शिव नाम की गूंज से गूंज उठा रहा है सलेश्वरम लिंगमय्या जातरा, जानें के लिए यह है रास्ता और बस सुविधा

ऊँचे-ऊँचे पहाड़। गहरी खाई वाली घाटियाँ। प्राकृतिक जलप्रपात को पार करते हुए पूर्णिमा की चाँदनी में घने जंगलों के बीच “आ रहे हैं लिंगमय्या, आ रहे हैं…” कहते हुए भगवान के दर्शन के लिए जो साहसिक यात्रा की जाती है, वही है- सलेश्वरम। इसलिए इसे दक्षिण भारत की अमरनाथ यात्रा तथा तेलंगाना की अमरनाथ यात्रा के नाम से भी जाना जाता है।

हर वर्ष उगादी के बाद पहली पूर्णिमा, अर्थात चैत्र शुक्ल पूर्णिमा के दिन नल्लमल्ला जंगलों में होने वाली सलेश्वरम लिंगमय्या जातरा इस वर्ष मंगलवार (31 मार्च) से प्रारंभ हुई। इस महीने 3 अप्रैल (शुक्रवार) दोपहर तक ही जंगल में प्रवेश कर भगवान सलेश्वर के दर्शन किए जा सकते हैं।

चार दिनों तक चलने वाली यात्रा

तेलंगाना राज्य के नागरकर्नूल जिले में, हैदराबाद से श्रीशैलम जाने वाले मार्ग पर मुननूर को पार करने के बाद फरहाबाद पुलिबोम्मा से लगभग 35 किलोमीटर अंदर घने जंगलों में सलेश्वरम क्षेत्र स्थित है। 10 किलोमीटर जाने पर सड़क किनारे निजाम काल का एक प्राचीन भवन दिखाई देता है। वहाँ से बाईं ओर 23 किलोमीटर जाने पर सलेश्वरम बेस कैंप पहुँचते हैं।

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यहाँ पर रामपुर चेंचु पेंटा में वाहनों की पार्किंग की व्यवस्था है। वहाँ से सलेश्वरम जलप्रपात तक लगभग 4 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। रास्ते में भक्तों के लिए दानदाताओं द्वारा पीने के पानी की व्यवस्था की जाती है।

लिंगाल क्षेत्र से आने वाले भक्त पहले कोदंड रामस्वामी ब्रह्मोत्सव के दौरान रथ दर्शन करते हैं, फिर अप्पायिपल्ली होते हुए गोरजा गुंडाल तक वाहनों से पहुँचते हैं और वहाँ से लगभग 15 किलोमीटर पैदल चलकर सलेश्वरम पहुँचते हैं।

यहाँ दो ऊँचे पहाड़ समानांतर खड़े हैं, जिनके बीच गहरी घाटी में जलधारा गिरती है। रास्ता अत्यंत दुर्गम है। कहीं संकरी पगडंडियाँ, कहीं फिसलन भरे पत्थर। ज़रा सी चूक होने पर दुर्घटना का खतरा रहता है।

जब जलकुंड (गुंडम) तक पहुँचते हैं, तो वहाँ का दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है। पानी अत्यंत ठंडा, स्वच्छ और औषधीय गुणों से युक्त माना जाता है। भक्तों की आस्था है कि दो पहाड़ों के बीच लगभग 280 फीट ऊँचाई से गिरते इस जलप्रपात में स्नान करने से सभी रोग दूर हो जाते हैं।

कुंड के किनारे पूर्व दिशा की ओर दो गुफाएँ एक के ऊपर एक स्थित हैं। ऊपरी गुफा में भगवान शिव लिंग रूप में विराजमान हैं। वर्ष में केवल चार दिन- चैत्र पूर्णिमा से दो दिन पहले और दो दिन बाद ही यहाँ प्रवेश की अनुमति होती है।

यहाँ के स्थानीय चेंचु जनजाति के लोग ही पुजारी होते हैं। दर्शन के बाद लौटते समय भक्त “जा रहे हैं लिंगमय्या…” कहते हुए वापस लौटते हैं। हर वर्ष हजारों श्रद्धालु इस गुफा में विराजमान लिंगमय्या के दर्शन के लिए आते हैं। आपातकालीन सेवाओं के लिए रामपुर पेंटा और सलेश्वरम घाटी में स्वास्थ्य शिविर भी लगाए जाते हैं।

बस सेवाएँ

तेलंगाना के अच्चमपेट डिपो से विशेष बसों की व्यवस्था की गई है। सुबह 6 बजे पहली बस और शाम 4 बजे अंतिम बस चलती है। इन बसों से अप्पापुर पेंटा पहुँचकर वहाँ से ऑटो द्वारा सलेश्वरम जा सकते हैं।

अविस्मरणीय अनुभव

अमेरिका के ग्रैंड कैन्यन की सुंदरता को भी मात देने वाली सलेश्वरम की हरियाली, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक वातावरण यहाँ आने वाले हर व्यक्ति के लिए जीवन भर की यादगार बन जाती है।

कमलेकर नागेश्वर राव ‘कमल’
9848493223

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