[नोट: लेखक ने फोटो के बारे में लिखा है- अंतरराष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन 1953 के अवसर पर ऐतिहासिक चारमीनार से होती हुई भव्य जुलूस निकला/रथ यात्रा में आसीन दिखाई दे रहे हैं- सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान घनश्यामसिंह जी गुप्त साथ में स्वागताध्यक्ष युवा क्रांतिवीर पंडित गंगाराम जी। एक बात और प्रकाशित लेख में विचार लेखक के हैं। इससे संपादक का सहमत होना आवश्यक नहीं है।]
हैदराबाद जो पूर्व में “भाग्यनगर” कहा जाता था। निजाम के शासन यहां के हिंदू बहुसंख्यक होने पर भी, प्रशासन मात्र 10 से 12 फीसदी मुस्लिम द्वारा चलाया जा रहा था। निज़ाम का लक्ष्य था कि मुसलमानों की आबादी बढ़े और उसने पठानों, रोहिल्ला, अलीगढ़ आदि क्षेत्रों से अपने अनुयायियों को हैदराबाद में बसाया। और कई हथकंडे अपना कर हिंदुओं की संख्या को कम करने, अपनी हुकूमत को मजबूत करना चाहता था। उसने हिंदुओं के धर्मांतरण, मंदिरों में पूजार्चना पर प्रतिबंध, ध्वज को न फहराना, महिलाओं पर अत्याचार, महिलाओं और हिंदुओं यात्रियों की लूट आदि घटनाएं लगभग सामान्य हो चले थे।
इन परिस्थितियों में, जो सक्षम थे ऐसे कई परिवार हैदराबाद राज्य से पलायन कर दूसरे स्थानों पर जाने को मजबूर हुए। जो गरीब थे उनका बहुत बुरा हाल था, यहां पर आपको बताया नहीं जा सकता। उन्हें रजाकारों, पठानों, रोहिल्ला, निजाम के सैनिकों से दिन-रात, उठते बैठते, जाते-आते, कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता। जीना उनके लिए एक नरक के समान था। उन्हें किसी भी स्वतंत्रता से कोसों दूर रखा जाता था। उन्हें प्रशासन से एक ही संदेश मिलता की आप अगर इस्लाम कबूल करेंगे तो स्वतंत्र कर दिए जाओगे। सभी तरह की सुविधा दे दी जाएगी। प्रलोभन और सुरक्षा को ध्यान में रखकर कुछ परिवार उनके संरक्षण में चले जाते थे। जो परिवार अपनी बस्ती में डट कर विरोध करते, उन्हें हर तरफ से कष्ट ही कष्ट झेलने पड़ते। वही सच्चे और धर्म के प्रति निष्ठावान बन सब सह लेते।

दुर्लभ तस्वीर
निज़ाम प्रशासन की अनदेखी या यह कहिए कि समर्थन में रजाकारों और अत्याचारियों के, जब अति हो चला और हिंदुओं का सामान्य जीवन जीना मुश्किल हो चला, तब आर्य समाज ही एक ऐसा संगठन था जो हिंदुओं के रक्षार्थ अपने पूर्ण सामर्थ्य के साथ, अपने प्राण हथेली में रखकर मन्दिरों, कस्बों, बस्तियों, दलित तथा गरीब परिवारों को गले लगाया और सीधे निज़ाम प्रशासन से संघर्ष के लिए उठ खड़ी हुई। ऐसी स्थिति में, जबकि, निज़ाम के क्रूर दिशा निर्देशों से बच निकलना कठिन ही नहीं, असंभव था। आर्य समाज ने ऐसा संगठन, संचालन, नेतृत्व और भूमिका बनाई की निजाम की नींद उड़ गई और आर्यसमाज से वह इतना डर गया की उसपर और ज्यादा सख्ती एवं प्रतिबंध लगाया, जुबान बन्दी लगाई, पुस्तक जब्त की, गिरफ्तारियां होने लगी।
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आर्य समाज को हैदराबाद राज्य में स्थापित हुई अभी 40-45 वर्ष हुए थे और इस संगठन में जो भी पहुंचता, उसे महर्षि दयानंद सरस्वती महाराज की भारत भारतीयों का है, स्वराज ही उत्तम है, का ज्ञान हो जाता। उसमें अपने रक्षार्थ, अपने जाति, धर्म पर मर मिटने और प्रतिरक्षार्थ कोई भी कदम उठाने के लिए अग्रसर रहता था। उसकी चेतना, संघर्ष के लिए समर्पण, राष्ट्रीय प्रेम और धर्म पर अभिमान रहना अनिवार्य सा था। यही कारण है कि आर्य समाज ने खुलकर दलितों का साथ दिया और उनसे उत्तम संबंध निर्माण की और उनको बताया कि हम आपके साथ हैं। आपके कष्ट हमारे कष्ट हैं, कोई भी आपको परेशान करेगा तो हम उसका जवाब ईंट का पत्थर से देंगे और हम आपको पूरा-पूरा सहयोग देंगे।
