विशेष लेख: एक समर्पित और अथक वेद सेवक डॉ विजयवीर विद्यालंकार जी

कोई वेदनिष्ठ विरला ही धर्मानुरागी होगा जो आज हैदराबाद के वेदसेवक विद्वान श्रीमान डॉ. विजयवीर विद्यालंकार जी को न जानता हो। विजयवीर जी के सार्वजनिक जीवन में अथवा कार्यक्षेत्र में उतरने से बहुत पहले जब आप गुरुकुल में हैदराबाद में पढ़ते थे। मैं तब से आपका प्रशंसक व प्रेमी बन चुका था। विजयवीर जी तब मुझे नहीं जानते थे। आपकी आयु अभी सोलह वर्ष से कम थी। आप वैदिक सिद्धांतों पर कविता लिखते रहते और उस काल खंड में मैं सुरुचि से आपकी कवितायें अत्यंत सुरुचि से पढ़ता रहता।

मै तब नये नये युवा धर्म प्रेमियों को प्रेरणा देने के लिये उनसे उनकी कविताओं की चर्चा करता रहता था। यदा कदा अपने व्याख्यानों में भी इनके कविरूप तथा वेद भक्ति की प्रशंसा करते हुये कहा करता था, “यह ब्रह्मचारी विजयवीर एक दिन आर्य जगत का एक नामी कवि बनेगा। आचार्य सत्यप्रियजी आपके आरंभिक काल के शिक्षकों में से एक थे। आपने मेरे मुख से इनकी कविताओं की प्रशंसा सुनकर कहा,” विजयवीर संस्कृत की भी अच्छा कवि तथा विद्वान बनेगा।”

मुझे वेदों के काव्यानुवाद पर इनके एक के पश्चात दूसरे ग्रन्थ पढ़कर आज यह लिखते व कहते हुए अत्यन्त गौरव अनुभव होता है कि तब मैं जैसा सोंचता, समझता, व कहता था आप तो उससे भी कहीं आगे निकल गये हैं। विजयवीर विद्यालंकार जी का अनूठा धर्मानुराग :- मैं गत सत्तर वर्ष से आर्य सामाजिक क्षेत्र के अनेक ऐसे व्यक्तियों को जानता हूं जिनके बारे यह कहा जाता था कि यह एक दिन एक यशस्वी कर्मठ समाज सेवी बनेंगे परंतु, वे राजनीति के तथा पदों की प्राप्ति के चक्र में ऋषि ऋण तथा वेद सेवा सब भूल गए हैं परन्तु आपको शिक्षा प्राप्ति के पश्चात वेद प्रचार व समाज सेवा करने वालों की सबसे पहली पंक्ति में देखकर आज मुझ जैसे सब ऋषि भक्तों को आपकी विद्वत्ता व व्यक्तित्व पर विशेष गर्व होता है।

Also Read-

आप कभी चुनाव तनाव के चक्र में पढ़कर अथवा सभा संस्थानों में पद प्राप्ति की लालसा से वेद के स्वाध्याय, वेद प्रचार, वेद सेवा व वैदिक चिन्तन से कभी दूर नहीं हुए। यथा पूर्व सारा आर्य जगत् आपकी अखण्ड वेद सेवा व वेद भक्ति पर मुग्ध है। ऐसा दूसरा उदाहरण आज कहां मिलता है। आपकी वेद सेवा व वेद भक्ति को देखकर आर्यों को पं. भगवदत्त जी, पं. धर्मदेव जी, पूज्य मीमांसक जी तथा श्रद्धेय पं. ब्रह्मदत्तजी की ऋषि भक्ति व वेद भक्ति की याद अनायास ही आ जाती है। कौन इस तथ्य को झुठला सकता है कि आपने एक इतिहास रचकर के दिखाया है।

जब वेद सेवा के लिये मैदान में उतर आये तो घण्टों आर्यसमाज महर्षि दयानंद मार्ग, हैदराबाद में पं. नरेन्द्र जी से धर्म चर्चा चलाकर उनके प्रेरक संस्मरण तथा आर्यसमाज के इतिहास के प्रेरक प्रसंग सुन कर आर्यसमाज के स्वर्णिम इतिहास को सीन में सुरक्षित करते रहे। पं. नरेन्द्र जी अपने जीवन की जो घटनाएं न तो व्याख्यानों में सुनाते और न कभी लेखों में लिखते थे। आपने ऐसी ऐसी अनूठी, प्रेरक और शानदार घटनायें उनसे सुनकर मुझे सुनाईं। मैंने ऐसी ऐसी प्यारी व न्यारी घटनायें आर्यसमाज के इतिहास में सुरक्षित कर दीं।

