[हाल ही में भोजपुरी साहित्य सम्मेलन का वार्षिक अधिवेशन बलिया में भव्य रूप से संपन्न हुआ। इस सम्मेलन में वरिष्ठ लेखक और साहित्यकार डॉ जय प्रकाश तिवारी ने भी संबोधित किया। उनके विचार पाठकों तक पहुंचाने में ‘तेलंगाना समाचार’ गर्व महसूस कर रहा है।]
“भोजपुरी भाषा/बोली” दुनिया की सर्वाधिक मधुर भाषा मानी जाती है, किंतु दुर्भाग्य है कि इसे आज भी संवैधानिक भाषा का स्तर नहीं मिला है। इस भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाना, उसे आठवीं अनुसूची में शामिल कराना, शिक्षा में प्राथमिक स्तर तक अनिवार्य शिक्षण, समृद्ध साहित्य का सृजन, और डिजिटल व सिनेमाई माध्यमों में मानक भोजपुरी का प्रयोग आज इसकी परम आवश्यकता है।
भोजपुरी भाषा लोकगीतों में तो अत्यंत समृद्ध है। प्रत्येक छोटा-बड़ा संस्कार इन लोकगीतों के बिना पूरा नहीं होता। किंतु ध्यान रहे लोकगीत ही किसी भाषा की अंतिम परिणति नहीं है। इसे अकादमिक रूप में स्थापित करना और आठवीं सूची में सम्मिलित करना हमारा प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए। अब प्रश्न है कि अभी तक भोजपुरी आठवीं अनुसूची में सम्मिलित क्यों नहीं हो पाई जबकि इसका विस्तार भारत के प्रयेक प्रांत और औद्योगिक शहरों में है। इतना ही नहीं भोजपुरी प्रदेशों से भोजपुरी पूर्वज भारत के बाहर जब रोजी रोटी के लिए मजदूर बनकर गए तब भी अपनी भोजपुरी संस्कृति, भोजपुरी भाषा और छठ जैसे प्रमुख धार्मिक परंपराओं, रीति, रिवाजों को साथ लेकर गए और उसे न केवल जीवित रखा अपितु विस्तार भी दिया। वर्तमान में बलिया की मिट्टी में जन्मे पूर्वजों के यशस्वी उत्तराधिकारी, हिंदी और भोजपुरी के शीर्ष प्रवासी साहित्यकार रामदेव धुरंधर को भाला कौन नहीं जानता। मॉरीशस में हिंदी/भोजपुरी भाषा के शीर्ष हस्ताक्षर और लोकप्रिय साहित्यकार हैं। अत्यंत हर्ष की बात है कि हमारे बीच उपस्थित बलिया की उर्वर मिट्टी में जन्मे राजेश कुमार सिंह “श्रेयस” से आज भी उनकी प्रतिदिन वार्ता होती है। धुरंधर को राजेश अपना साहित्यिक प्रेरक प्रतिभा और आदर्श मानते हैं।

भोजपुरी भाषा के संवर्धन के लिए संभावित मुख्य कदम:
आज पहली आवश्यकता संवैधानिक मान्यता, 8वीं अनुसूची में सम्मिलित करना है। भोजपुरी भाषी जनता की लंबे समय से यह प्रबल मांग है कि इसे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया जाए। किंतु केवल मांग उठाना ही पर्याप्त नहीं है। हमे इसमें अपने चयनित उर सक्रिय जन प्रतिनिधियों को भी साथ लेना पड़ेगा। उनके माध्यम से विधान सभा और संसद में यह मांग तार्किक दंड से उठानी होगी। उन्हें अपने स्तर से भी सरकार और सत्ता के साथ एक उचित समन्वय बनाना पड़ेगा। वांछित मानक में यदि कोई कमी इस भाषा में है तो इसका शीघ्र निदान भी करना पड़ेगा। कोई भी निष्क्रियता भारी पड़ेगी। अभी तक हमने यही तो किया, मांग उठाई, पत्रक सौंपे और शिथिल हो गए। अब शिथिल नहीं होना है।
