पुस्तक समीक्षा : आग से गुजरते हुए… ‘मूर्तियों के जंगल में’

पत्रकारिता के क्षेत्र में सुभाष राय एक जाना-पहचाना नाम है। साहित्यिक पत्रिका ‘समकालीन सरोकार’ के संपादन से वे जुड़े रहे। वर्तमान में सुभाष जी ‘जनसंदेश टाइम्स’ के प्रधान संपादक के रूप में लखनऊ में कार्यरत हैं। 1957 में उत्तर प्रदेश के बड़गाँव (मऊ) में जन्मे सुभाष राय की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गाँव में हुई। उन्होंने प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थान केएमआई, आगरा से हिंदी भाषा और साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि अर्जित की। तदुपरांत संत साहित्य (संत कवि दादू दयाल के साहित्य) पर पीएचडी की उपाधि अर्जित की। ‘सलीब पर सच’ (2018) उनकी कविताओं का पहला संग्रह है तथा ‘जाग मछंदर जाग’ और ‘अँधेरे के पार’ आलोचनात्मक निबंध संग्रह। ‘नई धारा रचना सम्मान’, ‘माटी रत्न सम्मान’ एवं ‘देवेंद्र कुमार बंगाली स्मृति कविता सम्मान’ आदि से आप अलंकृत हो चुके हैं।

कवि के रूप में सुभाष राय उस सच को उजागर करने के लिए छटपटाते हुए प्रतीत होते हैं जो आज के समय में भीड़तंत्र और षड्यंत्र के कारण गायब होता जा रहा है। ‘सलीब पर सच’ कविता संग्रह की भूमिका में उन्होंने इस तथ्य को उजागर किया है कि कविता उनके भीतर प्राण की तरह बसती है। वे कहते हैं कि ‘मेरा परिचय/ उन सबका परिचय है/ जो सोए नहीं हैं जनम के बाद/ लपट है जिनके भीतर/ मेरा परिचय/ उन अनगिनत लोगों/ का परिचय है/ जो मेरी ही तरह/ उबल रहे हैं लगातार।’

आज चारों ओर संवेदनहीनता और संवादशून्यता का जंगल है। इस जंगल में अनायास ही मनुष्य घुसता जा रहा है। इस जंगल में अंदर जाने के लिए तो रास्ता है, लेकिन बाहर आने के लिए कोई रास्ता दिखाई नहीं देगा। यह तो जंतर-मंतर है। एक संवेदनशील प्राणी इस संवेदनहीनता और संवाद शून्यता को नहीं पचा पाएगा। वह अपने आस-पास घटित घटनाओं को देखकर मौन भी धारण नहीं कर पाएगा। सुभाष राय भी अपने आसपास घटित घटनाओं से इस कदर विचलित हो जाते हैं कि अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए कलम उठाते हैं।

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सुभाष राय साहित्यकार के साथ-साथ पत्रकार भी हैं। अतः वे अपने आपको परिवेश से काट ही नहीं सकते। इसी का परिणाम है उनकी काव्य कृति ‘मूर्तियों के जंगल में’ (2022, नोएडा: सेतु प्रकाशन, 119 पृष्ठ, मूल्य : रु 199)। यह सुभाष राय की कविताओं का दूसरा संग्रह है। इसमें कुल 69 छोटी-छोटी कविताएँ संकलित हैं। इस संकलन की कविताएँ 2018-2020 के बीच रचित हैं। कहना होगा कि कवि सुभाष ने कोरोना महामारी के संकट काल को अपनी सृजनात्मक क्षमता को विकसित करने के लिए उपयोग किया है। इन कविताओं को पढ़ते समय अनायास ही पाठक अनेक दिशाओं में विचरण करने लगता है। सारी कविताएँ मिलकर एक डिस्कोर्स रचती हैं। सब कविताओं के केंद्र में जीती-जागती ‘आग’ है। सुलगती हुई ‘चिनगारी’ है। मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने की ‘बेचैनी’ है। इन कविताओं में ‘आग’ रूपक है जो जीवन की सच्चाई को पाठक के सामने लाने में सक्षम है। कवि-मन पाठक को समाज में व्याप्त तमाम परिस्थितियों से रूबरू कराना चाहता है, नकारात्मक शक्तियों के प्रतिरोध में आवाज उठाना चाहता है। इन कविताओं में नकार और स्वीकार दोनों का संतुलन बखूबी द्रष्टव्य है, लेकिन कहीं भी इनमें न तो नारेबाजी है और न ही बड़बोलापन।

