महर्षि दयानंद सरस्वती : आधुनिक भारत के चिंतक तथा आर्य समाज के संस्थापक की उपलब्धियां

30 अक्टूबर को महर्षि दयानंद की 142 वीं पुण्य तिथि है। इनके चरित्रों के बारे में विस्तार से लिखने वाले कई विद्वान मौजूद हैं और इसके लिए उनकी प्रसिद्ध भी हुई है। ऐसे लिखे गये अनेक ग्रंथ उपलब्ध भी हैं। फिर भी एक लघु एवं संक्षिप्त जीवनी “ऋषि चरित्र प्रकाश” पुस्तक श्रद्धा और भक्ति का पुष्प, क्रांतिवीर पंडित गंगाराम वानप्रस्थी ने 1946 में प्रस्तुत किया था, जिसे तत्कालीन हैदराबाद शासन द्वारा जब्त किया गया।

क्या आवश्यकता हुई इसे लिखकर प्रस्तुत करने की? इस पर पंडित जी ने बताया कि प्रत्येक लेखक अपना – अपना कुछ लक्ष्य बनाकर ही लिखता है। लक्ष्य काल और परिस्थिति से बनते हैं। काल और परिस्थितियों बदलती रहती हैं। परिणामत: इनमें भिन्नता होती है। इसलिए लक्ष्य भी भिन्न हुआ करते हैं।

अब जानिए ऋषि – ग्रंथों में, वैदिक धर्म को जैसा लिखा समझा, बिल्कुल उसके उल्टा कुछ – एक विद्वान, प्रचारकों के भाषण। उदाहरणार्थ, तहसीलदार महोदय ऋषि के विष देनेवाले को पकड़ लाये और बन्दीग्रह भेजने की अपनी इच्छा प्रकट कर रहे थे। किन्तु ऋषि ने यह कह कर उस व्यक्ति को छुड़वा दिया कि मैं संसार को कैद करने नहीं आया, अपितु मुक्त कराने आया हूं। एक और उदाहरण – जगन्नाथ रसोईया ने जोधपुर में ऋषि को कांच पिला दिया, ऋषि को इसकी शंका हुई। जगन्नाथ से सब हाल पूछा और अन्त में उसे 300 रुपये दिये।

Also Read-

इन जैसे और कई उदाहरणों को लेकर हमारे व्याख्याता जनता को उपदेश देते हैं कि ऐसा त्याग और ऐसी क्षमा – वृत्ति धारण करें। ये लोग बिना सोंचे – समझे कुछ भी कह दिया करते हैं। यही कारण है कि अब तक सैकड़ों नवजवान् गाजर, मूली और भेडों, बकरों के समान कटते गये। ऋषि ने हमें जिंदा रहना सिखाया है, मरना या मारे जाना नहीं। ऋषि कड़े से कड़े दण्ड के पक्षपाती थे। राज्य व्यवस्थाओं को ऋषि का सन्देश भी यही है।

फिर क्या उपरोक्त उदाहरण असत्य है ? नहीं, वे ठीक है। ऋषि एक संन्यासी थे। एक आदर्श संन्यासी का यही धर्म है, पर सारा समाज संन्यासी तो है नहीं, होना भी नहीं चाहिए। इसीलिए समाज का कर्तव्य है कि जो उसके अस्तित्व को मेटने का प्रयत्न करे, उसे समाज मेट दे, जो उसके नियमों का पालन नहीं करता, उसे समाज दण्ड दे। समाज व्यक्तियों के समूह का नाम है।

“ऋषि चरित्र प्रकाश” में स्थान – स्थान पर ऋषि की सैद्धांतिकता के आलोक में वे अपने दृढ़ विचारों पर प्रकाश डालते हैं। उनका मत ‘शठे शाठ्यम समाचरेत्’ अर्थात दुष्ट को उसी की नीति से समाप्त करना चाहिए। इसी पद्धति से समाज में प्रचलित दुर्नीति, छल – कपट, अत्याचार, अन्याय, स्वच्छंदता आदि समाज विरोधी तत्वों का अन्त होकर एक स्वस्थ समाज निर्माण सम्भव है।

अतः प्रत्येक व्यक्ति का यह धर्म हो जाता है कि वह अपने या समाज के विरुद्ध कार्य करने वालों का पीछा करे। दूष्टता सिद्ध होने पर कड़े से कड़ा दण्ड दे। यदि दण्ड नहीं देता‌ तो वह स्वयं एक पापी है, कायर है, बुजदिल है, नपुंसक है, पाप वृद्धि का वह स्वयं एक कारण है।

अतः इस वैदिक सिद्धांत पर हम चलने लगेंगे तो अन्याय, अत्याचार, बलात्कार, चोरी, रिश्वत, धोखाधड़ी, छल, कपट, विश्वासघात, कूटनीति आदि सारे पाप मिटने लगेंगे। पापी लोग दण्ड के भय से कांपने लगेंगे। फिर चहूं ओर सुख और शान्ति का राज होगा। भेड़ – बकरियों की तरह कोई नहीं कटेगा। छल, कपट, विश्वासघात आदि कोई नहीं करेगा।

