विशेष लेख : एक खोज है नवरात्र पर्व-4, भौतिक परिवर्तन या…

(क) भौतिक परिवर्तन या वाह्य परिवर्तन:

नवरात्र का सीधा सम्बन्ध प्रकृति से है और प्रत्येक नवरात्र में प्राकृति का जलवायु परिवर्तन, ऋतु परिवर्तन, मौसम परिवर्तन स्वयं ही हो जाता है। चैत्र नवरात्र के बार “ग्रीष्म ऋतु” और शारदीय नवरात्र के बाद “शरद ऋतु” की शुरुआत…। ऋतुओं के अनुसार न केवल मानव की, अपितु प्रकृति की भी, सभी प्राणियों की, वनस्पतियों की भी वेशभूषा, रहन सहन में भी अपेक्षित परिवर्तन हो जाता है। इन परिवर्तनों को वाह्य परिवर्तन या भौतिक परिवर्तन कह सकते हैं।

यदि अद्वैत प्रधान “अक्षर पुरुष” से अपनी दृष्टि को वैविध्य प्रधान या संख्या प्रधान “प्रकृति” की ओर उन्मुख करें तो (9) संख्या की पूर्णता और नव शब्द की दिव्यता, दोनों की अलग अलग अपनी गहराई का पता चलता है। यहां “नव” संख्या वाचक भी है और शब्दवाचक भी। रात्र शब्द है काल वाचक (रात्रि समूह-काल विशेष का वाचक)। इस नवरात्र शब्द में संख्या और काल का अद्भुत सम्मिश्रण है। आचार्य पाणिनि इसी मत के पोषक माने जाते हैं-

नवानां रात्रीणां समाहार: नवरात्रं।
रात्रा: नहा: पुंसि संख्यापूर्वं रात्रम्।। (2/4/29)

इस प्रकार इस शब्द से जगत के सर्जन – पालनरूप “अग्नीषोमात्मकम जगत” के सिद्धान्त से इसके द्वन्द्व (मिथुन, युग्म) होने की पुष्टि होती है। नवरात्र में अखण्ड दीप जलाकर हम अपनी इस ‘नव’ संख्या पर रात्रि का जो अन्धकार, आवरण छा गया है, अप्रत्यक्षत: उसे सर्वथा हटाकर ‘विजया’ के रूप में आत्म-विजय का दीप प्रज्जवलित करना है।

शास्त्री मे मुख्यरूप से दो नवरात्र वर्णित हैं। पहला वार्षिक या वासन्तिक नवरात्र (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक और दूसरा- शारदीय नवरात्र (आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक)। उक्त दोनों नवरात्रों की सर्वमान्यता और प्रमुखता भी अकारण नहीं, सकारण है। मानव जीवन की प्राणप्रद ऋतुएं मूलतः 6 होने पर भी मुख्यतः दो ही हैं –

(1) शीत ऋतु (सर्दी)
(2) ग्रीष्म ऋतु (गर्मी)

आश्विन से शरद् ऋतु (शीत) और चैत्र से वसन्त (ग्रीष्म)। यह भी विश्व के लिए एक मिथुन (जोड़ा) बन जाता है। एक से गेहूं (अग्नि) तो दूसरे से धान या चावल (सोम)। इस प्रकार प्रकृति माता हमें इन दोनों नवरात्रों में जीवन पोषक अन्न के अग्नै सोम (अग्नि- सोम) के युगल का सादर उपहार देती है। पोषक गुणों के कारण ही “पृथ्वी” जमीन का टुकड़ा नहीं, मां है। प्रसिद्ध वैदिक “पृथ्वी सूक्त” में प्रकृति और पर्यावरण संबंधी सर्वोपयोगी अदभुत वर्ण है। जल भी पोषक होने से “वरुण देव” और पोषिका रूपा होने से “नदियां”, सरोवर भी पूज्य है, वृक्ष भी देव हैं और यह संवेदनशील वृत्ति हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञ बनाती है। उसे स्वच्छ और स्वस्थ बनाने का भाव जगाती है।

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पाश्चात्य देशों की भौतिकवादी भोगवृत्ति ने प्रकृति का अकूत दोहन कर प्राकृतिक असंतुलन की स्थिति उत्पन्न कर दिया है। जबतक प्रकृति के प्रति संवेदनात्मक मातृत्व भाव का प्रसार नहीं होगा, यह प्रकृति अत्यन्त भयावह और विनाशक भी हो जायेगी। जनसामान्य में इस संवेदना को भारतीय चिंतन और प्रकृति उपासना ही जागृत कर सकती है। हमारे विभिन्न पर्व त्यौहार प्रकृति से गहराई तक इसलिए जुड़ पाए कि प्रकृति भी देवी स्वरूपा ही है।

चारों नवारत्रियो में देवी उपासना प्रकारांतर से प्रकृति परिवर्तन का स्वागत ही है। ग्रीष्म और शरद दो प्रमुख ऋतु है। यही कारण है कि दो नवरात्रियों को बहुत प्रमुखता मिली। 1. नवगौरी या परब्रह्म श्रीराम का नवरात्र और 2. नवदुर्गा या सबकी आद्या महालक्ष्मी के नवरात्र सर्वमान्य हो गये।

डॉ जयप्रकाश तिवारी बलिया/लखनऊ, उत्तर प्रदेश
संपर्क सूत्र: 9453391020

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