सुभाष राय इस संवेदनहीन दुनिया में खोना नहीं चाहते। वे अपने आपको बचाए रखने की लगातार कोशिश करते रहना चाहते हैं। इसीलिए वे कहते हैं – ‘आग से ही सीखा है मैंने/ हमेशा सुलगते रहना/ इस तरह ऊष्मा जमा करता रहता हूँ/ मुझे मालूम है एक दिन एक ऐसे/ धमाके की जरूरत होगी/ ताकि बुझे हुए चिराग/ एक साथ भभक कर जल उठें।’ (सुलगते रहना, मूर्तियों के जंगल में, पृ.21)

ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए ‘आग’ चाहिए ही चाहिए। इसके अभाव में अस्तित्व डगमगा जाएगा। यदि भीतर आग है तो ‘आग में ही बदल जाता है समूचा अस्तित्व/ पिघलकर भी बहता नहीं/ जलकर भी जलता नहीं’ (जलकर भी जलता नहीं, मूर्तियों के जंगल में, पृ.20)। इन पंक्तियों को पढ़ते समय एक दार्शनिक से हमारा साक्षात्कार होता है। हम जानते हैं कि एक तत्व दूसरे तत्व में बदलता है तो उसकी गति, परिमाण आदि में परिवर्तन होता है। द्रव (जल) के कुछ अणु जमकर ठोस बर्फ बनते हैं और जब बर्फ के अणु पिघलते हैं तो जल के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। दोनों की स्थिति (अस्तित्व) में परिवर्तन है – एक तरल है तो दूसरा सघन। दोनों स्थितियों में तो परिवर्तन है, लेकिन द्रव्यमान में नहीं। इन दोनों ही स्थितियों में एक ही तत्व प्रधान है। (नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन, एक तत्व की ही प्रधानता, कहो उसे जड़ या चेतन। – कामायनी)। कवि सुभाष का मन उस एक ही तत्व के कई-कई रूपों को उजागर करता है।

आग का उपयोग हम कई तरह से कर सकते हैं। ठंड में हाथ सेंक सकते हैं, रोटी सेंक सकते हैं, खाना बनाने के लिए उपयोग में ला सकते है, अँधेरा दूर कर सकते हैं, जंगल में रास्ता न सूझे तो आग जला सकते हैं। खूँखार जानवरों से बचने के लिए भी आग ही तो चाहिए। इतना ही नहीं उसे विनाश का साधन भी बना सकते हैं, जिंदगी को भस्म करने के लिए आग का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन सुभाष राय के लिए यह समूचा अस्तित्व है (पृ.20), स्वप्न है (पृ.22), प्रेम है (पृ.21), जीवन है (पृ.11), ऊर्जा है (पृ.22), संभावना है (पृ.17)। वे अपने भीतर निरंतर इस आग को जगाए रखना चाहते हैं। ‘आदमी को बाहर की आग तक ले गई होगी/ भीतर की आग’ (ऊष्मा के गर्भ से फूटा, मूर्तियों के जंगल में, पृ.11)। सुभाष जी के यहाँ आग ‘आँसू के ठीक पीछे खड़ी रहती है’ (पृ.15), ‘बहुत स्वादिष्ट होती है’ (पृ.15), ‘करोड़ों वर्ष के सफर की कहानियाँ सुनाती है।’ (पृ.25)

आग तो एक चिंगारी से ही तो सुलगती है। पहले कुछ सुलगता है, छोटा ही कण सही। बाद में वही भभक कर जल उठता है। तेज लपटों में बदल जाता है। समूचा वातावरण जगमगाने लगता है। (पृ.19)। छोटे बच्चे के लिए तो आग खुशी है। जिज्ञासा है। उसे क्या पता कि आग झुलसा देगी। जब तक आग को छूकर नहीं देख लेग, बच्चा नहीं जान पाएगा कि उसे आग को छूना नहीं चाहिए। (पृ.18)। कवि की कविता ‘आग का अर्थ’ पढ़ते समय मुझे बचपन के वे दिन याद आ गए। गर्मियों की छुट्टियों में हम सब दादा-दादी और नाना-नानी से मिलने गाँव का रास्ता पकड़ लेते थे।

