विशेष लेख – ‘बसंत पंचमी’ पर्व : एक विश्लेषण

‘बसंत पंचमी पर्व’ सनातन धर्म का एक उल्लासमय त्यौहार है, यह “ऋतुराज वसंत” आगमन पर उसके स्वागत में मनाया जाता है। मानव जीवन में उमंग, उल्लास तब आता है जब उसका पेट अन्न से भरा हो, काया निरोगी हो और मौसम उत्साह प्रदर्शन के लिए अनुकूल हो जिसमें अपने ज्ञान, कला, सुर, लय, ताल की धुन पर थिरकने को तैयार हो। आम के बागों के बौरों की सुगंधित मादक वातावरण में अपनी सौम्या नहीं चंचला हो, सुशीला वसुंधरा भी जब अपनी हरी, पीली, नीली चुनरी ओढ़कर सजधज गई हो तो स्वस्थ तन और मन अपने को कब तक रोक सकेगा? वह भी मादक सुगंध में मस्त होकर थिरकने ही लगता है। इसी लोक थिरकन भरे ऋतुराज बसंत के स्वागत का पर्व है – “बसंत पंचमी”। यह पर्व माघ माह की पूर्णिमा को ऋतुओं की संधिकाल में मनाया जाता है, जब शीतकाल जाने और ग्रीष्मकाल के आगमन की संधि बेला है।

बसंत पंचमी पर्व और विज्ञान

“बसंत पंचमी पर्व” खगोल विज्ञान (ऋतु परिवर्तन) और विज्ञान (स्वास्थ्य) दोनों से ही जुड़ा है। सर्दी के बाद वसंत ऋतु के आगमन, सरसों की फसल की बहार और प्रकृति के नवीनीकरण का प्रतीक है। भौतिक विज्ञान की दृष्टि से यह दिन में सूर्य की किरणों के मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव, पीत रंग एकाग्रता और आत्मविश्वास दोनों को बढ़ाता है। स्वास्थ्य विज्ञान वनस्पतियों, औषधियों में स्वास्थ्य वर्धक परिवर्तन को प्रोत्साहित करता है। खगोलीय विज्ञान की दृष्टि यह पर्व माघ मास के पांचवें दिन आता है, जब प्राकृतिक जीवन में एक नया उल्लास होता है। यह पर्व ठीक उस समय आता है जब शीत ऋतु समाप्त होती है और वसंत ऋतु शुरू होती है।

बसंत पंचमी और सरस्वती:

इस त्यौहार में उपासक के रूप में ज्ञान, कला और संगीत की अधिष्ठात्री देवी “माँ सरस्वती” की पूजा आराधना अनिवार्य रूप से होती है। यह बसंतऋतु मां सरस्वती को ही पूर्णरूप से समर्पित है और होली, लोहणी पर्व पर नई फसल और नववर्ष को स्वागत करके साधक समाज अपनी पूर्णता को प्राप्त होता है। बसंत पंचमी के दिन पीतवस्त्र, रंगीन चुनरी धारण से प्रारम्भ होकर यह वस्त्र तन और मन दोनों को ही गुलाल, अबीर और होली गीत में झूमकर नए नए मधुर व्यंजनों, पकवानों को खाकर और खिलाकर, एक दूसरे को गले लगाकर परिवार, समाज के बड़े – बूढ़ों का आशीर्वाद प्राप्त करता है। और यह सब कुछ तबतक पूरा नहीं हो सकता जबतक समाज मां सरस्वती की पूजा – आराधना न कर ले।

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सरस्वती पूजा ही क्यों?

“बसंत पंचमी पर्व” बसंत ऋतु की आगमन का उत्सव है, जब प्रकृति में नए फूल खिलते हैं और सरसों के खेत पीले, अलसी के नीले और आम बौर से लद जाते हैं तब विशेष रूप से मां सरस्वती की पूजा ही क्यों? यह प्रश्न बौद्धिक मन को बारम्बार कुरेदता है। इस प्रश्न के उत्तर के लिए हमें अपनी सनातन संस्कृति की शरण में जाना पड़ेगा। सनातन संस्कृति में “सरस्वती” शब्द की अनेक संकल्पनाएं, विविध निहितार्थ और भावार्थ प्राप्त होते हैं जो सरस्वती को भौतिक, दैविक और आधिभौतिक रूप में प्रस्तुत करते हैं। प्रायः “बसंत पंचमी” को देवी सरस्वती के जन्मोत्सव दिवस के रूप में मनाया जाता है और उनको ज्ञान, बुद्धि, कला, संगीत वाणी, बुद्धि की अधिष्ठात्री होने के कारण इन गुणों को प्राप्त करने के लिए सरस्वती आराधना की जाती है। किंतु मात्र इतना ही सरस्वती का परिचय नहीं है, इससे कहीं अधिक व्यापक परिचय शास्त्रों में मिलता है।

