हैदराबाद: कादम्बिनी क्लब हैदराबाद के तत्वावधान में क्लब की 395वीं मासिक गोष्ठी का आयोजन गूगल मीट के माध्यम से रचनाकार पुष्या वर्मा की अध्यक्षता में किया गया। प्रेस विज्ञप्ति में जानकारी देते हुए डॉ अहिल्या मिश्र (क्लब अध्यक्ष) एवं मीना मुथा (कार्यकारी संयोजिका) ने आगे बताया कि प्रथम सत्र का आरंभ शुभ्रा महन्तो द्वारा सरस्वती वंदना की सुमधुर प्रस्तुति से हुआ।

क्लब अध्यक्षा डॉ अहिल्या मिश्र ने पटल पर उपस्थित साहित्य सृजनाकारों का शब्द कुसुमों से स्वागत करते हुए कहा कि क्लब अपने 32 वें वर्ष की यात्रा में इस माह प्रवेश कर चुका है। सभी का साथ सहयोग इस दीर्घ यात्रा में मिला है, तभी साहित्य का कारवां आगे बढ़ पाया है। डॉ उमा मेहता (असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, आर्टस एण्ड साइंस, गवर्मेंट कॉलेज, अहमदाबाद) “वीरेंद्र जैन के उपन्यासों में युगचेतना” विषय पर अपने विचार रखेंगी और रचनाकार वीरेंद्र के साहित्य संसार से हम परिचित होंगे।
संगोष्ठी सत्र संयोजक अवधेशकुमार सिन्हा ने विषय प्रवेश कराते हुए लेखक परिचय में कहा कि वीरेंद्र जैन, एक साहित्यकार, पत्रकार, संपादक, उपन्यासकार का जीवन इतनी विषम परिस्थितियों से गुजरा है यह जानकर मैं खुद स्तब्ध हूँ। छोटे से छोटा काम किया, किशोरावस्था से ही परिवार की जिम्मदारी का बोझ कंधे पर आ गया। जानी मानी पत्रिकाओं से वे जुड़े। विभिन्न पड़ावों से वीरेंद्र जी का जीवन गुजरा है, लेकिन विकट परिस्थितियों में भी उनका लेखन गतिशील रही।
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डॉ उमा मेहता ने अपने संबोधन में कहा कि वीरेन्द्र जैन के उपन्यास हमारे सामने समाज की जो वास्तविकता है उसका कच्चा चिट्ठा खोलकर रख देता है। तीव्र संवेदना उनके लेखन की विशेषता रही है। स्वतंत्रता के बाद का भारत, आम आदमी, परिस्थितियों से घिरा कृषक आदि का वास्तविक चित्रण हम पढ़ते हैं। लेखन में वास्तविकता कल्पना के घोड़े दौड़ाने से नहीं आते बल्कि अनुभवों का निचोड़ लेखन में उतरता है तभी सशक्त कृति साकार होती है। शोषित नारी, उत्पीड़न, बलात्कार, दहेजप्रथा, अनाथ बच्चों की दुर्दशा, कृषकों के हक का छीना जाना आदि मायनों को वे गहन अवलोकन के साथ कटु सच्चाई को उजागर करते हैं। कटु यथार्थ, समाज की पीडा, दर्द आदि का सटीक चित्रण वीरेन्द्र जैन के उपन्यासों में नजर आता है। शब्दबद्ध, रुका हुआ फैसला, शुभस्य शीघ्रम, पंचनामा आदि कृतियों का उल्लेख भी डॉ उमा ने किया।
अवधेश कुमार सिन्हा की शंकाओं का निदान करते हुए डॉ उमा ने कहा कि रामायण, रामचरितमानस, साकेत में राम न मात्र परमेश्वर हैं, बल्कि हमारे बीच के ही व्यक्ति हैं।
सरिता सुराणा ने कहा कि किसानों की समस्याएं कभी खत्म नहीं होगी। राज बदल जाता है और समस्या वहीं की वहीं रहती है।
पुष्पा वर्मा ने अध्यक्षीय टिप्पणी में कहा कि उमा मेहता ने अपने व्याख्यान में उपन्यास ‘डूब’ का जिक्र करते हुए बांध के बंधने से खुशी और दुखों के सागर में डूबने की त्रासदी को सारगर्भित तरीके से हमारे समक्ष रखा है। वे बधाई की पात्र हैं।

डॉ अहिल्या मिश्र ने कहा कि डॉ उमा मेहता ने सीमित समय में बहुत ही सुंदर संबोधन दिया और वीरेन्द्र जैन को हम सभी अवश्य पढ़ें, उन्हें गुने, यह प्रेरणा दी है।
सत्र का आभार व्यक्त करते हुए अवधेशकुमार सिन्हा ने कहा कि जटिल स्थितियों में भी लेखन में सफलता पाने का दुर्लभ उदाहरण आज हमने वीरेंद्र जैन के रूप में देखा है।
दूसरे सत्र में चंद्र प्रकाश दायमा की अध्यक्षता में कवि गोष्ठी हुई। इसमें प्रियंका वाजपेयी पाँडे, निशिकुमारी, वर्षा शर्मा, आर्या झा, डॉ आशा मिश्रा “मुक्ता”, सुनीता लुल्ला, पुष्पा वर्मा, दर्शन सिंह, विनोद गिरी अनोखा, मीरा ठाकुर, तृप्ति मिश्रा, शिल्पी भटनागर, मीना मुथा ने काव्य पाठ किया। डॉ मदनदेवी पोकरणा, उषा शर्मा, सुखमोहन अग्रवाल ने संस्था को साधुवाद दिया। यशोधरा भटनागर और मधु भटनागर की उपस्थिति रही। चंद्रप्रकाश दायमा ने अध्यक्षीय काव्यपाठ में “हड्डियाँ भी अब चरमराने लगी हैं, अब जिंदगी मुझसे उकताने लगी है” सुंदर पंक्तियों के साथ सभी स्चनाकारों को साधुवाद दिया।

आंतिम चरण में अहमदाबाद में घटित दुःखद घटना विमान हादसे में मृत सभी नागरिकों को क्लब की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। शिल्पी भटनागर ने तकनीकी व्यवस्थाओं में सहयोग देते हुए सत्र का धन्यवाद ज्ञापन किया। मीना मुथा ने कार्यक्रम का संचालन किया। कार्यक्रम में अहमदाबाद, दिल्ली, जयपुर और देवास से भी रचनाकारों ने भाग लिया।