बचपन में मैंने अकसर माँ, बाबूजी, नाना-नानी, दादा-दादी को फटकार लगाते हुए सुना है। घर में बिजली जाते ही दादी मिट्टी के तेल का चिराग या फिर कभी-कभी पेट्रोमैक्स लैंप जलाती थी। हम सब भाई-बहन चिराग के इर्द-गिर्द बैठकर मस्ती में लौ से खेलना शुरू कर देते थे। इतने में पीछे से पापा की एक गंभीर आवाज आती थी – ‘हाथ जल जाएगा। सावधान!’ फिर भी हम सुनते कहाँ! न जाने कितनी बार उँगली जली। फिर भी लौ से खेलना नहीं छोड़ा। हाथ की उँगलियों से तरह-तरह की आकृतियाँ बनाते थे। बड़े होते गए। मिट्टी के तेल का चिराग और पेट्रोमैक्स लैंप मोमबत्ती में बदलने लगे। फिर भी वही मस्ती। अब तो वह बात ही नहीं है, क्योंकि उस तरह बिजली जाती नहीं, और जाती भी है तो इनवर्टर और जेनरेटर चलता है। लेकिन आज भी आग का वह स्पर्श उँगलियों में तरोताजा है। इन कविताओं ने उसे पुनः जीवंत कर दिया।

गाँव में घर के आँगन में हमेशा अँगीठी सुलगती रहती थी। दादी-नानी आग को राख में दबाकर रखती थीं। दादा गुड़गुड़ी के लिए आग माँगते। आग बुझ जाती तो बच्चों को दौड़ाया जाता था पड़ोस से माँग लाने के लिए। कोई मना भी तो नहीं करते थे। इसी बात को सुभाष राय ने अपनी कविता ‘राख में चिंगारी’ (पृ.27) में बखूबी व्यक्त किया है। इसे पढ़ते समय मेरी आँखों के समक्ष बचपन की वे सारी स्मृतियाँ अनायास ही किसी फिल्म की रील की तरह तैरने लगीं। लेकिन, हाथ सेंकने के लिए या अपने आपको सर्दी से बचाने के लिए जिस आग का उपयोग किया जाता था, आज उसी आग से घर जलाया जा रहा है, जिंदा व्यक्ति को जलाकर राख किया जा रहा है। जब तीलियाँ नहीं थीं तब राख में आग दबाकर सुरक्षित रखा जाता था उपयोग के लिए। लेकिन आज तीलियाँ आ चुकी हैं। लोगों की जेब में ही तीलियाँ हैं। इनका उपयोग किसी निरीह और बेबस का घर जलाने के लिए किया जा रहा है। बचपन में जिस आग से खेलने का मन करता था, आज उसी आग का नाम सुनते ही रूह काँपने लगती है।

मानव जीवन का आग से अजीब रिश्ता है। आदिमानव ने आग का आविष्कार करने के लिए क्या-क्या नहीं किया। पत्थर घिसकर आग सुलगाई, जुगनुओं को पकड़कर बोतल में बंद करके उस रोशनी में शल्यचिकित्सा तक कर डाली। पानी, सूर्य की किरणों और हवा से बिजली बनाई। अपने अंदर की जिजीविषा रूपी आग को जलाए रखने के लिए हर वक़्त कोशिश करता रहा। कवि ‘ऊष्मा के गर्भ से फूटा जीवन’ शीर्षक कविता में कहते हैं कि ‘जब कुछ नहीं रहा होगा/ तब भी रही होगी आग/ बिग-बैंग के ठीक पहले/ कुछ नहीं से बहुत कुछ/ होने की संभावना में/ एक चिंगारी गिरी होगी कहीं/ और समय के रूप में धधकती हुई/ बढ़ चली होगी भविष्य की ओर।’ (ऊष्मा के गर्भ से फूटा जीवन, मूर्तियों के जंगल में, पृ.11)। इन पंक्तियों को लिखते समय अनायास ही अवचेतन मन में दबी हुई विज्ञान की वह चिंगारी सुलगी होगी जो बरसों तक कवि के मन में सुषुप्त अवस्था में विद्यमान थी।

स्वयं कवि सुभाष राय का आग से गहरा रिश्ता है। उनके चारों ओर यह आग महक फैलाती है। यह आग उन्हें कई कहानियाँ सुनाती है। उनके भीतर ऊष्मा पैदा करती है। रास्ता दिखाती है। जिंदा रखती है। संभावना जगाती है। वे कहते हैं कि मनुष्य के भीतर जब तक यह आग नहीं होगी तब तक वह जीवित नहीं होगा। कवि मन दृढ़ विश्वास से यह घोषणा करता है कि ‘एक दिन मनुष्य सीख लेगा/ आग का प्रत्यारोपण/ और उम्र को चुनौती देगा/ वह आग को जीत लेगा/ तो मृत्यु को भी जीत लेगा।’ (तब मृत्यु को जीत लेगा मनुष्य, मूर्तियों के जंगल में, पृ.12)।