वेदों में सरस्वती:

विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद के तृतीय सूक्त के मंत्र संख्या 10, 11, 12 में इन मंत्रों के देवता रूप में सरस्वती का वर्णन प्राप्त होता है। यजुर्वेद और अथर्ववेद में भी सरस्वती की व्यापक चर्चा है जहां उनको भारती, वाणी, श्रद्धा और इड़ा के रूप में पहचाना गया है – “सरस्वत्यश्विना भारतीडा…”(यजु. 20. 63)। सरस्वती की पहचान एक सर्वोपयोगी औषधि रूप में भी है – “भेषजं न: सरस्वती” (यजु. 20. 63)। सरस्वती को पंच ज्ञानेंद्रियों की ज्ञानवाहिनी नदियां भी कहा गया है – “पंचनद्य: सरस्वतीमपि यंति…” (यजु 34.11)। सरस्वती को ज्ञान नदी के रूप में भी वर्णित किया गया है जो प्रत्येक व्यक्ति को निर्मल, निष्कलुष और निर्वैर बनाती है। यजुर्वेद और अथर्ववेद में इसे वाणी और मातृ भाषा के अर्थ के रूप में चिह्नित किया गया है – ” तिस्त्रो देवी इड़ा सरस्वती मही भारती…” (अथर्व. 7.10.11)।

उपनिषद ग्रंथों में सरस्वती:

देवीपनिषद में सरस्वती को वैष्णवी, स्कंदमाता पार्वती के साथ देवी त्रयी के रूप में परिगणित किया गया है – “कालरात्रि ब्रह्मा स्तुताम वैष्णवी स्कन्दमातरम्। सरस्वतीं अदिति दुहितरं नमाम: पावनाम शिवाम्।। (देवी उप. 6)। सरस्वती रहस्योपनिषद में इनको “यज्ञम दधे सरस्वती” कहकर इसे उपासक के अंदर यज्ञ को धारण करने वाली कहा गया है। इसके अतिरिक्त “निर्विकल्पात्मना व्यक्ता सा मा सरस्वती” इत्यादि भी कहा गया है। इन श्लोकों में देवी सरस्वती के स्वरूप का वर्णन करते हुए उनको नमस्कार किया गया है – “चतुर्मुखंभोजवन हंसव धूर्मम। मानसे रमताम नित्यं सर्व शुक्ल सरस्वती।। नमस्ते शारदे देवि काश्मीरपुर वासनी। त्वमहं प्रार्थये नित्यं विद्यादानं च देहि में”(1,2)। इसके अतिरिक्त “एं अंबितमे नदीतमे देवित मे सरस्वती” कहकर एक नदी, एक देवी और सरस्वती देवी कहकर पुकारा गया है तथा “अश्रुते बुध्यते ग्रंथ: प्रायः सारस्वत: कवि। इत्येवं निश्चयं विप्रा: सा हो वाच सरस्वती (सरस्वती रहस्योपनिषद 10,11)

