विशेष लेख : मकर संक्रांति की मान्यता और परंपरा

वास्तव में मकर संक्रांति का पर्व सूर्य के मकर राशि में (उतरायण की शुरुआत) से जुड़ा है, जो शुभ कार्यों, आध्यात्मिक उन्नति और समृद्धि का प्रतीक है, जिसे देवताओं का दिन माना जाता है और जप, तप और दान के लिए शुभ होता है। इस दिन से खर मास (जिसमें शुभ कार्य वर्जित होते हैं) समाप्त होता है। इस दिन मौसम में बदलाव आता है। फसल काटने के बाद नई फसल बोई जाती है। मकर संक्रांति को विभिन्न स्थानों पर लोहड़ी, पोंगल और बिहू नाम से मनाया जाता है।

यह पर्व हर आयु के लोगों द्वारा उत्साह, उल्लास और उमंग से मनाया जाता है, क्योंकि इसके साथ पतंग उड़ाने, विभिन्न तरह के व्यंजनों को खाने की परंपरा जुड़ी है। कुछ स्थानों पर इसे तिल संक्रांति भी कहा जाता है। इस मंगल अवसर पर तिल के लड्डू तथा तिल से बनी अन्य मिठाईयां जैसे गजक और पट्टी खाने का विधान है। शास्त्रानुसार मकर संक्रांति का त्योहार फसलों के लिए भगवान को धन्यवाद और उनका आशीर्वाद हमेशा किसानों पर बना रहे इसकी कामना से किया जाता है।

पौराणिक शास्त्रानुसार सूर्य देव अपने पुत्र शनि (जो मकर राशि के स्वामी है) से मिलने उनके घर जाते हैं। जो पिता पुत्र के प्रेम और मिलाप का द्योतक है। इस दिन गंगा नदी भगीरथ के पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर में जा मिली थी। इसलिए पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है। मकर संक्रांति के बाद दिन लंबे होने लगते हैं जिससे वसंत ऋतु का आगमन होता है। यह पर्व प्रकृति के आराधना का प्रतीक है। सर्दी का मौसम उतार पर होने लगता है। इसका सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है जो लोगों को एक दूसरे से जोड़ उनके रिश्तों को मजबूती देता है।

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पतंगबाजी जैसे उल्लास पूर्ण विधान रिश्तों के दायरों को बढ़ाते हैं जिससे नए संपर्कों में बढ़ोतरी होती है। सहृदयता में वृद्धि होती है। गीतकार राजेंद्र कृष्ण ने खूब लिखा है ” चली चली रे पतंग चली बादलों के पार/ होके डोर पे सवार यूं मस्त हवा में लहरे/ रंग पतंग का धानी, है ये नील गगन की रानी चली रे पतंग//

बताया जाता है पहली बार पतंग तीन हजार साल पहले चीन में बनी और बाद में यह एशियाई देशों में फैली। पौराणिक मान्यतानुसार महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी इच्छा मृत्यु के लिए मकर संक्रांति के दिन का ही चयन किया, क्योंकि इस दिन उतरायण का आरंभ होता है और इस दिन शरीर त्यागने से मोक्ष प्राप्त होता है। दरअसल यह त्यौहार कर्मों और उनके फलों पर चिंतन करने, नकारात्मक को छोड़ सकारात्मकता की ओर बढ़ने का पर्व है सूर्य की गति से जुड़े होने के कारण यह जीवन में गति, नव चेतना और नव स्फूर्ति का प्रतीक है। कुछ मान्यताओं के अनुसार भगवान राम ने मकर संक्रांति पर पहली पतंग उड़ाई।

उत्तर प्रदेश में इसे खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व पर सुमित्रा नंदन पंत ने लिखा, “जन पर्व मकर संक्रांति, उमड़ा नहान को जन समाज / इसमें विश्वास अगाध अटल इसको चाहिए प्रकाश नवल / भर सके नया जो इसमें बल, गए आज जीवन स्पंदन प्रिय लगता जन गण सम्मलेन// मकर संक्रांति का पर्व कवि इसी भावना को साकार करता है।

दर्शन सिंह
मौलाली हैदराबाद

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