भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली लंबे समय से गुणवत्ता, समानता, सबकी पहुँच और उत्तरदायित्व जैसे प्रश्नों से दो चार होती रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की 1956 में स्थापना का मूल उद्देश्य ही उच्च शिक्षा में मानक निर्धारण और समन्वय स्थापित करना था। किंतु बदलते सामाजिक-आर्थिक संदर्भ, नई शिक्षा नीति-2020 तथा कैंपसों में उभरती असमानताओं और भेदभाव की शिकायतों ने UGC के पुराने ढाँचे को अपर्याप्त सिद्ध किया। इसी पृष्ठभूमि में यूजीसी अधिनियम 2026 को एक सुधारोन्मुख, समावेशी और दायित्वपरक कदम के रूप में देखा जा रहा है।

समानता और भेदभाव-निरोध पर यह प्रावधान कितना प्रभावी होगा, यह भविष्य के गर्भ में है। यह अधिनियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित, सामाजिक, लैंगिक तथा अन्य प्रकार के भेदभाव को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है और उन्हें दंडनीय बनाता है। इसके माध्यम से प्रत्येक विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय में समान अवसर केंद्र अथवा Equal Opportunity Centre (EOC) की स्थापना को अनिवार्य किया गया है, जो शिकायत निवारण, निगरानी और विद्यार्थियों में जागरूकता का केंद्र होगा।
UGC के नए नियम ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए 15 जनवरी 2026 से लागू हुए हैं, जो जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए अनिवार्य कमेटियां (Equity Committee) बनाकर आधुनिक शैक्षणिक समानता पर जोर देते हैं। यह परंपरागत भारतीय शिक्षा के विपरीत है। छान्दोग्य उपनिषद में सत्यकाम और उनकी माँ जबाला का उदाहरण यह दर्शाता है कि जिस देश में ज्ञान प्राप्ति के लिए “सत्य” और “योग्यता” ही सर्वोच्च मापदंड माना गया हो, न कि जाति या वंश को, ऐसे में भय है कि यूजीसी का नया अधिनियम सामाजिक भेदभाव की खाईं को और अधिक बढ़ावा देगा।
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एक अनुभवजन्य उदाहरण इस संदर्भ में उल्लेखनीय होगा, सामान्य वर्ग की विद्यार्थी के शोध प्रबंध पर पिछड़े वर्ग के विभागाध्यक्ष द्वारा हस्ताक्षर नहीं किया जाता है, ऐसी स्थिति में वह विद्यार्थी किस समिति की ओर न्याय की गुहार लगाए? यद्यपि विद्यार्थी सामान्य वर्ग की है तो, उसमें जातिगत संस्कारों के कारण आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा हुआ है, जब वह प्रेस और मीडिया की सहायता लेने की बात करती है, और दूसरे ही दिन उसके शोध प्रबंध पर हस्ताक्षर कर दिया जाता है। पुनः उसके शोध रिपोर्ट को रोकते हुए उससे स्नातक के एक पेपर के पाठ्यक्रम सामग्री को लिखने के लिए कहा जाता है, और इस बार वह मीडिया की बात नहीं करती है। इस बार वह सामग्री विभागाध्यक्ष के नाम से लिखती है, इस प्रकार उसे शोध निष्णात की उपाधि प्राप्त हो जाती है।
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नए अधिनियम के द्वारा संस्थागत जवाबदेही को निश्चित करते हुए पहली बार कुलपति/संस्थान प्रमुख को सीधे तौर पर यह उत्तरदायित्व सौंपा गया है कि परिसर में समानता और गरिमा का वातावरण सुनिश्चित करें। इसके अंतर्गत निगरानी और दंड की व्यवस्था की गई है। इसके अंतर्गत इन नियमों का अनुपालन न करने वाले संस्थानों के अनुदान यूजीसी रोक देगा। साथ ही उनके पाठ्यक्रमों की मान्यता रद्द करते हुए गंभीर मामलों में डीरिकग्निशन जैसे कड़े प्रावधान किए गए हैं।
यूजीसी अधिनियम 2026 का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि यह सामाजिक न्याय को नीतिगत स्तर पर संस्थागत रूप देता है। SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक और वंचित वर्गों के विद्यार्थियों को अब केवल आरक्षण ही नहीं, बल्कि सम्मानजनक और सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है। इसके माध्यम से शिक्षा को केवल डिग्री प्राप्ति का साधन न मान कर सामाजिक सशक्तिकरण का माध्यम बनाया जा सकता है।
