स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर जी की 60वीं पुण्यतिथि पर उनके जीवन, विचार और राष्ट्र के प्रति उनके अद्वितीय योगदान को स्मरण करना प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व और प्रेरणा का विषय है। वैसे तो वीर सावरकर को कौन नहीं जानता ? सभी राष्ट्र वादी उनके जीवन से परिचित हैं और उनके आदर्शों पर चलने का प्रयत्न करते रहते हैं। यहां पर उनके जीवन की कुछ अनकही, अनसुनी और लुप्त हुई बातों को पाठकों तक पहुंचाना इस लेख का उद्देश्य है।
हैदराबाद मुक्ति संग्राम में आर्य समाज का कार्य और भूमिका अभूतपूर्व रही है। हम बात करते हैं 1937 से 1939 की निज़ाम शासन ने हैदराबाद में हिंदुओं के साथ हो रही [इन] ज्यादतियों को न देख पाकर आर्य समाज ने आर्य सत्याग्रह आरम्भ कैसे करें, इस पर विचार करने लगे। हैदराबाद के स्थानीय क्रांतिकारी नेतागण, आर्य समाज के केंद्रीय संस्थान सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा द्वारा कोई भी निर्णय लेने में विलम्ब को देखते हुए बड़े चिंतित थे। इसी बीच पंडित गंगाराम जी ने अपने साथियों से मिलकर आर्य रक्षा समिति (Aryan defence league) का गठन किया। इस संगठन में उनके प्रमुख साथी गण रहे- श्री राजपाल, प्रताप नारायण, ए. बालरेड्डी, सोहनलाल, विश्वनाथ आदि।
यहां पर यह बताना आवश्यक है की क्रांतिकारी नवयुवक गंगाराम जी पहले निजाम शासन के विरुद्ध सीरियल बम विस्फोट, जहर कांड और प्रताप सिंह बम कांड आदि में जेल के अंदर बाहर होते रहे। यहां की हिंदू प्रजा को जागरूक करने के लिए ऐसे कदम उठाते रहे और उनके साथियों में भी श्री ए बाल रेड्डी, प्रताप नारायण, हरीचंद, राजपाल, सोहनलाल, विश्वनाथ आदि रहे। आर्यन डिफेंस लीग (आर्य रक्षा समिति) ने पंडित दत्तात्रेय प्रसाद वकील जी के साथ मिलकर आर्य सत्याग्रह का कार्यक्रम सोचा। पंडित दत्तात्रेय जी ने सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के विलम्ब के कारण कहा ” भाई आप सोचते रहो, हम तो सत्याग्रह शुरू कर देते हैं।” आर्य रक्षा समिति ने हैदराबाद निजाम रियासत के स्तर पर सत्याग्रह शुरू कर दिया।

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निजाम प्रांतीय समिति के नेतृत्व में लगभग 22 जत्थों ने सत्याग्रह किया। इन जत्थों का नेतृत्व करने वाले सर्वाधिकारी – अधिनायक – डिक्टेटरों के कुछ नाम इस प्रकार हैं। सर्वश्री देवीलाल आर्य (हैदराबाद), सी. नरहरि (हैदराबाद), दत्तात्रय प्रसाद जी वकील (गुलबर्गा), शेषराव वाघमारे (निलंगा), दिगंबरराव शिवनगीकर (लातूर), शंकरराव पटेल (अंधोरी), शंकरदेव कापसे (वडवल नागनाथ), निवर्त्ति रेड्डी (अहमदपुर), गणपतराव कथले (कलम), पंडित बंसीलाल जी व्यास (हैदराबाद), एडवोकेट दिगंबरराव लाठकर (नांदेड़), श्री राम चौधरी (मुखेड़ )आदि। निजाम रियासत के लगभग 5000 सत्याग्रहियों ने सत्याग्रह में भाग लिया।
आर्य समाज का काम जोर – शोर से होने लगा था, आर्य सत्याग्रह का नेतृत्व में निजाम सरकार रियासत के क्षेत्र में अखिल भारतीय स्तर पर स्वामी स्वतंत्रता नंद महाराज और भाई बंसीलाल जी कर रहे थे तो उसको पूर्ण समर्थन देने वाली सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा का नेतृत्व श्री घनश्याम सिंह गुप्त और श्री लाल देश बंधु गुप्त कर रहे थे, घनश्याम सिंह जी और देश बंधु जी कांग्रेस के भी जाने-माने नेता थे।
कांग्रेस सत्याग्रह का नेतृत्व (प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप में) स्वयं महात्मा गांधी जी कर रहे थे, उन्होंने इन दोनों कांग्रेसी नेताओं श्री घनश्याम सिंह गुप्त एवं लाला देश बंधु गुप्त को परामर्श दिया कि आर्य समाज अपना अलग से सत्याग्रह न करके कांग्रेस के झंडे तले आंदोलन जारी रखे, वरना आर्य समाज को निज़ाम सरकार सांप्रदायिक बताकर कमजोर कर देगी और देश भर में हिंदू – मुस्लिम दंगे करवा देगी, आर्य समाज से अहिंसक सत्याग्रह हो भी नहीं सकेगा आदि।
गांधी जी की यह बात इन दोनों नेताओं को जंची और उन्होंने आर्य सम्मेलन की विषय निर्वाचन समिति में इसे रखा। समिति के सभी सदस्य इसे स्वीकार करने का निर्णय लेने ही वाले थे कि कुंवर चांदकरण शारदा जी ने कहा कि हमने कुछ प्रमुख नेताओं जैसे वीर सावरकर आदि को भी आमंत्रित किया है, उनकी राय भी मालूम करना चाहिए, तब वीर सावरकर जी से पूछा गया, उन्होंने कहा : “मैं समझता था कि यहां बैठे ये बड़े लोग दयानन्द के भक्त हैं। दयानन्द के समान सत्य के पुजारी हैं। दयानन्द के समान सत्य की रक्षा करने के लिए सब कुछ त्यागने को तैयार हैं। पर मुझे तो एक भी ऐसा नहीं दिख रहा है।” आदि यह बातें सुनकर सबके विचार बदले और एकमत में सर्व सम्मति से निर्णय हुआ कि आर्य सत्याग्रह सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के अधीन चालू रहेगा। ऐसे समय में उस महान वीर सावरकर के दिखाये मार्ग और संदेश पर आर्य समाज के विकास के लिए कार्य करने का एक फिर हम संकल्प लेते है।
संदर्भ ग्रंथ :
जीवन संग्राम क्रांतिवीर पंडित गंगाराम वानप्रस्थी
‘परोपकारी’ मासिक जून 2007

लेखक : भक्त राम
अध्यक्ष पंडित गंगाराम स्मारक मंच
