ने कोई गतिविधि नहीं की फिर एनसी नागी रेड्डी के नेतृत्व में हाथों में राष्ट्रीय ध्वज लिए नेताओं ने विदुरश्वत्था की ओर कूच किया। रास्ते में उन्होंने लोगों को पर्चे बांटे और सरकार के आदेश को तोड़ते हुए उन्हें ध्वज सत्याग्रह में जुड़ने की अपील की। लोग उनके साथ जुड़ते गए और आगे बढ़ते गए।
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और 32 लोग शहीद हो गये
दूसरी और कल्लूरू सुब्बाराव के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश के लोग भी उनके साथ मार्च कर रहे थे। पुलिस ने वहां पर पहुंच कर एनसी नागी रेड्डी और दूसरे नेताओं को गिरफ्तार करके चिकबल्लापुर कोर्ट में पेश किया और मजिस्ट्रेट ने उनसे माफी मांगने के लिए कहा। लेकिन उन्होंने माफी मांगने से इंकार कर दिया और उन्हें जेल में डाल दिया गया। इससे लोगों में गुस्सा और बढ़ गया। 25 अप्रैल सन् 1938 को गौरीबिदानुर और आस-पास के गांवों से सुबह साढ़े दस बजे के करीब लोग पहुंचने लगे। वहां पर करीब 25 हजार लोग झण्डा फहराने का इन्तजार कर रहे थे। सत्याग्रहियों ने तय समय से पहले ही झण्डा फहराने की सोची, लेकिन पुलिस ने अपनी बंदूकें उनकी ओर मोड़ दी। यह गोलीबारी दोपहर एक बजे शुरू हुई, जिसके कारण 32 लोगों की मौत हुई और लगभग 48 लोग घायल हुए। और इस तरह विदुरश्वत्था का वह बगीचा सत्याग्रहियों के शवों से कब्रिस्तान में बदल गया। इस हत्याकांड की सूचना जब महात्मा गांधी को दी गई तो उन्होंने कहा- “विदुरश्वत्था में आजादी के लिए अहिंसा का रास्ता चुनने वाले 32 शहीदों की शहादत जाया नहीं जाएगी।”
पटेल-मिर्जा समझौता
दीवान मिर्जा ने महात्मा गांधी को पत्र लिखकर इस मामले में दखल देने को कहा तो गांधी ने सरदार वल्लभ भाई पटेल और आचार्य कृपलानी की मैसूर भेजा। मैसूर के दीवान ने निषेधात्मक आदेशों को हटाने और नेताओं को रिहा करने की पटेल की मांग को मान लिया। इसमें तिरंगा फहराने पर जो रोक लगाई गई थी, उसे भी वापस ले लिया गया। इस समझौते को ‘पटेल-मिर्जा’ समझौते के नाम से जाना जाता है। ‘जलियांवाला बाग ऑफ कर्नाटक’ नामक किताब में इस बात का उल्लेख है कि मैसूर सरकार ने इस नरसंहार के बारे में 19 नवंबर 1938 को एक नोटिफिकेशन जारी किया था। बाद में मारे गए लोगों की याद में सन् 1973 में विदुरश्वत्था में एक स्मारक का निर्माण किया गया था। सन् 2004 में एक मकबरे और इमारत का भी निर्माण किया गया। उस इमारत के चारों ओर एक बाग तैयार किया गया, जिसे ‘वीर सौंध गार्डन’ का नाम दिया गया। साथ ही साथ स्वतंत्रता संग्राम से सम्बन्धित किताबों के लिए एक लायब्रेरी और विदुरश्वत्था नरसंहार से जुड़ी डॉक्यूमेंट्री दिखाने के लिए एक थियेटर भी बनाया गया है। ‘सत्याग्रह मैमोरियल डेवलपमेंट कमेटी’ के सदस्य गंगाधर मूर्ति के अनुसार भारत के स्वतंत्रता संग्राम के बारे में रुचि रखने वाले और शोधकर्ता छात्र भारी संख्या में यहां पर आते हैं।
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– सरिता सुराणा वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखिका हैदराबाद