लेख-3: ‘सभ्य समाज में अकेलेपन का दर्द भोगते बुजुर्ग और बढ़ते वृद्धाश्रम- कारण और निवारण’

[नोट- ‘सभ्य समाज में अकेलेपन का दर्द भोगते बुजुर्ग और बढ़ते वृद्धाश्रम के कारण व निवारण’ 16 जुलाई को ‘विश्व भाषा अकादमी भारत तेलंगाना इकाई’ की ओर से संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में सभी वक्ताओं ने सारगर्भित विचार रखे हैं। यह केवल वक्ताओं के विचार ही नहीं, बल्कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ी के लिए संदेश भी छोड़ गये हैं। संगोष्ठी में वृद्धाश्रम- अभिशाप और आवश्यक दोनों विचार भी सामने आये। अपने-अपने तर्क में दोनों विचार भी सही हैं। यह केवल व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है कि क्या सही और क्या गलत हैं। ‘विश्व भाषा अकादमी भारत तेलंगाना इकाई’ की इस पहल के लिए हम संस्थापिका सरिता सुराणा जी को बधाई देते है, क्योंकि लोगों के लिए बुजुर्ग एक जटिल समस्या होती जा रही है। इस पर चर्चा होने की जरूरत है। इससे पहले हमने दर्शन सिंह जी और भावना मयूर पुरोहित जी का लेख प्रकाशित किया है। इसी कड़ी में यह तीसरा लेख प्रकाशित कर रहे हैं। इन लेखों से एक भी व्यक्ति प्रभावित होता है, तो हम अपने कर्तव्य को सार्थक मानते हैं। हमारा सभी से आग्रह है कि इस विषय पर वे अपनी रचानाएं तुरंत Telanganasamachar1@gmail.com पर भेजे दें। धन्यवाद।]

मनुष्य सामाजिक प्राणी है, जो उसकी अपनी विशेषता है और अन्य जीवों की तुलना में श्रेष्ठ कहलाता है। सच कहें तो समाज शास्त्र का अध्ययन, अन्य विज्ञानों की तुलना में कठिन है। क्योंकि इसका आधार मनुष्य के मनोभाव हैं, जो देश-काल-परिस्थिति पर निर्भर, रिश्ते-नातों से है। समय-समय पर बदलते हैं।

भारतीय संस्कृति और सभ्यता को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चार स्तंभों पर बिठाया गया है। इन्हें साधने के लिए चार आश्रम भी निर्दिष्ट हैं। समय-समय पर समाज में बदलाव आता ही है, जिसके अनुरूप जीवन शैली को भी बदलना है। चाहे संविधान हो या संहितायें- समय की मांग के अनुसार परिवर्तन, परिवर्धन और संशोधन करते हैं, तो ही जीवन सापेक्ष कहलाते हैं।

जीवन का अंतिम पड़ाव है, वृद्धावस्था। यहाँ तक आते-आते मनुष्य की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितयों में अंतर साफ दिखता है। इसे निभाने के लिए परिवार के व्यक्तियों को, सूझ-बूझ और समझौते को आवश्यकतानुसार अपनाना महत्वपूर्ण बिंदु है।

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इसी क्रम में अकेलापन बुज़ुर्गों के हिस्से में आकर सताने लगता है। कारण जितने अलग होते हैं, निवारण भी उतने ही अलग। इनमें से वृद्धाश्रम की संस्कृति भी पसर गई है। एकल परिवारों में बुजुर्गों को देख भाल नहीं कर पाने की दशा में वृद्धाश्रम की ओर बुजुर्ग भी स्वेच्छापूर्वक कदम बढा रहे हैं। वहां हम उम्र के लोगों के साथ समय बिताना अकेले पन को मिटाने का निवारण हो सकता है।

आज न्यायालय भी बुजुर्गों के हित में कार्य कर रहे हैं। पाठशालाओं में भी grand parents day का आयोजन कर घर-परिवार में उनके अनुभवों की महानता पर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। जैसे कि मैंने आरंभ में ही कहा है, ये सारी बातें कुछ निश्चित नहीं होती है। समस्या का निवारण खोजना है। न कि समस्या को घाव बनाना।

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हर पीढी को देखना है कि पारिवारिक संबंधों का तानाबाना टूटे नहीं। इसके लिए अपनापन देना है और अहंकार को तोडना है।
आखिर जिन्दगी जो मिली है, उसे शांति पूर्वक जीना और जीने देना है। इसे ही सदा कल्याणकारी मंत्र बनाकर रखने में बुद्धिमत्ता है।

धरोहर

भले ही हम हैं नागरिक वरिष्ठ

पर हमें नहीं बनना है परिशिष्ट!

भले ही जीवन में आया हो पतझर,

पर समझना नहीं हमें खण्डहर,

भरपूर हैं हममें हमारे देश के संस्कार,

हम हैं सभ्यता और संस्कृति के सार

हम हैं रिश्तों के साथ-साथ

अपनी भाषा के भी धरोहर!!

– लेखिका डॉ सुमन लता हैदराबाद

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