हर साल 8 मार्च को ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ मनाना अब एक वैश्विक महोत्सव बन गया है। भारत में तो यह महोत्सव इस सोच के साथ भी मनाया जाता है कि भारतीय स्त्रियाँ जितना भुगत रही है उतना कोई और नहीं भुगत रहा है। ऐसी स्थिति में यह जान लेना आवश्यक है कि सन् 1909 में न्यूयार्क की महिला मजदूरों ने कार्यस्थल की अमानवीय परिस्थितियों के विरुद्ध हड़ताल की थी। यह आंदोलन 11 सप्ताह चली। यह कामकाजी महिलाओं द्वारा की गई पहली संगठित हड़तालों में से एक थी।
इसके बाद सन् 1910 में कोपेनहेगेन में समाजवादी नेता क्लारा ज़ेटकीन ने महिलाओं की रजीनीतिक अधिकार को मुद्दा बनाकर, उनको आर्थिक असमानता से मुक्त करने की माँग को लेकर, शैक्षिक अवसरों की कमी क्यों है? इस प्रश्न को रखांकित करके साथ ही साथ लैंगिक न्याय, सामाजिक भेदभाव आदि विषयों को स्त्री अधिकारों और सुरक्षा के केंद्र में रखकर ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ को मनाने का आयोजन किया।
देखा जाए तो यह कोई उत्सव नहीं है बल्कि महिलाओं के द्वारा उनके ऊपर होनेवाले अत्याचारों का विरोध है। सन् 1911 में ऑस्ट्रिया, जर्मनी, डेनमार्क और स्विट्ज़रलैंड में पहली बार ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ मनाया गया और सन् 1975 में संयुक्त राष्ट्र ने इसे आधिकारिक मान्यता प्रदान की। सन् 1910 का पहला विरोध प्रदर्शन हो या सन् 1975 में संयुक्त राष्ट्र में इसे आधिकारिक मान्यता प्रदान करने की घटना आज सन् 2026 में जब ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ विश्वव्यापी महोत्सव बन गया है। दुख की बात यह है कि आज विश्व ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ के उद्देश्य और गरिमा को भूल गया है।
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एपस्टीन फाइल्स (Epstein Files) इस सत्य का ज्वलंत उदाहरण है। शक्ति, शोषण, धन और प्रभाव का दुरुपयोग करके विश्वभर की महिलाओं, किशोरियों और नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण किया जाता है। यह शोषण क्रूर से क्रूरतम अत्याचार की श्रेणी में आता है। विश्व के सामने दस्तावेज़ है। हालांकि, विश्व मौन है। यह दस्तावेज़ पितृसत्तात्मक सत्ता संरचना की उस मानसिकता को रेखांकित करती है, जिसमें महिलाओं के शरीर और अधिकार को नियंत्रित करने की इच्छा हमेशा प्रबल रहती है।
आज जब संपूर्ण विश्व युद्ध ग्रस्त है। ऐसी दशा में सेना द्वारा, आंदोलनकारियों द्वारा, आतंकवादियों द्वारा स्त्री शरीर को जघन्य तरीके से रौंदना आम बात हो चुकी है। फिर भी विश्व मौन है। मानवाधिकार संगठन मौन है। कोई कहता है कि पति अपनी पत्नी को तब तक पीट सकता है जब तक उसके शरीर से खून न निकाल जाए क्योंकि यह पति का अधिकार है, तो कोई कहता है स्त्री को हमेशा नकाब में रहने की आवश्यकता है यह तथाकथित ईश्वर, खुदा, God जाने क्या नाम दिया जाए उसी का आदेश है।
सभ्यता की चरम पराकाष्ठा के युग में एक तरफ ऐसे नियम तो दूसरी तरफ फिर वही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’। अगर बात केवल भारत की करें तो निर्भया कांड, R. J. KAR कांड, मणिपुर हिंसा के दौरान स्त्री को निर्वस्त्र घुमाना आदि ऐसी अनेकों घटनाएँ मिलेंगी। इनमें से कोई भी घटना प्राचीन घटना नहीं हैं। पिछले 10 सालों में भारत की जनता ने बलात्कार की जघन्य से जघन्यतम समाचारों को देखा-सुना है। फिर भी, सामाजिक मानसिकता में कोई बदलाव नहीं है। पीड़िता को ही दोषारोपण करना और न्यायिक विलंब जैसी घटनाएँ आम बात है।
मज़ेदार बात यह भी है कि अभी कुछ दिन पहले कहीं किसी ने भारत में ही न्यायिक राय दी कि- केवल स्त्री योनि पर वीर्यपात करना बलात्कार की श्रेणी में नहीं आएगा। स्त्री शरीर और मन की दशा को संपूर्ण विश्व में थूकदान से भी अधिक अस्तित्वहीन मन लिया गया है। बचा है केवल एक महोत्सव जिसे अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ कहा जाता है।
फिर भी महिलाएँ यह प्रश्न नहीं पूछती है कि ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ मनाने का औचित्य क्या है? क्या केवल कुछ शिक्षित महिलाओं, साहित्यकारों, अभिनेत्रियों, कुछ सफल महिला उद्यमियों को एक शॉल, मिष्ठान्न के साथ भाषणबाजी द्वारा स्टेज पर सम्मानित कर देने से ही ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है? ‘Epstein Files’ यह स्पष्ट करता है कि, ‘समानता का सिद्धांत तब तक अधूरा है, जब तक सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित न हो’। ऐसे में आवश्यक है कि ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ केवल प्रतीकात्मक न रहकर ठोस नीतिगत और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनें।

डॉ. सुपर्णा मुखर्जी
हैदराबाद
संपर्क : 96032 24007
