प्रकृति का सुकुमार कवि, छायावाद के स्तंभ, हिंदी साहित्य के वर्ड्सवर्थ और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित सुमित्रानंदन पंत कि २० मई को १२६ वीं जयंती है. उनकी कविताओं में प्रकृति का सौंदर्य और जीवन के प्रति उनकी गहरी भावनाएँ दिखाई देती हैं. हिंदी साहित्य में छायावाद हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण युग था, और पंत को छायावाद के मुख्य स्तंभों में से एक माना जाता है. हिंदी साहित्य में वर्ड्सवर्थ के समान, पंत को भी प्रकृति प्रेम और उनकी काव्यगत अभिव्यक्ति के लिए जाना जाता है. उन्होंने १९६८ में ज्ञानपीठ पुरस्कार जीता, जो हिंदी साहित्य का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है.
सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म बागेश्वर ज़िले (उत्तराखंड) के कौसानी नामक ग्राम में २० मई १९०० को हुआ. उनका बचपन का नाम गोसाई दत्त था. बचपन से ही उनके भीतर प्रकृति के प्रति आदर था प्रेम था. स्लेटी छतों वाले पहाड़ी घर ,आंगन के सामने आडू खुबानी के पेड़, पक्षियों का कलरव, सर्पील पगडंडिया, पहाड़िया तथा दूर-दूर तक मखमली कालीन सी पसरी हरियाली घाटी व उसके ऊपर हिमालय के उत्तंग शिखरों और दादी से सुनी कहानियों व शाम के समय सुनाई देने वाली आरती की स्वर लहरियों ने गुसाई दत्त को बचपन से ही कवि हृदय बना दिया था. जन्म के ६ घंटे बाद ही मां का साया खोने वाले पंत प्रकृति के ही ममता में पले और बड़े हुए. सुमित्रानंदन पंत के पिता गंगादत्त कौशनी गांव में बगीचा के मैनेजर थे तथा उनके भाई संस्कृत व अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे, जो हिंदी व कुमाऊनी भाषा में कविताएं भी लिखा करते थे. उनके भाई का प्रभाव ही उन पर पड़ा जो कवि थे और उन्हें ले गया.
दुबले पतले व सुन्दर काया के कारण पंत जी को स्कूल के के नाटकों में अधिकतर स्त्री पात्रों का अभिनय करने को मिलता. १९१६ में जब वे जाड़ों की छुट्टियों में कौसानी गये तो उन्होंने ‘हार’ शीर्षक से २०० पृष्ठों का खिलौना’ उपन्यास लिख डाला. जिसमें उनके किशोर मन की कल्पना के नायक नायिकाओं व अन्य पात्रों की मौजूदगी थी. कवि पंत का किशोर कवि जीवन कौसानी व अल्मोड़ा में ही बीता था. इन दोनों जगहों का वर्णन भी उनकी कविताओं में मिलता है. पंत जी के कॉलेज जीवन के साथ भारत में स्वाधीनता आंदोलन की क्रांति की ज्वाला जल रही थी. अंग्रेजों के प्रति आक्रोश सभी और था, उसमें कवियों का योगदान भी बड़ा महत्वपूर्ण रहा. उसी राह प्रबंध भी चल पड़े.
यह भी पढ़ें-
उन्होंने १९२० के असहयोग आंदोलन में कॉलेज छोड़ दिया था, पर देश के स्वतंत्रता संग्राम की गंभीरता के प्रति उनका ध्यान १९३० के नमक सत्याग्रह के समय से अधिक केंद्रित होने लगा, इन्हीं दिनों संयोगवश उन्हें कालाकांकर में ग्राम जीवन के अधिक निकट संपर्क में आने का अवसर मिला. उस ग्राम जीवन की पृष्ठभूमि में जो संवेदन उनके हृदय में अंकित होने लगे, उन्हें वाणी देने का प्रयत्न उन्होंने युगवाणी (१९३८) और ग्राम्या (१९४०) में किया. यहाँ से उनका काव्य, युग का जीवन-संघर्ष तथा नई चेतना का दर्पण बन जाता है. स्वर्णकिरण तथा उसके बाद की रचनाओं में उन्होंने किसी आध्यात्मिक या दार्शनिक सत्य को वाणी न देकर व्यापक मानवीय सांस्कृतिक तत्त्व को अभिव्यक्ति दी, जिसमें अन्न प्राण, मन आत्मा, आदि मानव जीवन के सभी स्वरों की चेतना को संयोजित करने का प्रयत्न किया गया.
