तेलगु भाषियों के लिए संक्रांति चार दिन का प्रधान त्योहार है। संक्रांति के ठीक एक माह पूर्व अर्थात जब धनुर्मास का आरंभ होता है तब से दक्षिण भारत के घरों के आंगन बडी-बडी रंगोलियों से सजने लगती हैं (मार्गळि व्रत का आरंभ)। उन पर गाय के गोबर से छोटी-छोटी फुलझडी नुमा आकार की आकृतियां लगाकर फूलों से पूजा करती हैं। विशेष कर कन्याएं चारों ओर वलयाकार में घूमती हैं और गाने गाती हैं।
अन्नमाचार्य जी जैसे प्रसिद्ध कवियों की रचनायें और लोकगीतों को गाने की परंपरा है। अच्छा परिवार और रिश्तों के साथ-साथ सुंदर और गुणवान पति के लिए भी इसमें प्रार्थना होती है। गोबर की आकृतियों के लिए शब्द है- गोब्बि जो गोपी का देशज रूप है। यह पूरा महीना संपूर्ण दक्षिण भारत के वैष्णव मंदिरों में सुप्रभातम के स्थान पर आंडाल के नाम से विख्यात गोदादेवी (आल्वार) की रचना तिरुप्पावै पाशुरों का गान किया जाता है।

सूर्योदय से पूर्व ही घर – परिवारों में भी कृष्ण या विष्णु की पूजा कर प्रतिदिन तिरुप्पावै का एक पाशुरम याने एक छंद का गान करते हैं। रोज भगवान को विशेष पकवानों का भोग लगाया जाता है। गोपियों ने भी इसे कात्यायनी व्रत के नाम से आचरण किया था। उन्हीं गोपियों के प्रतिरूप मानकर गोब्बि का पूजन किया जाता है। ये सारे काम सूर्योदय से पूर्व ही संपन्न करते हैं।
वास्तव में तीस दिनों का यह कार्यक्रम जीवात्मा का परमात्मा की ओर अग्रसर होने की यात्रा है। संक्रांति का पहला दिन भोगी है। वैष्णव मंदिरों में गोदा देवी, जो भगवान रंगनाथ में समा गयीं थीं का विवाह स्वामी रंगनाथ के साथ संपन्न करते हैं। जीवात्मा और परमात्मा का मिलन है। संक्रांति सूर्य की उपासना और पितरों का तर्पण का दिन है।
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तीसरा दिन है कनुमा का, जो पशुपालन को महत्व देता है। गाय और बैलों को सजाकर पूजा करते हैं। खेती बाडी में लगे पशुओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना और उन्हें विश्राम देना है! इन्हीं तीस दिनों में बैलों को सजाकर घर-घर लाते हैं। इन्हें नादिया बैल अर्थात नंदीश्वर का प्रतिरूप मानते हैं।आंगन में पधारे नादिया को यथा शक्ति अनाज, कपडे, फल और उसके मालिक को रुपये-पैसे देकर आशीर्वाद लेने की प्रथा है। हरिदास गीत गाते हुए वीथियों में आते हैं। उन्हें भी यथा संभव दान देने की परिपाटी है। कनुमा के दिन विशेष रूप से रथ की रंगोली की प्रधानता है। उत्तरायण की ओर प्रयाण।
चौथा दिन मुक्कनुमा कहलाता है। रजक गण अपने नदी-नाले के घाट पर जाते हैं। रोज जिन धोबीघाट के पत्थरों पर कपडे धुलते हैं, उनकी पूजा करने की रिवाज है। उस दिन विश्राम और खूब खाना-पीना होता है। कृषि प्रधान देश होने के कारण पशुपालन और प्रकृति के माध्यम से दान-पुण्य करने की प्रधानता है। बेटी – दामाद और ससुराल वालों को घर पर बुलाकर आवभगत करते हैं। नेग देते हैं।

डॉ सुमन लता
