सावित्री और सत्यवान की रोचक कथा आर्ष ग्रंथों में प्रतीक और कथानक दोनों रूपों में पाई जाती है। किंतु महाभारत में वर्णित सावित्री और सत्यवान की “प्रेम कथा” लोकमानस में इतनी अत्यधिक गहराई तक परिव्याप्त है कि हमरे देश की नारियों ने पति के दीर्घायु होने की कामना, श्रद्धा और विश्वास के कारण इस कथानक ने एक धार्मिक अनुष्ठान, एक कर्मकांड, एक लोकपर्व का व्यापक रूप ले लिया है।
देश के सभी भागों में यह कथा और कर्मकांड यदि थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ दिखता है (कहीं पूर्णिमा और कहीं अमावस्या को) तो भी यह कोई असामान्य बात नहीं है। क्योंकि यह क्षेत्र विशेष की अपनी मान्यताओं के कारण ऐसा है। सावित्री और सत्यवान की कथा वटवृक्ष के नीचे श्रद्धा पूर्वक सुनी जाती है और वटवृक्ष में कच्चे सूत के 108 घेरे लपेटे जाते हैं। इस प्रकार इस कथानक में सावित्री, सत्यवान, वटवृक्ष, कच्चे सूत और 108 की संख्या का अपना विशिष्ट महत्व है। सामाजिक जीवन, समाजशास्त्र में पति-पत्नी का आदर्श, त्याग, समर्पण और विवेक के साथ-साथ आत्मबल, बुद्धिकौशल का एक उत्कृष्ट आदर्श है।

पर्यावरणविदों के लिए पृथ्वी पर जीवन के लिए पेड़-वनस्पतियों के विभिन्न प्रजातियों के सम्वर्द्धन हेतु पूर्वजों द्वारा प्रेरक अभियान है तो आध्यात्मिक और दार्शनिक चिंतकों के ये आध्यामिक बिम्ब, प्रतीक और गुह्य सूत्र है। और प्रत्येक क्षेत्र में अपनी-अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए अपने-अपने प्रसिद्ध शास्त्रों की भी रचना की है।
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सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद डॉ. गणेश पाठक जी ने सावित्री वटपूजा के अवसर पर अपना अस्तित्व खोता ही जा रहा है राष्ट्रीय वृक्ष बरगद आलेख लिखकर अपने पर्यावरणीय दायित्व निभाते हुए वृक्षों का महत्व बताते हुए लोकचेतना को जागृत किया है, वही अमरेश सिंह भदौरिया ने एक साहित्यिक चिंतक होने के नाते इस कथा का साहित्यिक और सामाजिक उपादेयता की दृष्टि से अनुपम विवेचन लोक आस्था का पर्व: वट सावित्री पूजन लिखकर किया है। ये दोनों ही आलेख आज समाचार पत्रों और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

अब बात इस कथानक के दार्शनिक महत्व और आध्यात्मिक विवेचन की। वैसे तो अखिल भारतीय गायत्री परिवार के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य सहित बहुत से चिंतकों ने सावित्री को प्राण शक्ति, या “जीव” रूप में और सत्यवान को “सत्य आत्मा” रूप में कच्चे सूत को “भौतिक क्रिया” और 108 की संख्या का भी सूक्ष्म दार्शनिक निरूपण किया है। किंतु इनमें सर्वाधिक ग्राहयता, स्वीकार्यता, दार्शनिक वृत्ति और बौद्धिक सूक्ष्मता, चेतना के क्रमबद्ध विकास, उन्नयन की दृष्टि से देखा जाए तो आधुनिक युग के महान दार्शनिक योगिराज श्रीअरविन्द के चर्चित महाकाव्य “सावित्री” में ही मिलता है।
मूलरूप में यह महाकाव्य अंग्रेजी भाषा में सावित्री: ए लीजेंड एंड ए सिंबल नाम से प्रकाशित है। इस महाकाव्य का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। हिन्दी में इस महाकाव्य का अनुवाद उनके पांडिचेरी आश्रम से सावित्री: एक किंवदंती और एक प्रतीक नाम से प्रकाशित हुआ है। यह एक पठनीय, मननीय और संग्रहणीय दार्शनिक ग्रन्थ है। जिन लोगों ने श्रीअरविंद की विश्वप्रसिद्ध पुस्तक “लाइफ डिवाइन” या इसका हिन्दी अनुवाद “दिव्य जीवन” पढ़ी हो उनके लिए सावित्री महाकाव्य को समझना कठिन नहीं होगा। सावित्री में दिव्य जीवन की ही काव्यात्मक अनुगूंज सुनाई देगी।

डॉ जयप्रकाश तिवारी
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
