सूत्रधार: केदारनाथ अग्रवाल के रचना-संसार पर परिचर्चा एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन

हैदराबाद (रिपोर्ट सरिता सुराणा): सूत्रधार साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, भारत हैदराबाद द्वारा 26वीं मासिक गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन किया गया। अध्यक्ष सरिता सुराणा ने सभी अतिथियों और सहभागियों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन किया। श्रीमती सुनीता लुल्ला की सरस्वती वन्दना और गुरुवाणी से गोष्ठी प्रारम्भ हुई।

तत्पश्चात् प्रथम सत्र प्रारम्भ करते हुए सरिता सुराणा ने श्री केदारनाथ अग्रवाल का जीवन परिचय प्रस्तुत करते हुए कहा कि हिन्दी भाषा के ख्याति प्राप्त कवि केदारनाथ अग्रवाल जी का जन्म उत्तर-प्रदेश के बांदा जनपद के ग्राम कमासिन में श्री हनुमान प्रसाद गुप्ता और माता घसीटो देवी के घर में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही हुई, बाद में उन्होंने इलाहाबाद से बी ए किया और कानपुर में कानूनी शिक्षा प्राप्त की। बाद में बांदा में वकालत करने लगे। इनके पिताजी भी अच्छे कवि थे। उनसे प्रेरणा लेकर ही इन्होंने भी कविताएं लिखना शुरू कर दिया।

इनका पहला कविता संग्रह- ‘फूल नहीं, रंग बोलते हैं’, परिमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ और उसे सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा इनके दूसरे काव्य संग्रह-‘अपूर्वा’ को सन् 1986 में साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। इसके अलावा इन्हें हिन्दी संस्थान पुरस्कार, तुलसी पुरस्कार और मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। इनका रचना-संसार बहुत व्यापक है।

उन्होंने उनकी प्रसिद्ध रचना- ‘जो जीवन की धूल चाटकर बड़ा हुआ है’ का वाचन किया। परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए श्रीमती सुनीता लुल्ला ने कहा कि केदारनाथ अग्रवाल प्रगतिशील लेखक थे। उन्होंने छायावाद और रहस्यवाद से प्रभावित न होकर सीधी, सरल और सहज भाषा में प्रगतिवादी कविताएं लिखी। ये जनता के बीच आकर अपनी बात रखना चाहते थे इसलिए इन्होंने वकालत छोड़ दी।

श्री दर्शन सिंह ने केदारनाथ जी की विभिन्न रचनाओं के उदाहरण देते हुए उनके लेखन की विशेषताओं को उजागर किया। साथ ही कहा कि भारत ही ऐसा देश है, जिसने विश्व को प्रकाश दिया है। परिचर्चा बहुत ही सुन्दर और सारगर्भित ढंग से सम्पन्न हुई।

द्वितीय सत्र में श्रीमती सुनीता लुल्ला ने काव्य गोष्ठी का कुशलतापूर्वक संचालन किया। जिसमें कोलकाता, पश्चिम बंगाल से श्रीमती सुशीला चनानी ने वर्षा ऋतु पर मनोरम गीत प्रस्तुत किया तो श्रीमती हिम्मत चौरड़िया ने दोहा, घनाक्षरी और कुण्डलिया छन्दों में रचित रचनाएं प्रस्तुत करके वातावरण को आनन्ददायक बना दिया। सिलीगुड़ी से श्रीमती भारती बिहानी ने शब्दों की महिमा पर अपनी रचना प्रस्तुत की तो आर्या झा ने पारसमणि जैसी सटीक और खूबसूरत नज़्म सुनाकर सबका मन मोह लिया।

डॉ संगीता जी शर्मा ने- सपनों को घोलूं जरा जैसी मनोरम रचना प्रस्तुत की तो दर्शन सिंह ने- कुछ बेचैनी सी महसूस होती है जैसी भावपूर्ण रचना प्रस्तुत की। सुनीता लुल्ला ने अपने अंदाज में अपनी गज़ल- गांव कहता है मुझे आज शहर जाने दे, प्रस्तुत करके सबकी वाहवाही बटोरी। सरिता सुराणा ने वर्तमान सम्बन्धों में आ रहे सामाजिक परिवर्तन पर आधारित अपनी लघुकथा- जन्मदिन का वाचन किया। श्री प्रदीप देवीशरण भट्ट, श्रीमती किरन सिंह और श्रीमती रिमझिम झा ने भी गोष्ठी में अपनी सहभागिता निभाई। डॉ संगीता शर्मा के धन्यवाद ज्ञापन के साथ गोष्ठी सम्पन्न हुई।

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