पुराणों में सरस्वती

वेद और वेदों में सरस्वती का वर्णन ज्ञान, बुद्धि, संगीत और वाणी की देवी के रूप में, नदी और ज्ञान वाहिनी नदी के रूप में वर्णन मिलता है वह बहुतकुछ अमूर्त-सा है किंतु पुराणों में आकर उनका वर्णन सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी की पत्नी, अर्द्धांगिनी रूप में हुआ है। सरस्वती जी ब्रह्मा जी की ज्ञान और वाक् शक्ति हैं। कमल पुष्प पर विराजमान श्वेतवस्त्र, वीणा वादिनी, माला, पुस्तक धारणी मूर्तरूप में हैं। विराजमान रहती हैं; उन्हें अक्सर वीणा, पुस्तक, माला और जलपात्र धारण किए हुए दिखाया जाता है, जो विद्या, कला और सृजन का प्रतीक हैं, और वेदों की रचना से जुड़ी हैं। उन्हें ‘नदीतमा’ (नदियों में श्रेष्ठ) भी कहा गया है। बसंत पंचमी पर्व के दिन मां सरस्वती के इसी मूर्त रूप की “देवी के रूप में” प्रतिष्ठित हुईं, इनकी पूजा, आराधना होती है। उनकी पूजा का मुख्य उद्देश्य अज्ञान से ज्ञान की यात्रा है, यह मति को सुमति और बुद्धि को सद्बुद्धि बनाने की कला का सम्यक विकास है।

दुर्गा सप्तशती में सरस्वती:

दुर्गासप्तशती के पंचम से दशम अध्याय तक में देवी महासरस्वती के सात्विक रूप का वर्णन है, जहाँ वे ब्रह्माजी की शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं। वे 8 भुजाओं से युक्त हैं और शंख, चक्र, हल, त्रिशूल, धनुष, बाण जैसे अस्त्र धारण करती हैं; वे शुंभ-निशुंभ जैसे दैत्यों का मर्दन करती हैं और ब्रह्मा, विष्णु, महेश को भी शक्ति प्रदान करती हैं। वहां वे ज्ञान, बुद्धि और आत्मज्ञान की अधिष्ठात्री हैं।

सरस्वती जी की उत्पत्ति और स्वरूप की चर्चा करते हुए महासरस्वती जी को गौरी (दुर्गा) के शरीर से उत्पन्न बताया गया है। वे अस्त्र-शस्त्र धारणी हैं, शुंभ और निशुंभ जैसे दैत्यों का संहार करने में उनकी प्रमुख भूमिका है। सप्तशती का पांचवां अध्याय देवी सरस्वती को समर्पित हैं, जहाँ वे ज्ञान और शक्ति प्रदान करती हैं और राक्षसों का वध करती हैं।

बाद के काल खंडों में सृजित अनेक पौराणिक ग्रंथों में देवी सरस्वती को जगन्नियंता ब्रह्मा की अर्द्धांगिनी देवी रूप में विषद वर्णन मिलता है जिसका साहित्य जगत में भी बहुलता से प्रयोग किया गया है। इस प्रकार देवी सरस्वती को सनातन संस्कृति में ज्ञान, कला, संगीत, विद्या, शांति और सद्गुणों की देवी रूप में सुदृढ़ मान्यताएं हैं। ये सभी ऐसे सद्गुण हैं जिनकी आवश्यकता बच्चे से लेकर बूढों तक, कलाकार से अभियंता तक, विद्यार्थी से प्रोफेसर तक, संगीतज्ञ से वैज्ञानिक तक सभी को है। अतः जनमानस “बसंतपंचमी पर्व” के दिन अपने जीवन में इन्ही सद्गुणों की प्राप्ति के लिए माता सरस्वती की उपासना करता है।

प्राचीन उपासना के श्लोक, स्तुति, प्रार्थना के शब्द वर्तमान में भले ही कुछ बदल गए हों, भा नहीं बदले। निराला जी की रचना “वर दे! वीणावादिनी वर दे!” की भांति अनेक प्रार्थनाओं ने जन्म लिया है, स्वीकृत होकर गायन के भाषाई माध्यम बन गए है किंतु इस सभी प्रार्थनाओं का मूल स्वर वही है जो प्राचीन ग्रंथों में है, जैसे – “अध्यात्ममधिदैवं च देवानां सम्यगीश्वरी। प्रत्यगास्ते वदन्ती या सा मां पातु सरस्वती”॥ इस मंत्र का भावार्थ है कि जो मेरे स्वयं को, देवताओं को, देवों की अधिपतियों, उनके अंतः – वाह्य दासौदिक बसने वाली दैवीय कल्याणकारी चेतन शक्ति हैं, वे माता सरस्वती मेरी रक्षा करें, मेरे समाज का कल्याण करें॥