कैंपस संस्कृति में परिवर्तन करने के उद्देश्य से बनाए गए नियम के द्वारा अब विश्वविद्यालयों में वंचितों के साथ मौन भेदभाव, अकादमिक उपेक्षा, सामाजिक अलगाव जैसी समस्याओं को “व्यक्तिगत मामला” कहकर टाला नहीं जा सकेगा। यह अधिनियम संवेदनशील, लोकतांत्रिक और संवादपरक कैंपस संस्कृति को प्रोत्साहित करता है। संस्थान प्रमुखों की जवाबदेही तय होने से निर्णय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनेगी, शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण होगा। “केवल काग़ज़ी समितियों” की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा। हालाँकि, इससे प्रशासनिक दबाव भी बढ़ेगा, जिसके लिए प्रशिक्षण और संसाधन आवश्यक होंगे। कुछ आलोचकों का मत है कि कठोर नियम अकादमिक स्वायत्तता को प्रभावित कर सकते हैं। परंतु व्यावहारिक रूप से यह अधिनियम स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व की अवधारणा को सुदृढ़ करता है। जहाँ तक शिक्षा का प्रश्न है, स्वतंत्रता बिना समानता के सार्थक नहीं हो सकती। एक सुरक्षित, सम्मानजनक और भेदभाव-मुक्त वातावरण में छात्र ड्रॉप-आउट कम होने के साथ ही शोध और नवाचार को बढ़ावा मिलेगा। प्रतिभा का सही उपयोग संभव हो सकेगा। इस प्रकार यह अधिनियम गुणवत्ता सुधार का सामाजिक आधार तैयार करता है।
यह तो हो गई बात इस नियम के सैद्धांतिक कार्यान्वयन को लेकर, अब व्यावहारिक पक्ष भी देखते हैं, ग्रामीण एवं संसाधन-विहीन संस्थानों में इसके कार्यान्वयन की सबसे अधिक समस्या है। कानून से पहले सामाजिक सोच को बदलना अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है। अन्य कानूनों की तरह यह भी रिपोर्टिंग औपचारिक न बन जाए, इसका ध्यान रखना बहुत जरूरी होगा।
यूजीसी अधिनियम/विनियम 2026 भारतीय उच्च शिक्षा को केवल प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक प्रयास है। यह अधिनियम भारतीय शिक्षा को संवैधानिक मूल्यों- समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय से जोड़ता है। यदि इसे ईमानदार क्रियान्वयन, संवेदनशील प्रशासन और सामाजिक चेतना के साथ लागू किया गया, तो यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अधिक मानवीय, समावेशी और भविष्य-उन्मुख बना सकता है।
अंत में एक बात का उल्लेख अवश्य करना चाहूँगी कि यदि आरक्षण के द्वारा समानता स्थापित की जा सकती, तो संविधान के लागू होने के 77 वर्षों बाद भी भारत की इस समस्या का निदान हो चुका होता। समस्या मानसिकता में है। हीनता बोध एक नासूर बन चुका है, जिसे दूर करने के बाद ही समरसता स्थापित की जा सकती है। ‘कामायनी’ के आनंद सर्ग में चित्रित जयशंकर प्रसाद की इन काव्य पंक्तियों के साथ अपनी लेखनी को विराम देती हूँ- “समरस थे जड़ या चेतन, सुंदर साकार बना था, चेतनता एक विलसती आनंद अखंड घना था”

डॉ. सुषमा देवी
एसोसिएट प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग,
बद्रुका कॉलेज, हैदराबाद, तेलंगाना,
मोबाइल:9963590938
[नोट– डॉ. सुषमा देवी जी का उपर्युक्त लेख हमें तीन-चार दिन पहले ही मिला था। उनका आग्रह था कि यह लेख 1 फरवरी अर्थात रविवार को प्रकाशित किया जाये ताकि छुट्टी के दिन ज्यादा से ज्यादा पाठक इसे पढ़ सकें। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय और कॉलेजों में भेदभाव को रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से जारी नए नियमों पर गुरुवार को रोक लगा दी है। पिछले काफ़ी समय से इन नियमों का विरोध हो रहा था। रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘यूजीसी प्रमोशन ऑफ़ इक्विटी रेग्युलेशंस 2026’ के प्रावधानों में प्रथम दृष्टया अस्पष्टता है और इनके दुरुपयोग की आशंका है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इन नियमों के लागू होने पर फ़िलहाल रोक लगा दी और सुझाव दिया कि विशेषज्ञों की एक समिति इन नियमों में खामियों पर विचार कर सकती है। भारत में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 13 जनवरी 2026 को नए नियम जारी किए थे। यह नियम इसी विषय पर 2012 में लागू किए गए नियमों की जगह जारी किए गए हैं। फिलहाल, साल 2012 में यूजीसी के बनाए गए नियम ही लागू रहेंगे।]
