हिंदी दिवस पर विशेष लेख : प्रचारक एवं प्रसारक क्रांतिवीर पण्डित गंगाराम वानप्रस्थी

स्वतन्त्रता सेनानी पण्डित गंगाराम वानप्रस्थी, दक्षिण भारत के निज़ाम शासित हैदराबाद रियासत में बसन्त पंचमी के पावन पर्व (08.02.1916) के दिन चन्द्रिकापुर, हुसैनी आलम में एक साधारण-सा परिवार में जन्म लिया। वे अहिन्दी भाषी और मराठी मातृभाषा। अल्प आयु में इनके पूज्य पिताजी अनन्तराम जी प्लेग की महामारी के चपेट में आने के कारण चल बसे। आपने अपनी दादी को भी खो दिया। आपकी एक बड़ी बहन भी इस महामारी में चल बसी। यह सन् 1919 की विनाश लीला के समय में बालक गंगाराम की उम्र केवल 3 वर्ष की थी और इनकी पूज्य माता श्रीमती बाड़ू बाई ने इस अनाथ पुत्र को और पुत्री इनकी छोटी बहन को पाला पोसा, पढ़ाई-लिखाई कर शिक्षित बनाया।

विद्यालयों में तत्कालीन उर्दू राजभाषा होने से उर्दू माध्यम में ही शिक्षा मिली। उसी में पढे लिखे और बड़े हुए और निज़ाम प्रशासन में कार्य किया, जहां पर उर्दू में सभी कार्य करना पड़ा। ऐसी जीवन यात्रा से उन्होंने ऐसी करवट बदली की हैदराबाद की स्वतंत्रता, निज़ाम शासन से मुक्ति एवं हिन्दी में उनका योगदान स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।

आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती ही पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ” भारत भारतीयों के लिए‌ ” का जय – घोष लगाया था, उनके यह मुख्य विचार और प्रेरणा की एक राष्ट्र एक भाषा हिन्दी का अनुसरण ही भारत को परतंत्रता से स्वतंत्रता की ओर अग्रसर करेगा। इसी को आगे बढ़ाते हुए आर्यसमाज में केवल हिन्दी का प्रयोग होने लगा और सभी भारतीयों को एकजुट होने में यह एक अच्छी कड़ी साबित हुई।

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हैदराबाद में आर्यसमाज‌ द्वारा शास्त्रार्थों एवं सम्मेलनों का आयोजन, नए आर्यसमाजों की स्थापना, भाषणों, प्रवचनों, उपदेशों, समाज सुधार के लिए विशेष रूप से दलित- उत्थान के लिए आर्यों की तड़प व संघर्ष ने पंडित गंगाराम को बहुत आकर्षित व प्रभावित किया। इनके इन कार्यों के द्वारा वर्चस्व बढ़ाने में/युवाओं को आकर्षित करने में आर्यसमाज तेजी से आगे बढ़ रहा था।

ऐसे ही आर्यसमाज की कार्यकलापों से प्रभावित होकर पंडित गंगाराम ने सेवा कार्यों में सक्रिय भाग लेना आरम्भ किया। हिन्दी सीखी और अपनाई, सम्मेलनों में, प्रवचनों में, शास्त्रार्थों में, शिविरों में दिन रात निःस्वार्थ भाव से सेवा करते रहे। उपदेशों को श्रवण कर इनमें स्वाधीनता और हिन्दी के प्रति त्याग, समर्पण, प्रेम-भाव जागृत हुआ और हैदराबाद में आर्य सत्याग्रह का बीज‌ “आर्यन डिफेंस लीग” की स्थापना पंडित दत्तात्रेय प्रसाद वकील के नेतृत्व में की। इस रक्षा समिति में श्री राजपाल, प्रताप नारायण, ए. बालरेड्डी, सोहनलाल, विश्वनाथ आदि लोग सम्मिलित थे।

हिन्दी का प्रभाव भी इतना गहरा रहा की, हिन्दी के लिए पूर्ण रूप से समर्पित हो गए और जीवन भर हिन्दी के प्रचार और प्रसार में लगा दिया। आपने 1940 में केशव स्मारक आर्य विद्यालय की स्थापना में पं. विनायकराव विद्यालंकार को पूर्ण सहयोग दिया और संस्थापक सदस्य बनकर इसकी नींव रखी, आपकी पूरी सेवाएं नि:स्वार्थ रही। तत्कालीन शिक्षा के क्षेत्र में एक उच्च कोटि की संस्था बनकर उभर आई। आपने निज़ाम शासन द्वारा 1946 में जबान बंदी तक विद्यार्थियों को पढ़ाने/अध्यापन का कार्य सुचारू रूप से किया। आगे चलकर एडवोकेट बनने पर अंतरंग सदस्य के साथ-साथ कानूनी सलाहकार भी रहे। आज तक लाखों विद्यार्थियों ने यहां पर शिक्षा ली और अपना भविष्य उज्वल बनाया।

