सनातन संस्कृति में ज्ञान की शिक्षा “श्रुतियों” में गूढ़ दार्शनिक भाषा, गूढ़ शब्दावली में दी गई है और “स्मृतियों” में रोचक कथा और कथानक रूप में। किंतु इन कथानकों का निहितार्थ सरल नहीं है। मात्र अभिधा से इसे नहीं जाना जा सकता, इसकी समग्र समझ के लिए लक्षणा और व्यंजना का सहारा लेना पड़ेगा। और जब बात इतने से भी नहीं बनेगी तो हमें अध्यात्म और दर्शन की शरण में जाना पड़ेगा। इन कथानकों को योग और तंत्र शास्त्र तथा विज्ञान की दृष्टि से भी पड़ताल करेंगे यदि आवश्यक हुआ। श्री दुर्गा सप्तशती के कथानकों को आज इसी समुन्नत दृष्टि और सुमति के आलोक में समग्रता से समझने का प्रयास करेंगे।
प्रथम अध्याय:
राजा सुरथ और उनके संपन्न राज्य, उनके राज्य का अपहरण और राज्य के निष्कासन जैसी लौकिक परिस्थितियों से होता है। यदि हम मात्र लौकिक दृष्टि से देखें तो यह बालकथा, कहानियों से अधिक कुछ नहीं। किंतु आध्यात्म और दर्शन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
राजा सुरथ इस काया रूपी शरीर में स्थित हमारी ही जीवात्मा है। जब तक जीवन रूपी शरीर (रथ) में जुते घोड़े (इंद्रियां) विवेक रूपी चाबुक से सही दिशा के गतिशील है। रथ और रथी को समझने के लिए पाठकों को कठोपनिषद पढ़ना चाहिए जहां यमाचार्य ने नचिकेता को उपदेश देते हुए कहा – “आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च”।। (कठ..उप 1.3.3) अर्थात् इस जीवात्मा को तुम रथी, रथ का स्वामी, समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथी, रथ हांकने वाला, और मन को लगाम समझो। पुनः आगे कहा – “इंद्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः”।। (1.3.4)। मनीषियों ने इंद्रियों को इस शरीर-रथ को खींचने वाले घोड़े कहा है, जिनके लिए इंद्रिय-विषय विचरण के मार्ग हैं, इंद्रियों तथा मन से युक्त इस आत्मा को उन्होंने शरीररूपी रथ का भोग करने वाला बताया है। हमारा मन ही इस सुन्दर रथ पर रथी बनकर “सुरथ” रूप में है। मन की चाँचल्य दशा, विवेकी चाबुक की शिथिलता और घोड़ों (इंद्रियों) की मनमानी ने राजा सुरथ की विरथ कर दिया है। अब वे जंगल में खाक छानने को विवश हैं।
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अतः हम कह सकते है कि इस कथा में राजा सुरथ ही इस काया की कायस्थ आत्मा/जीवात्मा है। जीवन मूल्यों का खो जाना ही उनकी तड़प है। न्यायोचित प्रजा पालन ही उनका ध्येय है, नैतिक मूल्य है। यह नाभि चक्र ही राजधानी है। सुरथ को अनेक कुचक्रो और कुटिलताओं का शिकार होना पड़ता है और अंतः उनको अपने राज्य से पलायित होना पड़ता है। यह संसार ही विराट वन है। इस वन में भ्रमण करते करते राजा सुरथ की भेट समाधि नामक एक व्यक्ति से होती है। “समाधि” शब्द भी दार्शनिक अवधारणाओं से युक्त एक विशद और गंभीर संकल्पनाओं से युक्त एक विशाल वृत्तियुक्त शब्द है। समाधि मन की ही गहनतम अवस्था है। यह समाधि नामक वैश्य वृत्ति व्यक्ति भी समरसता में डूबा हुआ एक भावुक और संवेदनशील व्यक्ति है। यह कर्मकांडी है, योगी है, कर्मयोग का व्यापार है, इसलिए इसे वैश्य कहा गया है। समाधि भी लगाता है किंतु कैवल्य भंग होने से यह क्षुब्ध है। सुरथ और समाधि दोनों ही भटकाव की दशा में हैं। दोनों ही सांसारिक मोह माया से बद्ध, भौतिकता और ममत्व से घिरे हुए हैं। स्मृतियां और यादें उनका पीछा नहीं छोड़ती है।