सुभाष राय की पत्रकारीय दृष्टि उनकी कविताओं में भी दिखाई देती है। टीआरपी बटोरने के चक्कर में आज कल मीडियाकर्मी नैतिकता को दरकिनार करके झूठे और सनसनीखेज समाचारों को प्रसारित करने में समय व्यतीत कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में ‘खबरों में’ शीर्षक कविता में कवि कहते हैं कि ‘अखबारों में, चैनलों पर छा गई हैं भटकती हुई आत्माएँ/ स्वर्ग की सीढ़ियाँ खोज ली गई हैं/ पाताललोक का मार्ग खुल गया है/ ***/ खबरों में झूठे हैं, झूठों की फौज है/ सारे लबार हैं, उनके सरदार हैं।’ (खबरों में, मूर्तियों के जंगल में, पृ.60)

सुभाष राय की कविताओं में ग्रामीण और शहरी परिवेश को देखा जा सकता है। कवि यह चिंता व्यक्त करते हुए दिखाई देते हैं कि वे गाँव तो पहुँच गए हैं लेकिन घर नहीं पहुँच सके। ‘मैं गाँव तो आया हूँ/ पर घर नहीं पहुँचा अभी तक/ कह नहीं सकता कि पहुँच पाऊँगा कभी/ ईंटों के बीहड़ में सारी यादें/ जाने कहाँ बिला गई हैं।’ (घर नहीं पहुँचा अभी, मूर्तियों के जंगल में, पृ.39)। गाँव की सुनहरी यादें रह-रहकर कवि के मन तो तड़पाती हैं। माँ और बापू के पाँवों की गंध उस गाँव की जमीन में घुल-सी गई है। कवि यह चिंता व्यक्त करते हैं कि ‘जमीन है कि कुछ बोलती ही नहीं’ (वही)। कवि का मन चिंतित है, क्योंकि ‘यहीं छूट गई थी साथी-सोहबत/ पलग्गी। परनाम, राम-राम, अस्सलाम’ (वही, पृ.38)। आज रिश्तों में वह गरमाहट नहीं, जो पहले हुआ करती थी। स्वार्थपरता के कारण रिश्तों के बीच दीवारें उठ खड़ी हुई हैं (वही, पृ.39)।

सुभाष राय की कविताओं में अनेक भारतीय पौराणिक-ऐतिहासिक प्रसंग, मिथक और अंतर-पाठ उपस्थित हैं। कवि इनका प्रयोग करके वर्तमान स्थितियों को उजागर करते हैं। कवि जब कहते हैं ‘जब मैंने पिता के वचन की/ रक्षा के लिए छोड़ी थी अयोध्या/ तब भी तुम्हारे तट के कोमल/ बिछावन पर सोया था’ (फिर छोड़ आया हूँ अयोध्या, मूर्तियों के जंगल में, पृ.95) तो ’रामायण’ के प्रसंग याद आना स्वाभाविक है। कवि ने रामकथा को इस तरह आत्मसात कर लिया है कि समाज में व्याप्त विसंगतियों की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहते हैं ‘बेचारा नहीं समझा…/ शिकारी था/ हिरनी की आवाज में/ पुकारता हुआ’ (पुकार, मूर्तियों के जंगल में, पृ.88)। इन पंक्तियों को पढ़ते समय अनायास की ‘रामायण’ का वह प्रसंग स्मरण हो आता है जब राम सीता के लिए सोने के हिरन के पीछे जाते हैं।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है सुभाष राय की कविताओं में इतिहास, दर्शन, विज्ञान, राजनीति, संस्कृति, नैतिकता, मनुष्यता आदि अनेक पाठ निहित हैं जो इंसान के आगे-पीछे घूमते हैं। अपनी जड़ों को कायम रखने के लिए तड़पता हुई मनुष्य और उस मनुष्य के भीतर निहित आग इन कविताओं के केंद्र में हैं। इसी आग के कारण ‘और ऐसे में ही कभी-कभी/ एक स्वतःस्फूर्त स्फुलिंग की तरह/ किसी बुद्ध या किसी न्यूटन के भीतर/ चमक उठता है एक/ अनाविष्कृत युगांतर’ (अस्ति-नास्ति के पार, मूर्तियों के जंगल में, पृ.14)। कहना न होगा कि ‘मूर्तियों के जंगल में’ भटककर हम अपने भीतर-बाहर के व्यक्तित्व से परिचित हो जाएँगे और सुखद अनुभव प्राप्त करेंगे।

गुर्रमकोंडा नीरजा (98499 86346)
सह संपादक ‘स्रवंति’
एसोसिएट प्रोफेसर
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास
टी. नगर, चेन्नै – 600017
ईमेल : neerajagkonda@gmail.com

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