“या वेदान्तार्थतत्त्वैकस्वरूपा परमार्थतः। नामरूपात्मना व्यक्ता सा मां पातु सरस्वति”। अर्थात जिनका स्वभाव ही वेदान्त का सार है, परम तत्त्व हैं, (आध्यात्मिक तत्व है), जो परमार्थ हैं, जो परम अर्थ हैं (भौतिक तत्त्व), जो नाम और रूप में प्रकट हुई हैं (जागतिक तत्व हैं), वे करुणामयी मां सरस्वती मेरी रक्षा करें ॥ इसे सर्वांग पुष्टि कारक भी बताया गया है – “ॐ प्रणो देविसरस्वती वाजेभिर्वाजेनीवती। धीनामवित्र्यवतु”। अर्थात ॐकार स्वरूपा माँ सरस्वती, पुष्टिकारक पदार्थों को देने वाली, विचारों की पोषक, उसकी रक्षिता, संवर्द्धिता मां हमारी सतत् रक्षा करें, सतत् कल्याण करती रहें। इस प्रकार “बसंतपंचमी पर्व” के साथ देवी सरस्वती की आराधना अनिवार्यत: जुड़ गई और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बसंत पंचमी को मां सरस्वती का प्राकट्य दिवस होने के कारण इनको अपनाने की परंपरा को पर्याप्त बल भी मिला। जिस प्रकार धार्मिक अनुष्ठान में यदि प्रथम पूज्य विघ्नेश्वर गणेश जी हैं तो साहित्यिक और संगीत के अनुष्ठान में मां सरस्वती ही प्रथम पूज्य और उपास्य हैं। सभी संदर्भों को ध्यान में रखते हुए धार्मिक अनुष्ठान में यदि प्रथम पूज्य विघ्नेश्वर गणेश जी हैं तो साहित्यिक और संगीत के अनुष्ठान में मां सरस्वती ही प्रथम पूज्य हैं। गोस्वामी जी ने मानस वंदना में “वंदे वाणी विनायकौ” लिखकर यद्यपि सरस्वती और गणेश दोनों को एकसाथ रखा है तथापि वाणी (सरस्वती) को गणेश से पूर्व ही रखा, क्योंकि वे जानते हैं कि मां शारदे ही कवि हृदय में विराजमान होकर कवित्व कार्य सम्पन्न कराती हैं – “कवि उर अजिर नचावहि वाणी”। कवित्व एक कार्य है और यह प्रत्येक सामाजिक कार्य का प्रतिनिधित्व करता है।

बसंत पंचमी उल्लास, उमंग और संगीत प्रधान लगभग एक माह होली तक लगातार चलने वाला माधुर्य पर्व है, इस पर्व में हृदय पक्ष की बुद्धिपक्ष की प्रधानता पाई जाती है, किंतु वह बुद्धि का अतिक्रमण नहीं करती। कर्म की विभत्स , विकृत नहीं करती। उत्तर भारत में लोहणी पर्व भी उत्साह, उमंग, माधुर्य और कृषि उत्पादन, अन्न के महत्व से जुड़ा हुआ उल्लास पर्व है। लोहणी भी ऋतु पर्व ही है।

अब यहां स्पष्ट हो गया कि “बसंत पंचमी” पर्व में अनेक देवी, देवताओं की उपस्थिति, विभिन्न मान्यताएं होते हुए भी मां सरस्वती ही बसंतपंचमी पर्व की प्रमुख उपास्य और आराध्य देवी क्यों हैं। भोजपुरी गीतों की शुरुआत कुछ ऐसी होती है – “सुमिरी ले शारदा भवानी अब पति राख महारानी”। फगुआ और चैती, चैता गीत, “आहे सुरसती मइया … कीर्तन में … भजन में… होखि ना सहाय … हे रामा …” कुछ इस प्रकार से। पुरातन हो या नवीन लोकगीत, लोक संगीत और लोक परम्परा की मान्यता देवी “मां सरस्वती” की ही हैं और वैदिक काल से ही यह लगातार मान्य हैं। सभी देश वासियों, सनातन प्रेमियों को बसंतपंचमी पर्व की हार्दिक बधाई और ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं।

डॉ जयप्रकाश तिवारी (94533 91020)
बलिया/लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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