आप केवल हिन्दी में ही हस्ताक्षर करते थे, कानूनी पेपर अंग्रेजी में रहने पर भी। पंडित गंगाराम ने देश तथा समाज की सेवा और सम्मान के लिए अथक सेवाएं की। आपने अपना कर्तव्य निभाने के लिए दिन-रात एक कर दिया। आप हैदराबाद निज़ाम राज्य आर्य प्रतिनिधि सभा के परीक्षा विभाग के प्रमुख 10 वर्ष तक रहे। सैद्धांतिक परीक्षाएं तो सभा लिया ही करती थी, राष्ट्रभाषा हिन्दी के पठन-पाठन की भी सभा की ओर से व्यवस्था की गई। पंडित गंगाराम में इस कार्य के लिए एक विशेष उत्साह तथा रुचि पाई जाती थी। इन एक – एक परीक्षाओं में 220 विद्यार्थियों तक ने भाग लिया। उस समय की परिस्थितियों को देखा जाए तो यह संख्या एक कीर्तिमान था। इस तरह की परीक्षाएं कुछ – कुछ अंतराल में होती रहती थी और इसका संचालन परीक्षा विभाग पंडित गंगाराम ही संभालते थे।

आप हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद से भी अच्छे और मधुर संबंध रहे हैं। कई अहिन्दी भाषीयों को इन्होंने हिन्दी की परीक्षाओं में बिठाया/प्रेरित किया। इनकी बड़ी पुत्रवधु श्रीमती सुखदा भक्तराम, लातूर से सम्बन्धित मराठी मातृभाषा होने पर हिन्दी में कई परीक्षा दिलवायी। श्रीमती सुखदा भक्तराम को सर्वश्रेष्ठ अंक लेने पर “प्रेमचंद स्वर्ण पदक 1984” से नवाजा गया।

आपकी साहित्यिक यात्रा 1945 से आरम्भ हुई। आपने हिन्दी में ” ऋषि चरित्र प्रकाश ” आर्य प्रतिनिधि सभा हैदराबाद स्टेट के अधिन प्रकाशित कर लेखन में क्रांति जागृत की। विद्यार्थियों और पाठकों में महर्षि की जीवनी को बहुत आकर्षित किया। इस सफलता को देखते हुए, इस कृति को तत्कालीन हैदराबाद शासन द्वारा जब्त कर लिया गया। (यहां पर सूचित करते हुए हमें हर्ष हो रहा है की 80 वर्ष के बाद इसका पुनः प्रकाशन हिन्दी में हुआ है। इच्छुक व्यक्ति इसे मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद मोबाइल नंबर 9391052988 से मंगवा सकते हैं। अन्य भाषाओं मराठी, तेलुगू, अंग्रेजी और कन्नड़ में अनुवाद लगभग पूरा होने आया है, जल्द ही इसे आप लोगों के बीच प्रस्तुत करेंगे) महर्षि दयानन्द सरस्वती पर जीवनी आज भी उतनी ही सार्थक, सरल और आकर्षक है कि पाठकों को पढ़ने पर नई ऊर्जा और प्रेरणा मिल रही है।

उच्च शिक्षा हेतु दक्षिण भारत में “हिन्दी महाविद्यालय” की कल्पना और साकार रूप इन्होंने संस्थापक मंत्री रहकर पूरा किया। संस्थापक अध्यक्ष रहे राजा पन्नालाल पित्ती। महाविद्यालय की स्थापना में आचार्य कृष्णदत्त की भी सक्रिय भूमिकाएं रही है। इस स्थापना के पूर्व हिन्दी में उच्च शिक्षा हेतु पढ़ने के लिए काशी या अन्य प्रतिष्ठित स्थानों पर विद्यार्थियों को जाना पड़ता था। हिन्दी में स्नातक एवं उच्च शिक्षा प्राप्त कर यहां से कई केंद्रीय संस्थाओं, विश्वविद्यालयों और बैंकों आदि में हजारों विद्यार्थियों ने अच्छा स्थान पाया है। “दयानन्द उपदेशक महाविद्यालय” मलकपेट के भी आप संस्थापक मंत्री रहे। इस महाविद्यालय का उद्घाटन महात्मा आनन्दस्वामी ने किया। यहां से कई वैदिक संस्कारों के उपदेशक बनकर अपनी उचित सेवाएं देकर दयानन्द उपदेशक महाविद्यालय, मलकपेट का नाम उज्जवल कर रहे हैं।

आपको यह बता दें की इन सभी प्रमुख संस्थाओं में अपना सम्पूर्ण योगदान प्रारम्भ के पांच दस वर्षों तक देकर, आत्मनिर्भर होने पर, अपना पद संस्था को वापस सौंप देते थे। किसी भी संस्था से वह चिपक के नहीं रहे और न ही किसी परिवार के सदस्य को बिठाया। स्वेच्छा पूर्वक अगली पीढ़ी को तैयार कर संस्थाओं को और प्रगतिशील बनने के लिए छोड़ दिये। यह एक बहुत ही प्रेरणादायक उद्धरण है। बहुत निराले ही इस तरह के उदाहरण सामाजिक संस्थाओं में हमको देखने या सुनने को मिलते हैं।

