तेलंगाना में पांच महीने में विधानसभा चुनाव होने वाले है। हर दल रणनीति बनाने में व्यस्त है। हमेशा की तरह ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष और सांसद असदुद्दीन ओवैसी भी तेलंगाना में किंगमेकर की रणनीति बना रहे हैं। इसी क्रम में ओवैसी ने बताया कि AIMIM तेलंगाना में किंगमेकर की भूमिका निभाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के लिए उनकी पार्टी राजनीतिक विकल्प है। एआईएमआईएम सुप्रीमो ने यह बयान तब दिया जब वे बीआरएस विधायक शकील आमेर की हत्या के प्रयास के आरोपों का सामना करने वाले लोगों से मिलने के लिए सारंगपुर जेल के गये थे।
एआईएमआईएम तेलंगाना में आगामी विधानसभा चुनावों में हैदराबाद के पुराने शहर के अलावा तेलंगाना में भी चुनाव लड़ने पर विचार कर रही है। हाल ही में एआईएमआईएम के अध्यक्ष ने कहा कि आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगी, इसका निर्णय पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं से विचार विमर्श करने के बाद लिया जाएगा। यह पहली बार नहीं है कि एआईएमआईएम ने पुराने शहर के बाहर चुनाव लड़ने का इरादा जताया है। इससे पहले पार्टी के फ्लोर लीडर अकबरुद्दीन ओवैसी ने भी विषय पर टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा कि तेलंगाना की 119 सीटों में से कम से कम 50 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं।

पिछले तेलंगाना विधानसभा चुनावों में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी), और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच मुकाबिला हुआ। चुनावों के बाद टीआरएस, जिसे अब बीआरएस के नाम से जाना जाता है, ने 119 सीटों में से 88 सीटों पर जीत हासिल करके बाद सरकार बनाई थी। उसकी सीट हिस्सेदारी में 25 की उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसके विपरीत कांग्रेस की सीट हिस्सेदारी 21 से घटकर 19 हो गई, जबकि एआईएमआईएम सात सीटों पर विजयी हुई थी। सरकार बनाने के अपने प्रयासों के बावजूद भाजपा केवल एक सीट सुरक्षित कर सकी। टी राजा सिंह गोशामहल विधानसभा क्षेत्र में विजयी हुए। पार्टी की सीट हिस्सेदारी पांच से घटकर एक रह गई थी।
दूसरी ओर खबरें आ रही है कि बीआरएस की ओर से किये गये सर्वे में उसके वर्तमान 80 विधायकों पर लोग नाराज है। खुद सीएम केसीआर भी गजवेल निर्वाचन क्षेत्र से हारने वाले है। इसीलिए केसीआर अब अन्य निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने का मन बनाया है। ऐसे हालत में एआईएमआईएम और बीआरएस मिलकर चुनाव लड़ने पर समझौता हुआ तो अल्पसंख्यकों के वोटों को दोनों को फायदा हो सकता है। ऐसा हुआ तो बीआरएस और एआईएमआईएम मिलकर सरकार बना सकती है। क्योंकि बंडी संजय के बीजेपी अध्यक्ष पद से हटते ही अचानक ढीली पड़ गई है। पार्टी के अनेक नेता इस हालत के लिए नेतृत्व की सीधे आलोचना कर रहे हैं।
इसी क्रम में कर्नाटक चुनाव के नतीजे के बाद तेलंगाना कांग्रेस पार्टी फूल जोश में है। क्योंकि रेवंत रेड्डी पहले से बीजेपी और बीआरएस की दोस्ती के बारे में जो बात करते आ रहे हैं वह सच होते दिखाई दे है। मुख्य रूप भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बीजेपी आलाकमान ने केसीआर परिवार पर गंभीर आरोप लगाये है, लेकिन उनके खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की गई। इतना ही नहीं दिल्ली शराब कांड मामले में बीजेपी नेताओं ने इतना प्रचार किया कि एमएलसी कविता कभी भी जेल जा सकती है। इस बात को बल भी मिला था कि दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोडिया जेल भेजे गये। मगर अब वह मामला पूरी तरह से ठंडा पड़ गया। जैसा कुछ हुआ ही नहीं।
अगर बीआरएस और एआईएमआईएम मिलकर चुनाव लड़ते है तो लोग समझ जाएंगे कि ओवैसी भ्रष्टाचार पार्टी को समर्थन किया है। अब देखना है कि एमआईएम क्या नीति अपनाती है। इसी बीच बीआरएस और बीजेपी के अनेक वरिष्ठ असंतोष नेता कांग्रेस की ओर देख रहे है। आषाढ़ माह खत्म होते ही ये नेता कांग्रेस पार्टी में शामिल होने वाले है। आरएस प्रवीण की बीएसपी और वाईएस शर्मिला की वाईएसआरटीपी ने तेलंगाना में कड़ी मेहनत की है। इन नेताओं के प्रति लोगों में अच्छा विश्वास भी है। लेकिन इन नेताओं ने कांग्रेस, बीजेपी और बीआरएस वोट बैंक को छेद नहीं कर पाये है। कुल मिलाकर बीआरएस का भविष्य एआईएमआईएम के समर्थन पर निर्भर है।