चिट्याला एलम्मा (जिन्हें चाकली एलम्मा के नाम से जाना जाता है।) जैसी वीरांगना स्वतंत्रता सेनानी का जन्म 26 सितंबर, 1895 को वरंगल जिले के कृष्णापुरम गाँव में एक बहुजन परिवार ओरुंगटी मल्लम्मा और सेलू के घर में हुआ था, जिनकी जाति धोबी थी। तेलंगाना क्षेत्र में उन्हें चाकली के नाम से जाना जाता था। ये अपने माता पिता की चौथी संतान थीं। इनका विवाह पालकुर्ती के चिट्याला नरसय्या से हुआ था।
उनका परिवार सामंतों के कपड़े धोकर आजीविका चलाता था। उनकी जाति उनके सशक्तीकरण के प्रतीक के रूप में ही उनका उपनाम (चाकली) बन गई। अपने उपनाम ‘चाकली’ को जाति को शामिल करना उनके गुलामी के इतिहास को दर्शाता है, जो हमेशा से ही उनकी बहादुरी और सामंतवाद के प्रति उनकी असहिष्णुता के उत्सव का प्रतीक है। इस प्रकार उन्होंने उस हिंसात्मक इतिहास को भी रेखांकित किया जिसका सामना उनके समुदाय को ऊँची जातियों के द्वारा करना पड़ता था।
1950 के दशक में इन्हें सामंती शोषण व दमन के कारण बहुत कष्ट उठाना पड़ा। इन्हें महिला समानता, गरीबों के भूमि अधिकारों, आजीविका और बंधुआ मजदूरी से मुक्ति के लिए संघर्ष करना पड़ा। इस संघर्ष में उनके पति व बेटों को जेल भी जाना पड़ा। भाड़े के गुंडों के द्वारा बेटी का उत्पीड़न भी किया गया। घर का सामान, बर्तन, अनाज और मवेशी सब लूट ले गए। फसल कटवा ली गई। आग लगा दी गई फिर भी वह निडर हो कर लड़ीं। कई दिनों तक बिना खाए भी रहीं। हैदराबाद के निज़ाम भी उन गोरे अंग्रेजों से अलग नहीं थे जिन्होंने इस क्षेत्र में आतंक फैलाया और घोर हिंसा को बढ़ावा दिया।
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यद्यपि कि तत्कालीन समय में हिंसा विभिन्न रूपों और स्तरों पर की जाती रही। महिलाएँ राज्य और पूँजीवादी हितों का सबसे आसान शिकार रही हैं। लेकिन कुछ महिलाओं ने ब्रिटिश और निज़ाम सरकारों के कब्ज़े को ध्वस्त करने के लिए अदम्य साहस दिखाया। उनमें से एक बहुजन मज़दूर वर्ग की महिला चाकली एलम्मा भी थीं।
चाकली एलम्मा एक बहुजन क्रांतिकारी महिला स्वतंत्रता सेनानी हैं जिन्होंने तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष में भाग लिया और महिलाओं के लिए मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने अपनी ज़मीन के लिए लड़ाई लड़ी और शासक वर्ग के वर्चस्व और ज़मीन पर कब्ज़े के ख़िलाफ़ उत्पीड़ितों के लिए एक मंच तैयार किया। वह तेलंगाना के सामंती प्रभुओं के वर्चस्व को ध्वस्त करने वाली पहली महिलाओं में से एक हैं और उन्होंने कई महिलाओं को अपनी ज़मीन और आत्म सम्मान के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया है।
चाकली एल्म्मा की लड़ाई सिर्फ़ सामंतवाद तक सीमित नहीं थी, बल्कि लैंगिक समानता और महिलाओं के भीतर समानता की भी लड़ाई थी। उन्होंने ऊँची जाति की महिलाओं पर सवाल उठाया और उनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, जो निचली जाति की महिलाओं को दोरा (उच्च जाति के सामंती ज़मींदारों के लिए यह शब्द, जो उत्पीड़ितों को वर्ग और जातिगत ढाँचे में उनकी हीनता की याद दिलाता है) कहकर जाति और वर्ग की गुलामी को समान रूप से जारी रखती थीं।
वह उच्च जाति की महिलाओं के वर्चस्व पर सवाल उठाने वाली पहली महिलाओं में से एक थीं और उन्होंने यह पहचाना कि जाति, वर्ग और लिंग के आधार पर जीवन के हर पहलू में एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं। जमीन ने उन्हें आत्म सम्मान और आत्मविश्वास दिया जिससे सामंतों को नफरत थी, दोनों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। वह जमीदार, निजाम और पटवारी से भी लड़ीं
एलम्मा ने कहा कि “यह मेरी ज़मीन है। यह मेरी फसल है। यह दोरा कौन होता है जो मेरी ज़मीन और फसल छीन ले? यह किसी के लिए तभी संभव है जब मैं मर जाऊँ।”
वे कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़कर आंध्र सभा में शामिल हुईं और उनका सहयोग भी प्राप्त किया। एलम्मा तेलंगाना सशस्त्र विद्रोह की सबसे महान और प्रेरक नेताओं में से एक थीं। उन्होंने क्रांतिकारी समुदायों के निर्माण किया जो सामंतों, जमीदारों और निजामों से बिना डरे अपने हक़ हुक़ूक़ के लिए संघर्ष किया। वह एक दूरदृष्टा भी थीं। उनकी प्रेरणा से ही पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने देश में भूमि सुधार की व्यवस्था लागू की थी।
10 सितंबर 1985 को उनकी मृत्यु हो गई। उनके सम्मान में 10 सितंबर 2015 को तेलंगाना में उनकी कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया गया। तेलंगाना सरकार ने तेलंगाना किसान सशस्त्र संघर्ष में वीरांगना के रूप में पहचानी गईं चाकली एलम्मा जयंती समारोह को आधिकारिक रूप से आयोजित करने का निर्णय लिया और 22 सितंबर, 2022 को आदेश जारी किया। इसके लिए तेलंगाना धोबी सहकारी समिति संघ से 10 लाख रुपये की राशि भी स्वीकृत की गई। समारोह के आयोजन के लिए पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के तत्वावधान में एक विशेष समिति का गठन किया गया।
“वीरा नारी ऐलम्मा” का इतिहास पालाकुर्ती के कवि और लेखक मामिडाला रमेश राजा ने लिखा। जो “विपुलपा मूर्ति ऐलम्मा” नाम से प्रकाशित हुई। इसका विमोचन राष्ट्रीय सचिव सीताराम येचुरी ने 2015 में हैदराबाद के आरटीसी कल्याण मंडपम में सीपीएम के पहले तेलंगाना राज्य अधिवेशन में किया था।
2022 में 26 सितंबर ( जन्म 26 सितंबर 1895) को उनके आधिकारिक जन्मदिवस मनाने की घोषणा की गई। उनके सम्मान में 10 सितंबर 2024 को उस्मानिया महिला महाविद्यालय का नाम बदलकर वीर नारी चाकली एलम्मा महिला विश्वविद्यालय रखा गया और इसी दिन उनकी पोती श्वेता को राज्य महिला आयोग का सदस्य बनाने का फैसला भी किया गया। ऐसी महान सख्शियत को उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर हम कोटिशः नमन करते हैं।

डॉ नरेन्द्र दिवाकर
मो. 9839675023