यहां पर एक छोटा सा प्रकरण प्रस्तुत करने से उनके विशाल हृदय का, परोपकारी होने का आप ही विश्लेषण कर सकते हैं। के. राजन्ना को फांसी हुई और वो चंचलगुड़ा जेल में थे, उनका एक पत्र दक्षिण समाचार में प्रकाशित हुआ जिसे देखकर पंडित गंगाराम ने सीधे उनसे मिलने जेल पहुंच गये और हिंदी सीखने के लिए स्लेट, पेंसिल, बॉक्स, पेन, मासिक वर्णाश्रम पत्रक आदि दिया। बस इतना ही प्यार और सम्मान राजन्ना ने पाकर फांसी से तो मुक्ति ली। आज वह हिंदी में तेलंगाना समाचार के संपादक, व्यवस्थापक, संचालक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।

आपने 40 से अधिक प्रभात वैदिक पाठशालाओं का संचालन किया, जिसमें निशुल्क प्रातः काल 2 घंटे की कक्षा समीप के मंदिरों में होती थी, हिन्दी और सनातन वैदिक धर्म पर बालकों को पढ़ाया लिखाया शिक्षित किया जाता था और सूर्य नमस्कार आदि शारीरिक व्यायाम भी कराया जाता था। एडवोकेट होने के कारण और अत्यधिक व्यस्त रहने पर भी, हिन्दी भाषा में ” वर्णाश्रम ” पहले त्रैमासिक कुछ वर्षों तक और बाद में ” वर्णाश्रम पत्रक ” मासिक पत्रिका का सम्पादन, प्रकाशन, लेखन, संपादकीय का कार्य सम्भालते रहे और लगभग 30 वर्षों तक इस तड़प – झड़प वाली लघु पत्रिका, गागर में सागर बनकर संपूर्ण भारतवर्ष के छोटे-छोटे कस्बों से लेकर प्रमुख शहरों में 4000 से अधिक प्रतियां आर्य जगत में वितरण होती थी।

आर्यसमाज महर्षि दयानंद मार्ग, सुल्तान बाजार के द्वारा बहुत सारी प्रेरणाप्रद एवं संवेदनशील विषयों पर लघु पुस्तकें प्रकाशित करवाई। इनमें-

  1. वेद ईश्वरीय ज्ञान है बाइबल या कुरान नहीं
  2. मक्का में हल्ला – हैदराबाद में दंगा
  3. बे मां बाप के दो करोड़ बच्चे
  4. मन्दिरों की भूमि बेचना पाप है
  5. हैदराबाद के गणेशोत्सव – करोड़ो रुपया पानी में
  6. नौबत पहाड़ – मन्दिर या मस्जिद ? आदि

आपने महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा हिन्दी भाषा में लिखा गया उनका पहला ग्रंथ ” सत्यार्थ प्रकाश की कथा ” नाम से एक क्रमबद्ध कार्यक्रम अबाध रूप से चलाया था। बड़े ही सरल भाषा में अति विस्तार से श्रोताओं को सुनाना बड़ा अच्छा लगता था। उनकी यह सत्यार्थ प्रकाश की‌ कथा का आयोजन आर्यसमाज महर्षि दयानंद मार्ग (सुल्तान बाजार), आर्यसमाज किशनगंज और आर्यसमाज आर्य नगर, (शाहअली बंडा) में भव्य रूप से आयोजित कर सैकड़ों श्रोताओं के जीवन में बदलाव लाया और वैदिक सनातन धर्म, राष्ट्र एवं हिन्दी में उनके प्रति प्रेम जागृत किया। यहां पर आपको सूचित करते हुए बड़ी प्रसन्नता हो रही है कि श्रोताओं के आग्रह पर सुल्तान बाजार आर्यसमाज ने इसे एक नहीं, दो नहीं, तीन बार “सत्यार्थ प्रकाश की कथा” का आयोजन कर श्रोताओं को लाभ पहुंचाया।

लगभग चार दशकों तक प्रति वर्ष जनवरी में संक्रांति मेले का आयोजन केशव मेमोरियल हाई स्कूल, नारायणगुड़ा में आयोजित हुआ करता था, यहां दिन भर कई कार्यक्रम होते थे। जिसमें हिन्दी में कविता पाठ, हास्य व्यंग, निबन्ध प्रतियोगिताएं आदि होती और प्रथम, द्वितीय, तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुए बालकों बालिकाओं को पुरस्कार वितरण किया जाता था। महर्षि दयानन्द सरस्वती एवं हिन्दी के परम भक्त, स्वतंत्रता सेनानी, परोपकारी, हैदराबाद निज़ाम शासन की मुक्ति के महानायक का 91 वर्ष की आयु में 2007 में देहांत हुआ।

– भक्त राम
अध्यक्ष स्वतंत्रता सेनानी पंडित गंगाराम स्मारक मंच
98490 95150

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