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शिक्षा में शामिल करना एक उपयोगी प्रयास:
नई शिक्षा नीति 2020 के तहत, प्राथमिक स्तर (कक्षा 5 तक) पर शिक्षा का माध्यम को भोजपुरी (स्थानीय भाषा के रूप में) बनाने की आवश्यकता है, जिससे नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से जुड़ सके। उसे अंग्रेजी या अन्य उन्नत भारतीय भाषाओं से हीनता न महसूस हो। आज व्यावहारिक सत्य यह है कि हमारे आप जैसे लोग भी व्यवहार में अंग्रेजी/हिंदी भाषा का प्रयोग अधिक और भोजपुरी शब्दों का प्रयोग कम करते हैं। हमारे घरों में कान्वेंट या अंग्रेजी माध्यम से पढ़ी लड़कियां जब बधु बनकर आती है तो वे हिंदी को तो जैसे तैसे अपना लेती हैं किंतु भोजपुरी से नहीं जुड़ पाती। ऐसे में घर की बूढ़ी दादी, चाची, सासू मां का दायित्व बहुत बढ़ जाता है। ये नवविवाहिता बधाई गीत, सोहर, झूमर, कजरी जैसे पारंपरिक उत्सव, त्यौहार या भजन के भोजपुरी गीत भी साथ नहीं लाती। लाती भी कैसे? वहां भी आधुनिक बधुये ही उनकी माता या बड़ी भाभी के रूप में उस घर में (मायके में) पहले से विद्यमान हैं। यद्यपि भाषा के रूप में कोई भी भाषा बुरी नहीं होती, किंतु मातृ भाषा की बात ही कुछ और होती है। शोधार्थी, अन्वेषी वृत्ति के मनीषियों ने अपनी आत्मकथा या मंचों से इस तथ्य को स्वीकार किया है कि मातृ भाषा में ही वे प्रश्न और उत्तर उठाते हैं, विश्लेषित करते है, समाधान तक पहुंचते हैं, फिर उसे किसी उन्नत भाषा में, वैज्ञानिक या दार्शनिक शब्दावली में प्रस्तुत करते हैं। यह प्रस्तुति मातृ भाषा का अनुवाद जैसा होता है। इसलिए कहीं – कहीं कुछ शब्द अस्पष्ट या थोपे गए शब्द जैसे लगने लगते है। विशेष रूप से विज्ञान और वैज्ञानिक, तकनीकी शोध पत्र के रूप में।

समृद्ध भोजपुरी साहित्य और व्याकरण का विकास करना:
भोजपुरी साहित्य, व्याकरण, और शब्दकोश के संरक्षण और नए लेखन को प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि यह केवल ‘बोली’ न रहकर एक सर्वांग संतुलित पूर्ण विकसित भाषा के रूप में स्थापित हो सके। जैसे हिंदी की मूल प्रवृत्ति संस्कृत की प्रवृत्ति ही है तथापि उसने अपना व्याकरण गढ़ा। जहां संस्कृत में तीन लिंग होते हैं हिंदी भाषा ने दो लिंगों को स्वीकारा किंतु “काल” या “कारक” में कोई भेद नहीं किया।
डिजिटल माध्यम और शिष्ट संवाद युक्त फिल्मों को प्रोत्साहन:
सिनेमा, संगीत और सोशल मीडिया (यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स आदि) पर अश्लीलता के लुभावने आग्रह को छोड़कर “मानक” और “सांस्कृतिक”, “सामाजिक” भोजपुरी सामग्री को बढ़ावा देना और लगातार प्रोत्साहित भी करना चाहिए। साथ ही नए नए आविष्कार के लिए उचित भोजपुरी शब्दों का सृजन और गढ़न ऐसे ढंग से करना चाहिए जो बोझिल और अव्यावहारिक न बने। हिंदी शब्द कोश विकास को पढ़ते समय रेल के लिए “लौह पथ गामिनी”, रेलवे स्टेशन के लिए “लौह पथ गामिनी विश्राम स्थल” जैसे शब्द न व्यावहारिक हैं, न उपयुक्त। इनमें विशेष जनित शब्दों की भरमार है, जो कोई शब्द न लगकर, किसी लघुवाक्य या सूत्र जैसे लगते हैं। जन नई नई वस्तुएं और सामग्री बाजार में आ रही है तो उसका एक सार्थक और उपयुक्त नाम भी होना चाहिए थी तो शब्द विकास है। जिस भाषा का नामकरण छोट और सरल के साथ उपयुक्त होता है, वही लोकप्रिय हो जाता है। साथ ही नई भाषा में भी उसी अर्थ में गृहित होता है। हिंदी में अंग्रेजी शब्दों की गृह्यता इसी कारण है। रेल और स्टेशन आज भी सामान्य जन के शब्द है। शब्दों को “कठिन काव्य के प्रेत” के अरुण से बचना होगा।
अपनी भोजपुरी भाषा को लोक साहित्य, समर्थ लोकगीतों, नाटक, नौटंकियों, फिल्मों से ऊपर उठाकर उसे सभी अन्य भारतीय भाषाओं के बराबर का स्थान दिलाना होगा। इस बात को कहने ने मुझे जरा भी झिझक नहीं कि भोजपुरी फिल्मो ने यदि भोजपुरी भाषा बोली का व्यापक प्रचार प्रसार किया है तो इसमें प्रयुक्त “द्विअर्थी संवाद”, इसके “अश्लील गीतों” ने इसे भारी क्षति भी पहुंचाई है। भिखारी ठाकुर, महेंद्र सिंह जैसे भोजपुरी पुरोधाओं में संवेदना और सात्विकता का चरम उद्घोष था, लोक मन की पकड़ इतनी सूक्ष्म थी कि भोजपुरी नायक/नायिका का दर्द, वेदना और करुणा वैयक्तिक न होकर सर्वजगत हो जाती थी। उनके साहित्य और निर्गुण दर्शन का उत्कर्ष था। वहीं आज की फिल्मों में “स्थूल कायिक” आकर्षण, अभिव्यक्ति का “भोडा प्रदर्शन” बनकर रह गया है। यह कम शिक्षित वर्ग से तालियां तो पिटवा सकता है, हाल में सीटी भी बजावा सकता है; किंतु बोली या भाषा के रूप में बाधक और बड़ा रोड़ा ही है। इन संवादों को अश्लीलता से उठाकर शिष्ट और मर्यादित करना होगा। एक शब्दकोश के रूप में भोजपुरी भाषा का शब्दकोश अत्यंत समृद्ध है। उदाहरण के लिए “दर्द/पीड़ा” की अभिव्यक्ति के लिए जहां अंग्रेजी भाषा में एक शब्द है पेन (pain), इसको आगे बढ़ाने के लिए, शारीरिक अंगों के नाम को उसमें जोड़ना पड़ेगा। किंतु भोजपुरी में बिना अंगों के नाम जोड़े दर्जनों शब्द मिल जाते हैं, जिसे हम दैनिक जीवन मैं प्रयोग भी करते हैं। यू ट्यूब पर “दर्द के लिए” एक कवि द्वारा प्रस्तुत लगभग दो दर्जन शब्दों को मैंने देखा/सुना है।
आज अत्यंत क्षोभ होता है कि इतना समृद्ध शब्दकोश होते हुए भोजपुरी को कानूनी, अधिकारी संवैधानिक अधिकार नहीं मिला। हमें मिल बैठकर आज सोचना होगा, आज ही क्यों आज से लगातार सोचना होगा, इसके कारणों को ढूंढना होगा। कहा जाता है कि कारण को ढूंढ लेना, आधा समाधान, निदान ढूंढने के बराबर होता है। तो हम शिथिल क्यों बैठे? क्यों न आज से ही पूरी निष्ठा और क्षमता से इस कार्य में लग जाये?