दोनों गुरु के पास गए, सौभाग्य से उन दोनों की भेंट एक सत्यदृष्टा, तत्वदर्शी, पौरुष शक्तियों से सम्पन्न “मेधा” ऋषि से होती है। “धि” का अर्थ होता है बुद्धि, जो अपनी बुद्धि में स्थित ही, बुद्धि ही ज्ञान है, यह ज्ञान भी विशुद्ध होकर प्रज्ञान बन जाय, ऐसे प्रज्ञान सम्पन्न ऋषि ही मेधा या सुमेधा हो सकता है। यही जीव का विज्ञान बोध भी है। यही सुमति और यही संपूर्ण पुरुषार्थ सम्पन्न जीवन दशा है। दोनों ने ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरुपसदन किया, वहां संगति से विवेक प्राप्त हुआ, सत्संग से विवेक प्राप्त होता है – “बिनु सत्संग विवेक न होई”। गुरु ने शिक्षा भी दी किंतु वेदांत की शब्दावली में नहीं, एक कहानी की शब्दावली में। वेदांत शिक्षण के लिए शिष्य को मुमुक्षत्व, साधन चतुष्टय और षटसंपत्तियों से संपन्न होना चाहिए। उन्होंने मोह के बारे में प्रश्न किया, मुक्ति के बारे में नहीं। उत्तर भी मोह के बारे में ही है कि मोह क्या है? और क्यों है? इसी स्थल पर कथा एक मोड़ लेती है। मेधा ऋषि ब्रह्मा जी, विष्णु जी, देवी मां और मधु – कैटभ की कथा सुनाते हैं।
सनातन संस्कृति में ज्ञान की शिक्षा का सर्वोत्तम ग्रंथ श्रुति (वेद/वेदांत) है। स्मृति (पुराणों) में यह प्रतीक, कथा – कहानी के रूप में वर्णित हुई है। कल हम लोगों ने दुर्गासप्तशती के प्रथम अध्याय में वर्णित कथानक में सुरथ, समाधि और मेधा शब्द प्रतीकों के निहितार्थ को जाना।
राजा सुरथ से ऋषि मेधा जी से एक प्रश्न किया – “तत् किं एतत महाभग यनमोहो ज्ञानीनोरपि। ममस्य च भवत्येषा विवेकंधस्य मूढ़ता” (प्र.अ. 44/45)। मेधा ऋषि ने उत्तर दिया कि विषयों का ज्ञान तो सभी जीवों को है। क्या तुम यह नहीं देखते नरश्रेष्ठ! कि मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभ, मोह से ग्रस्त हैं। बात ऐसी है कि ये सभी देवी महामाया के प्रभाव से ही बलात मोह, ममता के भंवरजाल में फंसकर गर्त में गिराए गए हैं। वे ही महामाया, “अविद्या रूप” में यदि फंसती हैं तो “विद्या देवी” बनकर इस बंधन से मुक्त भी करती हैं, वही सनातन हैं, सनातनी है, सर्वस्व हैं, सर्वेश्वरी हैं – “सा परमाविद्या मुक्ति हेतु:भूता सनातनी” (प्र.अ. 57)। समस्याओं से मुक्ति के लिए समस्या का ज्ञान, उसके लिए जिज्ञासा और प्रश्न ये समस्या से मुक्ति हेतु आवश्यक हैं। अब जिज्ञासा के प्रश्न पर मेधा ऋषि देवी के तात्विक स्वरूप की व्याख्या करते हैं। और साथ ही बंधन का कारण बताते हुए विष्णु तथा मधु – कैटभ संग्राम की कथा सुनाते हैं।
ऋषि ने कहा – “नित्यैव सा जग जगन्मूर्ति: यया सर्वमिदं तत”( प्र.अ. 64)। यह श्रुति वचन है, वेदांत है। किंतु 65 से जो प्रारम्भ होता है, वह स्मृति है, “स्मृति” श्रुति का, तत्त्वदर्शन का प्रतीकों, कथा, कहानी में रूपांतरण है।
