‘फाँसी’ तेलुगु अनुवाद का काम पुरा, छपाई के लिए भेजी गई एक मौत की सज़ा वाले क़ैदी की भावुक घटनाओं पर आधारित आत्मकथा

हैदराबाद : ‘फाँसी’ (एक बहुजन की आत्मकथा) तेलुगु अनुवाद संस्करण का काम लगभग पुरा हो चुका है और छपाई के लिए भेज दी गई है। आपको बता दें कि साल 2018 में फाँसी का लोकार्पण हुआ था। तब अनेक वक्ताओं ने फाँसी के तेलुगु अनुवाद की आवश्यकता बल दिया था। प्रमुख क्रांतिकारी लेखक और साहित्यकार अल्लम राजय्या जी इसके अनुवाद के लिए आगे भी आये थे। हालांकि, कुछ कारणवश चाह कर भी वे इसका अनुवाद नहीं कर पाये। अब पाठक इस तेलुगु पुस्तक पर उनके विचार भी जान पाएंगे।

तब से इस तेलुगु संस्करण के बारे में अनेक साहित्य-प्रेमी लगातार पूछते आ रहे हैं। लगभग सात साल बाद यह पुस्तक अब तेलुगु में आ रही है। इस पुस्तक का संशोधन कार्य प्रमुख क्रांतिकारी कवि निखिलेश्वर जी देखरेख में हुआ है और संपादक का काम एमेस्को पब्लिकेशन्स के स्थानीय संपादक डी चंद्रशेखर रेड्डी ने किया है। इन दो दिग्गज क्रांतिकारी साहित्यकारों के विचार भी पाठकों को पढ़ने को मिलने वाला है। इनके अलावा इस पुस्तक के अनुवाद डॉ कारम शंकर जी की सोच भी जान पाएंगे कि आखिर एक जिम्मेदार पद पर रहते हुए उन्होंने इस पुस्तक का अनुवाद क्यों और कैसे किया तथा अब क्या महसूस कर रहे हैं। इतना ही नहीं, फाँसी के लेखक को ‘रियल हीरो’ कहने वाले निर्देशम के संपादक याटकर्ला मल्लेश की निकली कलम की तेज धार – धार विचार भी पढ़ने को मिलेंगे।

इसके अतिरिक्त फाँसी के लेखक यानी के राजन्ना ने सामाजिक जीवन में आये अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। मुख्य रूप से रिश्ते-नातों का टूटना, आस-पड़ोस के लोग मदद के लिए आगे आना, हत्या का आरोप, पुलिस का रवैया, अदालत की मौत की सजा, मुशीराबाद जिला जेल के डिप्टी जेलर मौजेस की सलाह से अपील करना, जेल जीवन, जेल यातनाएं, जेल में नक्सलियों से भेंट, सुधारगृह (कारागार) में उच्च पढ़ाई, जेल में पं. गंगाराम जी से पहली मुलाकात, दक्षिण समाचार के संपादक मुनींद्र जी का परिचय और कार्यालय में काम करने के लिए बुलाना, डॉ बीआर अंबेडकर सार्वत्रिक विश्वविद्यालय के पीआरओ विश्वेश्वर रेड्डी से मिलना और इसी विश्वविद्यालय के दिवंगत कुलपति आरवीआर चंद्रशेखर राव की ओर से दैनिक वेतन नौकर देना, जैसे अनेक भावुक, भावनात्कम, वेदना और संवेदनाओं के सफर से अवगत होंगे।

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साथ ही, एक मुस्लिम परिवार ने लेखक के शादी के लिए समुदाय की लड़की के माता-पिता को कैसे समझाया, उसके गांव वालों ने लड़की के माता से क्या कहां और आखिर वह लड़की एक पूर्व फाँसी की सजा तक पहुंचने वाले कैदी से शादी करने के लिए कैसे मान गई। डेली हिंदी मिलाप के संपादक विनय वीर जी व सदाशिव शर्मा जी ने अपने पास काम करने का मौका कैसे दिया। इन महान व्यक्तियों की मदद से बेटी और बेटे को कैसे उच्च शिक्षा कर पाये। आजकल उनकी बेटी और बेटा कहां और क्या कर रहे हैं। लेखक के साथ जुड़ते गये अनेक व्यक्तियों के व्यक्तित्व का परिचय और रोचक जानकारी भी पढ़ने को मिलेगी।

सबके मुख्य बात, फाँसी पुस्तक जिंदगी के सफर में आने वाले उतार-चढ़ा में कभी भी न डगमगाते हुए आगे बढ़ने की समाज को संदेश देता है। इसी बात का दावा करते हुए लेखक ने अपनी आत्मकथा लिखी है, ताकि दुनिया को पता चल सके कि एक लोकतंत्र देश में गरीब लोग कैसे जीते हैं, कैसे मरते हैं और कैसे मारे जाते हैं। पुस्तक पढ़ते समय कभी-कभी अनायास ही आंखों से आंसू निकल आते हैं तो कभी कभी समाज पर क्रोध भी आता है। कुछ अधिकारी लेखक पर करुणा और दया भी दिखाते है। जैसे क्षमादान के लिए किये गये आवेदन पर महाराष्ट के जिलाधीश, पुलिस अधीक्षक और प्रोबेशन अधिकारियों की रिपोर्ट तुरंत रिहा करने की शिफारिश करना शामिल है। हर बहुजन को यह पुस्तक पढ़ने की सलाह देती है, क्योंकि इसमें उनकी जिंदगी का सफर शामिल है। कुल मिलाकर सच और झूठ का पर्दाफाश करने वाली यानी दूध का दूध और पानी का पानी कर देने वाली यह तेलुगु पुस्तक जल्द ही तेलुगु पाठकों के हाथों में होगी। बस अब थोड़ा इंतजार है।

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