विशेष लेख : दस बुराइयों से छुटकारा पाना ही विजयादशमी पर्व का है मूलमंत्र

आज (गुरुवार) विजयदशमी है। विजयादशमी हिदुओं का प्रमुख पर्व है। इसे विजयदशमी भी कहते हैं। इसे दशहरा भी कहते हैं। दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द ” दश – हर ” से हुई है। जिसका शाब्दिक अर्थ दस बुराइयों से छुटकारा पाना है। जिस प्रकार ज्ञान के लिए मां सरस्वती की पूजा की जाती है। उसी प्रकार शक्ति के लिए मां दुर्गा की उपासना की जाती है।

विजयादशमी का त्योहार दस दिनों तक चलता रहता है। अश्विन मास शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से इसका आरंभ होता है। दशमी के दिन इसकी समाप्ति होती है। प्रतिपदा के दिन प्रत्येक हिन्दू परिवार में देवी भगवती की स्थापना की जाती है। गोबर से कलश सजाया जाता है। कलश के ऊपर जौ के दाने खोंसे जाते हैं। आठ दिनों तक नियम पूर्वक देवी की पूजा, कीर्तन और दुर्गापाठ होता है। नवमी के दिन पांच कन्याओं को खिलाया जाता है। इसके बाद देवी दुर्गा का विसर्जन किया जाता है। इस उत्सव को नवरात्र भी कहा जाता है।

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इन दिनों में पूजा करने वाले बड़े संयम से रहते हैं। दशमी के दिन विशेष उत्सव मनाया जाता है। दशहरा दस पापों को नष्ट करने वाला माना जाता है। इस पर्व को कुछ लोग कृषि प्रधान त्यौहार के रूप में मनाते हैं। इसका संबंध उस दिन से जोड़ते है, जब श्री रामचन्द्र ने लंका के राजा रावण को मारकर विजय प्राप्त की थी। इसलिए यह विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है।

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विजयादशमी के साथ अनेक परंपरागत विश्वास भी जुड़े हुए हैं। इस दिन राजा का दर्शन शुभ माना जाता है। इस दिन लोग “नीलकंठ” के दर्शन करते हैं। गांवों में इस दिन लोग जौ के अंकुर तोड़कर अपनी पगड़ी में खोंसते हैं। कुछ लोग इसे कानों और टोपियों में भी लगाते हैं। उतर भारत में दस दिनों तक श्री राम की लीलाओं का मंचन होता है। विजयदशमी का अंतिम दिन होता है। इस दिन रावण का वध किया जाता है तथा बड़ी धूमधाम से उसका पुतला व उसके साथ कुंभकर्ण और मेघनाथ का पुतला भी जलाते हैं।

कई स्थानों पर बड़े बड़े मेले लगते हैं। राजस्थान में शक्ति पूजा की जाती है। मिथिला और बंगाल में अश्विन शुक्लपक्ष में मां दुर्गा की पूजा की जाती है। मैसूर का दशहरा पर्व देखने लायक होता है। वहां इस दिन ‘चामुंडेश्वरी देवी’ के मंदिर की सजावट अनुपम होती है। महराजा की सवारी निकाली जाती है। प्रदर्शनी भी लगती है। यह पर्व सारे भारत में धूमधाम से मनाया जाता है।

विजयदशमी के अवसर पर क्षत्रिय अपने अस्त्र शस्त्रों की पूजा करते हैं। जिन घरों में घोड़ा होता है, वहां विजयदशमी के दिन उसे आंगन में लाया जाता है। उसके बाद उस घोड़े को विजयदशमी की परिक्रमा कराई जाता है और पुरुष घोड़े पर सवार होते हैं। इस दिन तरह तरह की चौकियां निकाली जाती है। ये चौकियां अत्यंत आकर्षक होती हैं।

दर्शन सिंह मौलाली हैदराबाद

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