कथा इस प्रकार है: भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेष शय्या पर सो रहे थे। उसी समय उनके कान से “कर्णमल से” दो दैत्य उत्पन्न हुए और ब्रह्म जी को द्वंद्व युद्ध के लिए ललकारते हुए भयभीत करने लगे। ब्रह्मा जी भयभीत होकर विष्णु भगवान को अपनी रक्षा हेतु स्तुति कर जगाने का प्रयास करते हैं, किंतु विष्णु जगते नहीं। वैसे ही गहन निद्रा में सोए रहते हैं। थोड़ी देर बाद सूक्ष्म ज्ञान से ब्रह्मा जी को इस बात का बोध हो जाता कि आद्या देवी ने विष्णु को अपनी योगमाया के अधीन कर सुला दिया है। ब्रह्मा जी देवी आराधना कर उनको प्रसन्न करते हैं। भगवान विष्णु की निद्रा भंग होती है, वस्तु स्थिति जानकर दोनों दैत्यों से उनको 50 हजार वर्षों तक द्वंद्व युद्ध होता है। विष्णु दैत्यों को परास्त नहीं कर पाते हैं क्योंकि उनको देवी से ही इच्छा मृत्यु का वरदान पूर्व में ही प्राप्त होता है। अंत में देवी द्वारा मोहित दोनों दैत्य शब्दजाल में फंसकर अपनी मृत्यु का पथ प्रशस्त करते हैं और भगवान विष्णु द्वारा उनका बध कर दिया जाता है। यदि आप इसे किसी मनोरंजक कहानी की तरह पढ़ेंगे या श्रवण करेंगे तो आप “बालबुद्धि” हैं और यदि किसी बुद्धिमान व्यक्ति की तरह इसका मनन – मंथन, युक्ति के साथ करेंगे तो आप “मनीषी” हैं। कथा का सारा रहस्य श्रवण और मनन के बीच छिपा हुआ है।
दुर्गासप्तशती में तो नहीं, किंतु “देवीभागवत” इस कथा के रहस्योद्घाटन से पूर्ण श्रवण और मनन में भेद भी करता है और इनमें अंतर भी स्पष्ट भी करता है। तो क्यों न थोड़ी यात्रा देवीभागवत की भी कर ही लिया जाय? वह कहता है कि “जीवन्ति पाश्वत: सर्वे खादन्ति मोहयंति च…”। इतनी बात तो सप्तशती भी कहती है। उसके आगे देवीभागवत उसमें जोड़ता है कि ग्रंथ श्रवण तीन प्रकार का होता है –
(क) सात्विक:
ये उत्तम कोटि के श्रोता हैं जो सात्विक भाव वाले श्रोता हैं वे वेदांत, उपनिषद, पुराण सुनते हैं और उसको गुनते हैं। मनन, मंथन करते हैं और मोक्ष/मुक्ति को प्राप्त करते हैं।
(ख) राजसिक:
ये माध्यम कोटि के है जो राजसिक भाव वाले श्रोता है वे साहित्य, कला, राजनीति, शस्त्र विद्या, विज्ञान आदि में रुचि रखते हैं और स्वर्ग/लोक की प्राप्ति करते हैं।
(ग) तामसिक:
ये अधम कोटि के हैं जो तामसिक भाव वाले श्रोता हैं वे परनिंदा, छिद्रान्वेषण, दोष दर्शन, चुगली, निजी स्वार्थ सिद्धि हेतु स्तुति में रुचि रखते हैं और भोग को (इंद्रियभोग को) प्राप्त करते हैं। “तामस” भी तीन प्रकार के होते हैं (i) उत्तम: पापचारी, दुराचारी संहार संबंधी प्रकरण में रुचि। (ii) मध्यम: आपसी द्वेष में शत्रुता, युद्ध (iii) अधम: अकारण विवाद में कलह, स्त्रोत। कुल मिलाकर स्मृति / पौराणिक ग्रंथों में प्रधानता श्रवण वृत्ति की ही है – “… तदत्र श्रवणम मुख्यं पुराणस्य महामते” (दे.भा. 1.6.7)।
डॉ. जयप्रकाश तिवारी (94533 91020)
बलिया/लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
