विश्व पुस्तक दिवस पर विशेष लेख : भारतीय और पाश्चात्य दृष्टि

आज (23 अप्रैल) विश्व “पुस्तक दिवस” है। पुस्तकें ज्ञान का भंडार होती हैं। इसमें लेश मात्र भी संदेह नहीं। किंतु इसी ज्ञान के भंडार को देखने, समझने की दृष्टि और संवेदनाओं में पूर्व और पश्चिम की दृष्टि में बहुत बड़ा भेद है। पाश्चात्य जगत “पुस्तक दिवस” मानता है, वह भी पूरे वर्ष में एक बार। सनातन संस्कृति, भारतीय परंपरा इसे पुस्तक नहीं “शास्त्र” कहता है,”ग्रंथ” कहता है और नित्य प्रति उसका पूजन करता है। यह बड़ा अंतर है पाश्चात्य और भारतीय दृष्टि में। हां, यहां हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि अब हम भारतीय भी “शास्त्र” को शास्त्र को पुस्तक ही मानने लगे हैं, जिसके कारण शास्त्र में सरस्वती, विद्या, ज्ञान की भावनात्मक दृष्टि का ह्रास दिखता है, और कलम के संदर्भ में भी ऐसा ही है।

अब कलम को पूजा की, उपासना की पवित्र साधन (वस्तु) न मानकर एक सामग्री मानने से अब उसका ग्रंथ पारायण कम होने लगा है, उसपर चिंतन, मनन भी अपेक्षाकृत कम होने लगा है, जिसके परिणामस्वरूप हमारे आचरण और मान्यताओं में गिरावट आई है। पश्चिम के प्रभाव में “पुस्तक भाव” अपने “ग्रंथ भाव” पर प्रभावी दिखता है। ग्रंथ की ओर हम तभी उन्मुख होते हैं जब संकट में होते हैं। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि जो संकट हरण है, उसका ही पाठ (आचार व्यवहार) किया जाए तो संकट आए ही क्यों? यह विंदु आज वर्तमान में विचारणीय है। ग्रंथ और ज्ञान पर अहंकार का नहीं, समर्पण, विनय का संस्कार होना चाहिए।

अभी पिछले दिनों हमने परशुराम जयंती और आदिशंकराचार्य जयंती मनाई। उनके हाथों में “परशु” और “भाष्य” ही पुस्तक है। परशु और भाष्य ही हमें मानवता के उत्कर्ष तक पहुंचाएंगे। विज्ञान की पुस्तकें “ब्लैकहोल” तक पहुंची, वे उसमें “हिरण्यगर्भ” को ढूंढ रहीं हैं। विज्ञान की प्रगति ब “गॉड पार्टिकल” में सृष्टि सर्जक “ब्रह्मा” का “सृष्टि विज्ञान, सृष्टि प्रक्रिया” ढूंढ रही है। आधुनिक युग के दो धुरंधर वैज्ञानिक इस “गॉड सिद्धांत” में भ्रमित है। आइंस्टीन जहां कहते हैं “गॉड प्लेज डाइस”, (अर्थात ईश्वर किसी नियम से बद्ध होकर कार्य नहीं करता, वह स्वतंत्र है) वहीं स्टीफेन हॉकिंग कहते हैं “गॉड डजनॉट प्ले डाइस”। (अर्थात् ईश्वर स्व नियमों से बद्ध है, नियम विरुद्ध कार्य नहीं करता)। ये बाते उन पुस्तकों में हैं जिन्हें है रुचि लेकर पढ़ते हैं। किंतु जिन ग्रंथों में मुख्य विषय यही सृष्टि विज्ञान ही है, उन ग्रंथों को उपेक्षित भाव से देखते हैं।

यह भी पढ़ें-

आज हमें ग्रंथ और पुस्तक के इस सूक्ष्म अंतर, महीन भेद को समझना होगा। पुस्तक हमे “क्षैतिज विकास” देती हैं तो ग्रंथ हमें “ऊर्ध्व” बनाते हैं। हमें यदि संपूर्ण विकसित होना है, महामानव बनना है तो आज “ग्रंथ” और “पुस्तक” दोनों को समान रूप से अध्ययन करना पड़ेगा। केवल पुस्तके ज्ञान ने हमें कितना क्रूर, विध्वंशक बना दिया है, यह वर्तमान में चल रहे रूस – यूक्रेन, इजराइल, अमरीक – ईरान, लेबनान – इजराइल, चीन – ताइवान इत्यादि ध्वंस – विध्वंस के रूप में दिख रहा है और उनका हास्यास्पद तर्क देखिए, वे कहते हैं कि यह शांति के लिए हो रहा है। उनको यह नहीं पता पुस्तकें युद्ध और कुटिल प्रतिस्पर्धा ही दे सकते हैं। यदि शांति, सौहार्द, विश्वबंधुत्व भाव चाहिए तो आपको “ग्रंथ” की शरण में ही जाना पड़ेगा।

मोबाइल में ग्रंथ नहीं मिलेगा, मोबाइल में पुस्तक नहीं मिलेगी, उसकी झलक मिलेगी; किंतु उसका भावार्थ और निहितार्थ तो पठन, मनन, निर्दिध्यासन से होगा। और वह तभी संभव है जब ग्रंथ हो या पुस्तक प्रिंट रूप में सामने हो। ग्रंथ एक सावित्री को “यमराज विजेता” बना सकती है, एक यशोधरा को “अजेय यशोधरा” बना देती है, जो अपने पुत्र राहुल को ऐसा ज्ञानी विज्ञानी बना देती है जो यशोधरा और तथागत बुद्ध के शास्त्रार्थ में न्यायाधीश की भूमिका निभाता है। ग्रंथ किसी भारती को ऐसी विदुषी भार्या बना देता है जो आदि शंकराचार्य और पति मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ की न्यायाधीश बनाती है। “नारी बनाम नारी” की “आशा” अपनी प्रिय सहेली “प्रगति’ के अशांत, दुखी, कर्कसमय जीवन में दाम्पत्य का सुख, शांति और विकास के दरवाजे खिल देती है। यह ग्रंथ और पुस्तक, लोक और आलोक की शिक्षा की समन्वित अभिव्यक्ति है।

अतः आज विश्व पुस्तक दिवस पर हमें प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि आज से पुस्तक भी पढ़ेंगे और “ग्रंथ” का भी अध्ययन करेंगे। यही मानवता की स्थापना का एकमात्र उपाय है।

डॉ. जयप्रकाश तिवारी
भरसर, बलिया, उत्तर प्रदेश
संपर्क- 94533 91020

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent Posts

Recent Comments

    Archives

    Categories

    Meta

    'तेलंगाना समाचार' में आपके विज्ञापन के लिए संपर्क करें

    X