इस विषम परिस्थिति में, हैदराबाद के आर्यों का दिन पर दिन बढ़ते हुए अत्याचार देख, प्रतिशोध की आंधी चलने लगी। इसे शान्ति से, वार्ता से, मिल बैठकर कोई समाधान नहीं निकलता देख, सशस्त्र क्रांति का बिगुल बजाने की ठानी। पंडित दत्तात्रेय प्रसाद जी वकील के नेतृत्व में ” आर्यन डिफेन्स लीग ” ( आर्य रक्षा समिति ) की स्थापना हुई और उसमें युवा क्रांतिकारी पंडित गंगाराम जी, ए. बालरेड्डी, प्रताप नारायण, राजपाल, सोहनलाल, विश्वनाथ आदि शामिल हुए। इन्होंने सक्रिय भाग लेकर हिंदुओं की रक्षा और लोगों में आत्मरक्षा पर प्रशिक्षण शिविर आदि लगाना और हर पल जागृत, सावधान कैसे रहना बताने लगे।
इसी का परिणाम यह हुआ कि आर्य रक्षा समिति सक्रिय हुई और उन्होंने राज्य भर में अलग-अलग स्थान से 22 सत्याग्रही जत्थों को सफलतापूर्वक निज़ाम की जेलों में भर दिया और कई हजारों की संख्या में गिरफ्तारी, संघर्ष के लिए तैयार होकर अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा ने संज्ञान में लिया और सोलापुर में एक विशेष बैठक बुलाई गई। इस बैठक में स्वातंत्रवीर सावरकर जी का बड़ा योगदान रहा और सभा ने राज्य स्तर पर हुए सफल सत्याग्रह को ध्यान में रखकर अपना पूर्ण समर्थन निज़ाम के क्रूर शासन के विरुद्ध आर्य महासत्याग्रह करने के लिए स्वीकृति प्रदान की।
पहला जत्थे का नेतृत्व महात्मा नारायण स्वामी जी, अध्यक्ष, सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा का था। इस महासत्याग्रह की बागडोर, फील्ड मार्शल बनाए गए स्वामी स्वतंत्रानंद जी महाराज। फील्ड मार्शल ने बड़े सोंच समझकर आंदोलन को सुचारू रूप से चलने और लगातार सत्याग्रहियों की भर्ती, बाहर से पधार रहे सत्याग्रहियों को यथास्थान पर पहुंचाना और सत्याग्रह में समय और स्थान पर गिरफ्तारी देने का कार्य युवा क्रांतिकारी पंडित गंगाराम जी को सोंपा, जो आर्य वीर दल हैदराबाद रियासत के कप्तान बन नेतृत्व कर रहे थे।
सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के पहले सात जत्थे हैदराबाद निज़ाम राज्य के अलग-अलग प्रमुख स्थानों से सफलतापूर्वक सत्याग्रह कर निज़ाम के जेलों में कैद हो चुके थे। आठवां जत्था पंडित विनायकराव विद्यालंकार के नेतृत्व में अहमदनगर से 1500 सत्याग्रहियों का कुच करने के लिए निकलने वाला ही था कि निजाम के खुफिया तंत्र द्वारा निज़ाम प्रशासन को सूचना मिलने पर तुरंत सभी मांगे मान ली गई। इस प्रकार आर्य महासत्याग्रह का सफलतापूर्वक ध्येय को प्राप्त कर समापन हुआ। लेकिन इस महा सत्याग्रह में देशभर से सम्मिलित हुए युवा से लेकर वृद्ध लोगों ने अपनी आहुति देकर सफल बनाया। हैदराबाद राज्य ही नहीं बल्कि बाहर से आकर आर्यसमाजीयों द्वारा किया गया त्याग व बलिदान ही के कारण सफल हुआ।
हैदराबाद की प्रजा समझ गई की केवल आर्यसमाज ही हमारी रक्षा कर सकता है और आर्यसमाज भी निजाम की हर चाल को समझता और अपनी समाजों द्वारा सेल्फ डिफेंस पर प्रशिक्षण देता और किसी भी अप्रत्याशित घटनाओं को नाकाम करने के लिए योद्धाओं को तैयार करता। आर्य समाज ने अपनी सुरक्षा के लिए शस्त्र आदि से सुसज्जित ही नहीं बल्कि पूर्ण प्रशिक्षण शिविर लातूर में लगाकर राज्य भर के आर्यसमाजों के पदाधिकारीयों को अस्त्र-शस्त्र विद्या का बोध कराकर, सशस्त्र विद्या का पाठ पढ़ाया। प्रशिक्षण में निपुण बनाकर उन्हें जाति, धर्म को बचाने के लिए प्राण शक्ति का संचार किया। इस प्रशिक्षण शिविर लातूर से हैदराबाद लौटने पर युवा क्रांतिकारी पंडित गंगाराम जी, मंत्री आर्य प्रतिनिधि सभा हैदराबाद राज्य, पंडित दत्तात्रेय प्रसाद वकील एवं वैद्य वामनराव जी को नामपल्ली स्टेशन पर ही दबोच कर गिरफ्तार कर लिया गया और हैदराबाद तथा गुलबर्गा जेल में बंद रखा गया। हैदराबाद का भारत में विलय के बाद यानी भारत के स्वतंत्रता होने के 13 महीने पश्चात इन्होंने खुली हवा में सांस ली, जेल से बाहर आए।