इसका श्रेय श्री विजयवीर को :- ‌ एक बार आर्यों ने पं. नरेन्द्र जी के मनानूर के जंगलों में पिंजरे में बिताय गये अपने बन्दी जीवन की एक घटना श्री विजयवीर जी को सुना दी। श्री विजयवीर जी ने यह अनूठी घटना मुझे सुना दी। मैंने उस पर एक गीत रच दिया :-
‘पिंजरे वाला शेर दहाड़ा’
आर्य समाज के इतिहास में तथा स्वराज्य संग्राम में ऐसी दूसरी घटना नहीं मिलेगी। मैंने यह घटना लिखों में भी लिखी, पुस्तकों में प्रचारित करके इसकी धूम मचा दी। तब पं. प्रियदत्त जी हैदराबाद से चलकर मेरे पास अबोहर यह जानने आ रहे थे कि इस घटना का प्रमाण क्या है ? आप तो बिना प्रमाण के लिखते ही नहीं। पं. प्रियदत्त जी दिल्ली होते हुए अबोहर यही जानने के लिए आ रहे थे कि मैं आपको दिल्ली में ही मिल गया।

तब मैंने आपको बताया कि विजयवीर जी ने पं. नरेंद्र जी से उनके जीवन संग्राम की घटना सुनते हुए इसे अपने सीने में सुरक्षित कर लिया। फिर उस मुसलमान राज्य कर्मचारी ने जो मनानूर पंडित जी की पिंजरे में देखभाल किया करता था उसने पंडित जी के बंदी जीवन का पर्व मनाते हुए आर्य मात्र को यह घटना सुना दी परंतु, इस इतिहास का अनावरण करने का सारा श्रेय पं. विजयवीर जी को ही प्राप्त है। और भी इतिहास की पर्याप्त लुप्त सामग्री आपने मुझे उपलब्ध करवाई।

आपकी विनम्रता – महानता की एक घटना :- ‌पं. विजयवीर जी से हैदराबाद के एक प्रख्यात पत्रकार ने एक बार कहा, “मैंने जिज्ञासु जी लिखित ग्रन्थ ‘क्रांतिवीर पं. नरेन्द्र’ पूरा पढ़ लिया है। आप मुझे पण्डितजी के जीवन की कुछ ऐसी महत्वपूर्ण प्रेरक घटनायें बतायें जो जिज्ञासु जी लिखित ग्रन्थ में नहीं है। “विजयवीर जी ने अत्यन्त विनम्रता से उसे कहा, “इसके लिये आपको अबोहर ही जाना पड़ेगा। वह आपको और भी बहुत कुछ बता सुना सकते हैं।” आपने उस संवाददाता से हुआ अपना यह संवाद मुझे दिल्ली के एक समारोह में सुनाया था। सज्जनवृन्द इस घटना का कोई मूल्यांकन तो करें। आपकी सरलता, स्नेह व आत्मीयता पर जितना भी लिख जावे थोड़ा है।

आपके लेखन, शोध तथा वेद भक्ति की विशेषता :- आपके सामवेद काव्यामृत ग्रन्थ के एक एक मंत्र के पद्यानुवाद को मैंने अत्यन्त सुक्ष्म दृष्टि से पढा है। वेद के एक एक मन्त्र के एक एक शब्द का आपके काव्यानुवाद में अर्थ देखकर उसका वेद के मूल शब्द से मिलान किया। पूरे सामवेद में मुझे ऐसा एक भी शब्द नहीं मिला जो आपकी दृष्टि से छूट गया है। धर्म, दर्शन, पाप, पुण्य, उपासना, कर्मफल सिद्धान्त, त्रैतवाद, ईश्वर की दया और न्याय, ईश्वर जीव तथा प्रकृति का सम्बंध, कर्म करने में जीव की स्वतंत्रता तथा फल भोगने में ईश्वर की व्यवस्था में परतन्त्रता – इन सब की कविता – अनुवाद में यथा स्थान चर्चा है। भक्ति भावों में बहकर विजयवीर जी ने वैदिक दर्शन से अन्याय नहीं किया है। वेद के दार्शनिक सिद्धान्तों का यथा स्थान उल्लेख करने में विजयवीर जी की सजगता का अपना एक विशेष महत्वहै।

मैंने अत्यंत सेवा भाव, त्याग भावना, लगन एवं निराभिमानता से जीवन भर धर्म रक्षा, धर्म प्रचार व समाज सेवा में जीवन बिताने वाले कई गुणियों व नर रत्नों को देखा तथा उनकी संगत से लाभान्वित होता रहा। ऐसे माननीय महानुभावों में श्रीमान विजयवीर जी का एक विशेष स्थान है। इस पर जितना भी लिखा व कहा जावे थोड़ा है। आप द्वारा सुनाई गई – बताई गई पं. नरेन्द्र जी के बन्दीजीवन पर सबसे पहले लिखी गई अपनी शैली तथा विषय की कविता (गीत)
‘पिंजरे वाला शेर दहाड़ा’
आगे देकर मैं लेखनी को विराम देता हूं।

लेखक : प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु
अबोहर, पंजाब

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent Posts

Recent Comments

    Archives

    Categories

    Meta

    'तेलंगाना समाचार' में आपके विज्ञापन के लिए संपर्क करें

    X