महर्षि दयानन्द ने भारत के आध्यात्मिक इतिहास में सत्य और एकता को देखा और जिसके मन में भारतीय जीवन के सब अंगों को प्रदीप्त कर दिया। उनका उद्देश्य भारतवर्ष को अविद्या, आलस्य और प्राचीन ऐतिहासिक तत्व के अज्ञान से मुक्त कर सत्य और पवित्रता की जागृति में लाना था। महर्षि ने जितने भी अनुपम देन छोड़ गए हैं, उनमें से छुतछात के विरुद्ध उनकी असंदिग्ध घोषणा भी निसन्देह एक है।

ऋषि के जीवन की एक-एक बात को लेकर खुले दिल से विवेचना करें, जिस से सत्य का निर्णय और प्रचार हो सके। जगत की रीत भी कुछ ऐसी ही रही है। कहते हैं की भक्ति में बुद्धि और तर्क नहीं होते। अतः इससे काम नहीं लेना चाहिए। यह कहावत सरासर झूठ है। महर्षि दयानन्द ने कई स्थानों पर लिखा है कि मनुष्य को अपनी बुद्धि से काम लेना चाहिए, क्योंकि मनुष्य की आत्मा सत्यासत्य का जानने वाला है।

महर्षि के कई बातों को स्पष्ट करने के लिए ‘ऋषि चरित्र प्रकाश’ की रचना की गई है। अतः पाठक इसमें केवल श्रद्धा, केवल भक्ति, केवल गुण-वर्णन, केवल घटनाएं आदि बातें नहीं पाएंगे, अपितु कुछ चुनी बातों पर विवेचना प्रस्तुत की गई है।

ऋषि ने मूर्ति पूजा का खण्डन इसीलिए नहीं किया कि राम, कृष्ण आदि की मूर्तियां पत्थर की बनी हुआ करती है, बल्कि इसलिए कि लोग सच्चे ईश्वर को जानें, सच्चे ईश्वर का अनादर और अपमान ना हो, सभी लोग ईश्वर की आज्ञा – वेद मत का पालन करें। समस्त संसार के लोग उस एक, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, निराकार परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करें। यही ऋषि की उत्कट इच्छा थी और इसी के लिए वे दिन – रात एक कर रहे थे।

शुद्धि कार्य ने तो हमारी जाति में एक नवजीवन उत्पन्न कर दिया था। यदि शुद्धि के प्रथा ऋषि से पूर्व हमारे देश में होती तो हम हुमायूं और अकबर अवश्य ही आर्य हुए होते। हमारी जाति के नेताओं ने बड़ी-बड़ी भूल की है।

संसार की सारी जातियां पहले वैदिक धर्म ही थीं। अतः उन पर दया करके उन्हें फिर से वैदिक धर्म की शरण में लाना प्रत्येक आर्य का कर्तव्य है ऐसा ऋषि ने वेद पाठ पढ़ाया। “कृण्वन्तो विश्वमार्यम” सारे संसार को आर्य बनोओ – यह वेद का नारा ऋषि का ही बुलन्द किया हुआ है। स्वयं ऋषि ने अपने पवित्र हाथों से एक जन्म से मुसलमान मोहम्मद उमर को देहरादून में 1879 ईस्वी में शुद्ध करके उसका नाम अलखधारी रखा था।

ऋषि ने विधवा – विवाह पर बल दिया, इसे शास्त्रों के मर्यादानुसार है, ऐसा सिद्ध किया। इसका परिणाम यह निकला कि देश की लाखों विधवाएं अब विवाहित जीवन व्यतीत कर रही है। विधवा विवाह आज तो हमारे देश में एक साधारण सी बात हो गई है। विधवाओं संबंधी इस कार्य से लाखों विधवाएं विधर्मी बनने से बचीं। यह एक महान तथा अद्भुत सुधार था।

महर्षि के धर्म के हित और राष्ट्र की सामाजिक और नैतिक उन्नति के लिए जो अमूल्य सेवाएं की हैं, वह इतने अधिक हैं कि इस छोटे से लेख में उन्हें पूर्णतया नहीं दर्शाया जा सकता। आओ हम महर्षि के जीवन का अनुसरण करें और 142वीं पुण्यतिथि पर उन्हें यही विनम्र भावभीनी श्रद्धांजलि होगी।

भक्तराम
चेयरमैन स्वतंत्रता सेनानी पण्डित गंगाराम स्मारक मंच

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent Posts

Recent Comments

    Archives

    Categories

    Meta

    'तेलंगाना समाचार' में आपके विज्ञापन के लिए संपर्क करें

    X