आर्य रक्षा समिति ने जो कार्यक्रमों को चलाया, वहां पर मौत का साया मंडराता रहता था। जोखिम भरे कार्य में जो कोई अपने को समर्पित करता था, वह क्या किसी से भी डर सकता, न निज़ाम प्रशासन से, न निज़ाम के जुल्मों से, वह इतना संघर्ष करता फिरता है की जीवन भर उसका अन्तिम चरण स्वतंत्रता ही रहती थी। उनका दृढ़ मत ” शठे शाठ्यं समाचरेत् ” अर्थात दुष्ट को उसी की नीति से समाप्त करना चाहिए। हैदराबाद को ऐसे ही नहीं मिली स्वतंत्रता, भारत में विलय। आर्यों के त्याग, तपस्या, जेलों में क्या मौत के मुंह में जाने के समान नहीं था ? पूरे भारतवर्ष से आर्यों ने भाग लिया और हैदराबाद के जेलों को भर दिया। कईयों ने जेल के अंदर अपने प्राण त्यागे, तो कईयों ने दुषित वातावरण के कारण बाहर आने पर प्राण चले। इन हुतात्माओं के बलिदान के कारण ही हैदराबाद को भारत में विलय होने में आसानी हुई।
इन बलिदानों, हुतात्माओं, प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से हैदराबाद की मुक्ति में जिन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर किया, उनको श्रद्धांजलि अर्पित करने, इन पूर्वजों की याद में विजयदशमी पर्व पर जुलूस का आयोजन 1939 से हैदराबाद निजाम राज में कुछ स्थानों पर निकलता था। निज़ाम से मुक्ति के बाद पहला भव्य जुलूस गुलबर्गा में पंडित विनायकराव विद्यालंकर जी को गजारूढ होकर इसकी शुरुआत की गई 1948 में। यहां यह बताया गया की हाथी की सवारी एक सामान्य नागरिक भी कर सकता है, हाथी की सवारी केवल निजाम के आरक्षित नहीं है। हैदराबाद में प्रतिवर्ष विजयदशमी के अवसर पर भव्य जुलूस का आयोजन किया जाने लगा। आर्यसमाजीयों की टोलियां, गीतों से, भजनों से और दूसरे माध्यमों से उन्हें श्रद्धांजलि देती थी और हैदराबाद का कोई घर ऐसा ना होता था जो इस जुलूस का हिस्सा ना हो।
आर्य नगर (शाहअली बंडा) से, बोलारम से और इस तरह नगर के सभी ओर से आर्यसमाज किशनगंज पर इकट्ठा होते और क्रमबद्ध होकर केशव स्मारक आर्य विद्यालय, नारायणगुड़ा में एक विशाल सभा में परिवर्तित होते और बड़े ही ओजस्वी भाषणों के बाद इसका समापन होता। यह प्रथा सन् 1949 से निरंतर चल रही है। आजकल समापन आर्य समाज सुल्तान बाजार में हो रहा है। हैदराबाद का विलय भारत में हो चुका और हम स्वतंत्र हो गये, तब हैदराबाद आर्य प्रतिनिधि सभा का नेतृत्व पंडित विनायकराव विद्यालंकर, अध्यक्ष और क्रांतिवीर पंडित गंगाराम वानप्रस्थी, मंत्री ने हैदराबाद में इन प्रथा को अपनाया।
अलग-अलग आर्यसमाजों से जो जुलूस निकलते और अंतिम स्थान पर पहुंचने के रास्ते भर, इन आर्य बंधुओ, श्रद्धालुओं की आव भगत होती, प्रसाद और जलपान से स्वागत सत्कार किया जाता, मार्ग के दोनों ओर श्रद्धालुओं की भीड़ रहती जो पूरा प्रोत्साहन देकर जुलूस को अपना समर्थन व्यक्त करती, आर्यसमाज के साथ-साथ कई हिंदू संस्थाएं इसमें बढ़कर चढ़कर भाग लेती और हैदराबाद के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वालों की हृदय पूर्वक नमन करते हैं।
लेखक : भक्त राम अध्यक्ष, पंडित गंगाराम स्मारक मंच