भोजपुरी के बढ़ते चरण:
वर्तमान समय में भारत में कई विश्वविद्यालयों और संस्थानों में भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति की पढ़ाई की जा रही है। मुख्य रूप से बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) के भोजपुरी अध्ययन केंद्र और वीर कुंवर सिंह यूनिवर्सिटी, आरा में इसके कोर्स मौजूद हैं, साथ ही अन्य कई संस्थान भी इसे अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर रहे हैं।
भोजपुरी शिक्षण वाले प्रमुख विश्वविद्यालय और संस्थान:
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी में “भोजपुरी अध्ययन केंद्र” में। वीर कुंवर सिंह यूनिवर्सिटी, आरा (बिहार) “भोजपुरी विभाग” में। नालंदा खुला विश्वविद्यालय (NOU), पटना में एम.ए. और सर्टिफिकेट कोर्स। डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ: पोस्ट ग्रेजुएट (PG) कोर्स। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में भोजपुरी उत्कृष्टता अनुसंधान केंद्र। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) में भोजपुरी भाषा कोर्स प्रचलित है। राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) में ऑन लाइन कक्षाएं। इनके अलावा, बिहार और उत्तर प्रदेश के माध्यमिक शिक्षा बोर्डों में भी भोजपुरी एक भाषा के रूप में है।
महत्वपूर्ण शोध कार्य:
सर्वाधिक शोध कार्य भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर के नाटकों (बिदेसिया आदि) पर हुए हैं। इसके अतिरिक्त भिखारी ठाकुर की ‘धार्मिकता’ विषय पर डॉ. तैयब हुसैन द्वारा महत्वपूर्ण शोध कार्य किया गया है।
भोजपुरी लोकगीत:
डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय और डॉ. एच. एस. उपाध्याय का व्यापक कार्य उल्लेखनीय है। भोजपुरी नाटक और सामाजिक मुद्दे पर शोध कार्य मुख्य रूप से पटना विश्वविद्यालय, बीएचयू (BHU), और बिहार/यूपी के अन्य विश्वविद्यालयों में भोजपुरी और हिंदी विभागों के अंतर्गत किए गए हैं। किंतु ये सभी शोध कार्य अंग्रेजी अथवा हिंदी भाषा के माध्यम से हुए हैं।
भोजपुरी भाषा में पहला शोध कार्य:
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के “भोजपुरी अध्ययन केंद्र” के शोध छात्र धीरेंद्र कुमार गुप्ता ने भोजपुरी भाषा में अपना थीसिस लिखकर पीएचडी (PhD) पूरी की है, देश के इतिहास में पहला भोजपुरी भाषा में शोध कार्य है – भोजपूरी पत्रकारिता कऽ उद्वभव आउर प्रवृत्तियाँ (स्वतंत्रता पूर्व तक)”। इसके शोध निदेशक हैं प्रो. वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी। यह एक सराहनीय और स्वागत योग्य प्रगति है।
वर्तमान में जनपद बलिया का योगदान:
वर्तमान में डॉ. राजेन्द्र भारती के संपादकत्व में भोजपुरी विकास चेतना, मासिक पत्रिका, अंजोरिया डॉट कॉम इंटरनेट पत्रिका, दीयाबाती, नरेन्द्र शास्त्री का उपन्यास ऊसर के फूल, डॉ अशोक द्विवेदी के त्रैमासिक पत्रिका, पाती, भगवती प्रसाद द्विवेदी के भोजपुरी में काव्यसंग्रह, बालगीत तथा शिवजी पाण्डेय रसराज के गीत, सोहर, खण्ड काव्य कैकेई के भोजपुरी भाषा के विकास में बहुत योगदान है। कुछ अनियमित रचनाकार भी लिख रहे हैं। उनका सभी उत्साहवर्धक करना चाहिए।
इन्हीं सराहनीय पलों में आज इस सम्मेलन के मंच से भोजपुरी भाषा के तीन समर्थ और श्रेष्ठ भोजपुरी/हिंदी मनीषियों का सम्मान किया गया। उन सभी मनीषियों को मेरा प्रमाण है, उनका अभिनंदन है। हमें उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। इसी आह्वान और भावभरा निवेदन के साथ बलिया भोजपुरी संस्थान, इसके अध्यक्ष डॉ राजेंद्र कुमार भारती, देव कुमार सिंह, “दीया बाती” पत्रिका परिवार का विशेष आभार व्यक्त करते हुए अपनी वाणी को यही विराम देता हूं।
जय भोजपुरी, जय भारत!!
जय हिंदी, जय हिंद!!
डॉ. जय प्रकाश तिवारी
भरसर, बलिया, उत्तर प्रदेश
संपर्क- 94533 91020
