विजयवाड़ा के इन छात्राध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए ‘हिंदी भाषा संचेतना शिविर’, वक्ताओं ने दिया यह सुझाव

हैदराबाद : केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद केंद्र द्वारा माचवरम, विजयवाड़ा में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, आंध्रप्रदेश के कॉलेज ऑफ प्रचारक विद्यालय (बी.एड.) के छात्राध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए1 से 12 मार्च तक 14वाँ हिंदी भाषा संचेतना शिविर आयोजित किया गया है। इस हिंदी भाषा संचेतना शिविर का उद्घाटन समारोह दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, माचवरम, विजयवाडा, आंध्र प्रदेश के सभागार में आयोजित हुआ।

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के निदेशक प्रो. सुनील बाबुराव कुलकर्णी ने आभासी माध्यम से की। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में के. पूर्णचंद्र राव, प्रथम उपाध्यक्ष, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, आंध्र एवं तेलंगाना, विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. के. चारुलता, प्राचार्य, हिंदी प्रचारक प्रशिक्षण विद्यालय, विजयवाड़ा उपस्थित रहे। केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद केंद्र के क्षेत्रीय निदेशक प्रो. गंगाधर वानोडे इस पाठ्यकम के संयोजक एवं सह-आचार्य डॉ. फत्ताराम नायक पाठ्यक्रम प्रभारी हैं।

मंच पर अतिथि अध्यापक डॉ. सी. कामेश्वरी एवं केंद्र की सदस्य डॉ. एस. राधा उपस्थित थे। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के अध्यापक, प्रथम वर्ष के बी. एड्. के छात्र-छात्राएँ तथा एम.ए. के विद्यार्थी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ फत्ताराम नायक, सह-आचार्य, केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद केंद्र ने किया। कार्यक्रम का उद्घाटन विधिवत रूप से दीप प्रज्वलन से हुआ। माँ शारदा वंदना के बाद संस्थान गीत सभागार में गूंज उठा। डॉ. एस. राधा ने मंच पर उपस्थित सभी अतिथियों का परिचय दिया।

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आभासी मंच से केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के निदेशक प्रो. सुनील बाबुराव कुलकर्णी जुड़े। प्रो. सुनील बाबुराव कुलकर्णी ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी कौशल को बढ़ाने की नितांत आवश्यकता है। हिंदीतर प्रांतों में ही इन कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है। हिंदी सीखने के लिए प्रयास आवश्यक है और इन शिविरों से लाभान्वित होने को कहा। भिन्न-भिन्न प्रांतों की भाषा को आत्मसात करते हुए प्रादेशिक भाषाओं में अपनी पकड़ अधिक होने के कारण अशुद्धियाँ हो रही हैं।

उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर इन्हें व्यक्त करने की आवश्यकता है। अपने प्रयास को कायम रखिए। प्रेरणा लेकर संचेतना शिविरों में लडाई के लिए तत्पर होने को कहा। तभी जीत कर सिकंदर कहलाओगे। जहाँ मार्गदर्शन चाहिए वहाँ हम देंगे। आप को संघर्ष करना होगा। उच्चारण, वाचन, वर्तनी को सुधारने की आवश्यकता है। प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाना है। कसौटी पर कसना है। संघर्ष, परिश्रम, अध्ययन करने की नितांत आवश्यकता है। तकनीक अनेक हैं। निराश मत होइए। बेरोजगारी, अभाव को प्रभावशाली बनाना है। मैथिलीशरण गुप्त की कविता- ‘नर हो, न निराश करो मन को’ याद करते हुए नई शिक्षा नीति के तहत त्रिभाषाओं को सीखने की आवश्यकता को भी समझाया।

मुख्य अतिथि पूर्ण चंद्र राव ने आर्शीवाद देते हुए, आभार व्यक्त करते हुए बताया कि वे 50 वर्षों से दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की परीक्षाओं के लिए विद्यार्थियों को तैयार करने के लिए हिंदी सिखा रहे हैं। विभिन्न स्तरों पर अपने अध्यापन के अनुभवों को साझा किया और विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए कहा और अतिथि व्याख्यानों से लाभान्वित होने को कहा। डॉ. के. चारुलता ने आशा व्यक्त करते हुए कहा कि छात्र इस पाठ्यक्रम को सुनने व पढ़ने से अवश्य लाभान्वित होंगे। यहाँ हो रहे संचेतना शिविर के लिए धन्यवाद दिया। प्रो. गंगाधर वानोडे ने कहा कि हिंदीतर भाषी विद्यार्थियों को हिंदी में बातचीत करते समय अपने उच्चारण पर अधिक ध्यान देना चाहिए। अन्य भाषा सीखते समय उच्चारण में मातृभाषा व्याघात होना आम बात है परंतु इसमें अभ्यास से सुधार किया जा सकता है तथा अनेक विधाओं में पारंगत हो सकते हैं। लेखन की अशुद्धियों में सुधार किया जा सकता है।

विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपनी अपेक्षाएँ व्यक्त की। शिक्षण को कैसे रोचक, अच्छा बनाने के लिए-उच्चारण, लेखन, व्याकरण, वर्तनी प्रौद्योगिकी में आए अनेक नवीनतम बिंदुओं से अवगत कराने को कहा। कार्यक्रम का सफल संचालन सह-आचार्य डॉ. फत्ताराम नायक द्वारा किया गया तथा डॉ. सी. कामेश्वरी ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।

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