जन जागृति गीत – वंदे मातरम्…!

भारत जाति को पराधीनता से मुक्ति दिलाने वाले गीत के रूप में वंदे मातरम् 150 वर्ष पूरे कर चुका है। इस ऐतिहासिक अवसर पर, सरकार ने 7 नवम्बर 2025 को सुबह 10 बजे पूरे देश में सामूहिक गीत-गायन का आयोजन करने का निर्णय लिया है। ये दो शब्द – वंदे मातरम्—सिर्फ गीत के शब्द नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्र की सांस हैं। गुलामी की जंजीरों में जकड़े देश को इस गीत ने नई ऊर्जा और चेतना दी। यही एक आवाज़ थी जिसने लोगों में स्वतंत्रता की उमंग जागाई और समूचे देश को एक धारा में बहाया।

वंदे मातरम् का अर्थ

वंदे मातरम्, इसमें वंदे संस्कृत भाषा का शब्द है। इसका हिंदी में अर्थ होता है नमन करना। वहीं मारतम एक इंडो-यूरोपीय शब्द है। इसका सही अर्थ ‘मां’ होता है। दोनों को मिला दिया जाए तो वंदे मातरम् का अर्थ होगा। मैं मां को नमन करता हूं या भारत माता मैं आपकी स्तुति करता हूं। इस गीत को सबसे ज्यादा मातृभूमि के प्रति जुनून बढ़ाने के लिए गाया जाता था। इसे भारत माता का गीत भी कहा जाता है।

वंदे मातरम् को साल 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था। इसे रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गाने के रूप में पेश किया। यह गीत 1896 में हुए अधिवेशन के बाद सबके जुबान में रट गया था। क्योंकि इसे पहली बार ही कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया था। यह धुन सुनते ही देशभक्ति का जुनून चढ़ जाता था। इसकी वजह से अंग्रेजों ने इस पर बैन लगा दिया था।

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वंदे मातरम् गीत का महत्व

भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए लड़ी गई लड़ाई करीब दो सौ वर्षों तक चली। इस लंबे संघर्ष में कितने ही योद्धाओं ने अपना धन, सम्मान और प्राण तक बलिदान किए। ऐसे महासमर में वंदे मातरम् गीत एक प्रेरक मंत्र बन गया। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि मनोबल, मातृभूमि प्रेम और आत्मविश्वास का असाधारण मिश्रण था।

गीत ही बन गया संघर्ष का रूप

निरंकुश ब्रिटिश शासकों द्वारा आंदोलनकारियों पर अत्याचार किए जाते थे। फिर भी बच्चे, बूढ़े, युवा, महिलाएँ सभी ने इसी गीत और इसी नारे के साथ अंग्रेज़ों के खिलाफ विद्रोह किया। कन्याकुमारी से कश्मीर तक यह गीत लोगों के दिलों में ज्वाला बनकर फैला। बिपिन चंद्र पाल ने इसे देशभर में प्रचलित किया। इस गीत ने भाषाओं, धर्मों, जातियों और क्षेत्रों के भेदभाव को मिटाकर समूचे देश को एक सूत्र में बाँध दिया।

वंदे मातरम् – गीत की भावना

“सजल-शोभित, सुफला-सुजल धरती को,
शीतल मलय पवन और हरे-भरे खेतों वाली माँ को वंदन।
शुभ्र चाँदनी से खिली रातों में स्निग्ध वृक्षों से सजी माँ को,
मधुर भाषा, मधुर मुस्कान, सुखदायिनी, वरदायिनी माँ को वंदन।
हे भारतमाता! तुम्हें वंदन।”

अगर पसंद है तो गाइए, नहीं तो छोड़ दीजिए

भाषा संबंधी आलोचनाओं के बावजूद, लेखक ने डटकर जवाब दिया- “अगर पसंद है तो गाइए, नहीं तो छोड़ दीजिए। इसकी महत्ता दुनिया जानेगी।” इसके बाद रवींद्रनाथ टैगोर ने गीत की आध्यात्मिकता को पहचानते हुए इसे मातृभूमि की देवी के रूप में लोगों के सामने प्रस्तुत किया। 1886 में कई सभाओं में स्वयं इसका गायन किया। 15 अगस्त 1947 को, आज़ादी के दिन, संसद में संगीतज्ञ ओम प्रकाश ने इस गीत का गायन किया।

राष्ट्रचेतना का सतत दीप

भारतीय संस्कृति में, “असतो मा सद्गमय”, “सत्यमेव जयते”, “जननी जन्मभूमिश्च”, “मा फलेषु कदाचन” जैसे वाक्यों के साथ-साथ पूरी दुनिया में आत्मचेतना, संघर्ष के लिए मार्क्स के नारे- इन सभी की तरह, “वंदे मातरम्” भी महौन्नत नारा है। यह भारतवासियों के हृदयों में सदैव प्रज्वलित अग्निशिखा है। यह गीत भारत जाति की पराधीनता से मुक्त करने वाला जागृति गीत है।

इस 150वें वर्ष के अवसर पर, केंद्र एवं राज्य सरकारों ने 7 नवम्बर को सुबह 10 बजे समूचे भारतवासियों को “वंदे मातरम्” का सामूहिक गायन करने का निर्देश दिया है। आज की पीढ़ी को चाहिए कि वे उस समय के बलिदानों की प्रेरणा के साथ देश की प्रगति और विकास के लिए पुनः समर्पित हों।

(वंदे मातरम् गीत का 150वाँ वर्ष के शुभ अवसर पर लेखक मेकिरि दामोदर के सहयोग से)

कमलेकर नागेश्वर राव ‘कमल’
कवि, लेखक, अनुवादक
9848493223

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