[नोट- दिवंगत डॉ अहिल्या मिश्र जी पर यह पहला संस्मरण लेख है। अहिल्या जी के बारे में जितना भी कहा जाये या लिखा जाये उतना कम ही है। फिर भी लेखकों की भावनाओं को सम्मान करते हुए ‘तेलंगाना समाचार’ अहिल्या जी के बारे में संस्मरण लेख आमंत्रित करता है। लेखकों से अनुरोध है कि वे अपनी रचनाएं- 9492925120 पर अपना फोटो या हो सके तो अहिल्या के साथ खींची गई तस्वीर भेज सकते हैं। प्राप्त लेखों को प्रकाशित किया जाएगा।]
‘वे जो अब नहीं रहे’ की भूमिका लिखने वाली अहिल्या मिश्र जी अब स्वयं भी नहीं रहीं. वे भी अब ‘वे अब नहीं रहे’ में शामिल हो गयी हैं. दरख्ती दीवारों से जिंदगी को झाँकते हुए उनका महाप्रस्थान… बहुत ही दुखद… हैदराबाद के हिंदी साहित्य जगत में उनकी कमी हमेशा खलती रहेगी। यहाँ पर मैं ‘वे जो अब नहीं रहें’ शीर्षक पुस्तक का संक्षेप में जिक्र करना चाहूंगा. यह कृति हाल ही में न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन पंचकुला हरियाणा से प्रकाशित होकर आयी है.
दिवंगत हो चुके हिंदी और तेलुगु के दिग्गज साहित्यकारों पर मेरे द्वारा लिखे गए संस्मरणों का संग्रह है यह. इसमें तेलंगाना के प्रसिद्ध जनकवि गद्दर (ग़दर), हंस संपादक राजेन्द्र यादव, हैदराबाद के ही पत्रकार और प्रमुख सिविल लिबर्टी कार्यकर्त्ता एम टी खान, ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त तेलुगु कवि व गीतकार सी नारायण रेड्डी, जानी-मानी दिग्गज अनुवादक शांता सुंदरी, दक्षिण समाचार संपादक मुनीन्द्र, नेहपाल सिंह वर्मा, मटमरी उपेंद्र, डॉ वेंकटेश्वर, भगवान दास जोपट, डॉ पशुमूर्ति सत्यनारायण मूर्ति और तेलुगु की प्रथम गजल लेखिका बैरी इंदिरा पर लिखे संस्मरण संग्रहित है. जैसा कि मैने पहले ही बतलाया है मेरा इस पुस्तक के बारे में यहाँ पर जिक्र करने का मुख्य उद्देश्य यह है कि इसकी भूमिका अहिल्या ज़ी ही ने लिखी है. इनमें भी अधिकतर लोग उनसे परिचित ही थे.

31 जनवरी 2026 को जन गायक गद्दर जयंती के अवसर पर आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा रविंद्र भारती में कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है. चूंकि मेरी इस पुस्तक में गद्दर से सम्बंधित संस्मरण भी है। इसलिए इसके लोकार्पण की भी योजना है. दुःख है कि इस अवसर पर इसकी भूमिका लिखने वाली अहिल्या मिश्रा जी नहीं रहेंगी.
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अहिल्या जी के साथ मुझे भी कई मंच शेयर करने का मौका मिला है. इसे मैं अपना सौभाग्य ही मानता हूँ. मंच पर उनकी अपनी पर्सनालिटी की तरह ही बुलंद आवाज रही है. बिना पूर्व तैयारी के आकर भी पूरे कॉन्फिडेंस के साथ बोलने में वे सिद्धहस्त थीं. एक भी फिजूल शब्द नहीं. उनकी उपस्थिति ही मंच को अजीब सी गरिमा प्रदान करती थी. वे मंच की शान होती थीं.

मुझे अच्छी तरह याद है पूर्व कैदी और पत्रकार के. राजन्ना के हिंदी में लिखे आत्मकथात्मक उपन्यास ‘फांसी’ के तेलुगु अनुवाद ‘उरीकंबम नीड़लो’ के लेकार्पण समारोह में विशेष अतिथि के तौर पर भाग लिया. इस दौरान तेलुगु के दिग्गज साहित्यकारों के बीच हिंदी में बोलने वाली वे अकेली हीं थीं. (मैने भी अपनी बात तेलुगु में ही रखी थी). परन्तु उनमें किसी तरह की इन्फीरियारिटी नहीं. उन्होंने अपनी बात हिंदी में ही रखी बिल्कुल उस अंदाज में जैसा की हिंदी साहित्यिक मंच पर रखती थीं. गजब का कॉन्फिडेंस लेवल था उनका. यह भी संयोग ही था कि इसके मूल हिंदी ‘फांसी’ के लोकार्पण समारोह में भी वे मंच पर थीं.

‘उरीकंबम नीडलो’ लोकार्पण में डॉ अहिल्या मिश्र जी
इतना ही नहीं, ग्वालियर से निकलने वाली पत्रिका ‘किस्सा-कोताह’ में हिंदी में महिला आत्मकथा लेखन पर उनका एक विस्तृत आलेख प्रकाशित हुआ था. इस आलेख में उन्होंने हिंदी के प्रायः सभी महिला लेखकों के आत्मकथाओं को समेटा था. इसमें कोई शक नहीं की यह आलेख उन्होंने बहुत ही अध्ययन और श्रम से तैयार किया गया था. इसे एक शोध आलेख कहा जा सकता है. इस आलेख पर मैने भी एक विस्तृत टिप्पणी लिखी थी. एक साहित्यिक मंच पर जब हम पास-पास बैठे थे तो उन्होंने कहा था, “श्याम जी वह लेख और आपकी टिप्पणी को मिलाकर एक पुस्तिका निकलना चाह रही हूँ.” अब अचानक उनके चले जाने से वह योजना धरी की धरी रह गयी है.
अहिल्या जी हमारे वाजा (राइटर्स एन्ड जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया) तेलंगाना विंग की संस्थापक सदस्या ही नहीं, मुख्य सलाहकार भी थीं. उनके चले जाने से हैदराबाद के हिंदी साहित्यिक मंचों में उनकी रिक्तता हमेशा खलती रहेगी. हैदराबाद के हिंदी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को कभी भी नाकारा नहीं जा सकता है. वे हिंदी के भाववादी विचारधारा की एक सशक्त हस्ताक्षर थीं. मैने कभी नहीं सोचा था कि उन पर संस्मरण लिखूंगा. पर अब भरे दिल से लिख रहा हूं. सारे वाजा परिवार की तरफ से दिवंगत आत्मा को भावभीनी श्रद्धांजलि.

एन आर श्याम
अध्यक्ष वाजा (तेलंगाना विंग)
8179117800