कवि पंत की साहित्यिक विशेषता आगे चलकर मुक्तक, लंबी कविता, गद्य-नाटिका, पद्य-नाटिका, रेडियो-रूपक, एकांकी, उपन्यास, कहानी इत्यादि जैसी विभिन्न विधाओं में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत की हैं और लोकायतेंन तथा सत्यकाम जैसे वृहद महाकाव्य लिखें. जिसमें चिदंबरा १९५८, युगवाणी (१९३७-३८) अतिमा (१९४८) तक कवि की १० कृतियों से चुनी हुई १९६ कविताएं संकलित हैं. एक लंबी आत्मकथात्मक कविता आत्मिका भी इसमें सम्मिलित है, जो वाणी (१९५७) से ली गई है. चिदंबरा पंत की काव्य चेतना के द्वितीय उत्थान की परिचायक है.
प्रमुख रचनाएं इस प्रकार है:-
कहानियाँ
वीणा (१९१९)
स्वर्णधूलि (१९४७)
पाँच कहानियाँ (१९३८)
ग्रंथि (१९२०)
उत्तरा (१९४९)
उपन्यास
पल्लव (१९२६)
युगपथ (१९४९)
हार (१९६०),
गुंजन (१९३२)
चिदंबरा (१९५८)
युगांत (१९३७)
कला और बूढ़ा चाँद (१९५९)
आत्मकथात्मक संस्मरण
युगवाणी (१९३८)
लोकायतन (१९६४)
साठ वर्ष : एक रेखांकन (१९६३)
ग्राम्या (१९४०)
गीतहंस (१९६९)
स्वर्णकिरण (१९४७)
‘उच्छास’ से लेकर ‘गुंजन’ तक की कविता का सम्पूर्ण भावपट कवि की सौन्दर्य-चेतना का काल है. सौन्दर्य-सृष्टि के उनके प्रयत्न के मुख्य उपादान हैं- प्रकृति, प्रेम और आत्म-उद्बोधन. अल्मोड़ा की प्राकृतिक सुषमा ने उन्हें बचपन से ही अपनी ओर आकृष्ट किया. वातावरण का इनके व्यक्तित्व पर गंभीर प्रभाव पड़ा. कवि या कलाकार कहां से प्रेरणा ग्रहण करता है. अपनी काव्य यात्रा में पन्त जी सदैव सौन्दर्य को खोजते नजर आते हैं. उनकी रचनाओं में छायावाद एवं रहस्यवाद का समावेश भी है. वह कविता में लिखते हैं –
“छोड़ द्रुमों की मृदु छाया
तोड़ प्रकृति से भी माया”
बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?” प्रकृति के प्रति उनका सदा लगाव रहा है. उनकी साहित्य साधना को पद्म भूषण (१९६१) और ज्ञानपीठ पुरस्कार (१९६८) से सम्मानित किया गया. कला और बूढ़ा चाँद के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, लोकायतन पर ‘सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार’ एवं ‘चिदंबरा’ पर इन्हें ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्राप्त हुआ. कौसानी चाय बागान के व्यवस्थापक के परिवार में जन्मे महाकवि सुमित्रानंदन पंत की मृत्यु २८ दिसम्बर, १९७७ को इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में हुई.

डॉ कृष्णा गायकवाड
हिंदी विभाग प्रमुख,
सहयोगी प्राध्यापक,
श्रीमती जी. जी. खडसे महाविद्यालय, मुक्ताईनगर जिला. जलगांव
krishnagaikwad753@gmail.com मोबाइल नंबर- 98225 76062
