Hindi Day-2023 Special: भाषिक-सांस्कृतिक बहुलता और हिंदी

भारतीय संविधान में प्रस्तुत भारत की भाषानीति बहुत स्पष्ट और उदार है। इसमें भारत की बहुभाषिकता और सामासिक संस्कृति का पूर्ण सम्मान ध्वनित होता है। विशेषतः हिंदी भाषा के प्रचार और विकास पर केंद्रित अनुच्छेद 351 भारत के भाषाई और सांस्कृतिक परिदृश्य में बेहद महत्वपूर्ण है। यह अनुच्छेद पूरे भारत में हिंदी के विकास और प्रचार-प्रसार के लिए एक समावेशी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।

अनुच्छेद 351 के महत्व को समझने के लिए भारत की भाषाई विविधता पर विचार करना आवश्यक है। भारत 19,000 से अधिक मातृभाषाओं/बोलियों वाला एक बहुभाषी राष्ट्र है। संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकृत, देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी, भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 ‘राष्ट्र की भाषाओं’ में से एक होने के साथ ही सदियों से इस महादेश की ‘संपर्क भाषा’ है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसे देशभर की जनता और जननेताओं में ‘राष्ट्रभाषा’ का स्थान दिया। भले ही संविधान में ‘राष्ट्रभाषा’ का अलग से उल्लेख न हो, लेकिन अनुच्छेद 351 में उसके जिस स्वरूप के विकास का निर्देश निहित है, उसका आधार राष्ट्रभाषा की सार्वदेशिक संकल्पना ही है। यह हिंदी को ‘अक्षेत्रीय भाषा’ के रूप में विकसित करने पर ज़ोर देता है। इसलिए अब हिंदी किसी खास पट्टी की नहीं, बल्कि सारे भारत की भाषा है।

अनुच्छेद 351 में कहा गया है कि हिंदी भाषा के प्रसार को बढ़ावा देना और इसे विकसित करना संघ का कर्तव्य होगा ताकि यह भारत की समग्र संस्कृति के सभी तत्वों के लिए अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में काम कर सके। यह प्रावधान एक ऐसी एकीकृत भाषा के रूप में हिंदी के महत्व को रेखांकित करता है जो देशव्यापी संचार की सुविधा प्रदान करती है और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देती है।

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यहाँ यह कहना भी ज़रूरी है कि भारतीय सामासिक संस्कृति का आईना बनने के लिए हिंदी में सभी भारतीय भाषाओं के उन बहुप्रचलित शब्दों को उदारता से स्वीकार करना ज़रूरी है जो इसमें सहजता से पच सकते हों। साथ ही, ऐसे तमाम शब्द भी हिंदी की शब्द-संपदा का हिस्सा बनने चाहिए, जो इस राष्ट्र के विभिन्न भाषासमाजों की क्षेत्रीय संस्कृति और निजता की पहचान हैं। यदि कुछ समान-स्रोतीय शब्दों के अर्थ हिंदी और अन्य भाषाओं में अलग-अलग हैं, तो उन भिन्न-भिन्न अर्थों को भी हिंदी में स्वीकार किया जाना चाहिए। एक भाषा में एक शब्द के एकाधिक अर्थ भी तो होते हैं न? तो फिर ‘उपन्यास’ को साहित्य की एक विशेष विधा और भाषण दोनों अर्थों में क्यों स्वीकार नहीं किया जा सकता? वैसे भी अर्थ की समझ शब्दकोश पर नहीं, व्यवहार/प्रयोग पर निर्भर करती है।

हिंदी को बढ़ावा देते समय, इसके महत्व को स्वीकार करने और भाषाई विविधता का सम्मान करने के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य है। भारत की भाषाई विविधता एक अद्वितीय सांस्कृतिक संपत्ति है, और यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि हिंदी अन्य भाषाओं और उनमें निहित संस्कृति को साथ लेकर चले। तभी हम कह सकेंगे कि हिंदी केवल उन लोगों की नहीं जो उसे मातृभाषा के रूप में प्राप्त करते हैं, बल्कि सारे भारत और भारतवासियों की राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पहचान की भाषा है।

हिंदी के प्रचार-प्रसार का सबसे प्रभावी तरीका शिक्षा प्रणाली है। भारत भर के स्कूलों में हिंदी को क्षेत्रीय अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए पहली, दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में प्रोत्साहित करने से इसे व्यापक रूप से अपनाने में मदद मिल सकती है। हिंदी शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि छात्र बोली जाने वाली और लिखित हिंदी दोनों में पारंगत हों। इसके साथ-साथ, क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन भी उतना ही आवश्यक है। छात्रों को अपनी क्षेत्रीय भाषा और हिंदी दोनों सीखने के लिए प्रेरित किया जाए। हिंदी मातृभाषी छात्र भी अनिवार्य रूप से कम से कम एक हिंदीतर भाषा अवश्य सीखें। इससे हिंदी के प्रसार में सुविधा होगी और भाषाई विविधता का सम्मान सुनिश्चित किया जा सकेगा।

हिंदी को बढ़ावा देना भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ-साथ चलना चाहिए। हिंदी साहित्य, कला और मीडिया भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हिंदी में क्षेत्रीय विविधता को दर्शाने वाली सांस्कृतिक सामग्री के उत्पादन और प्रसार को प्रोत्साहित करने से इसकी अपील बढ़ सकती है।

अंततः सबसे ज़रूरी है कि समस्त आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी साहित्य से हिंदी को समृद्ध किया जाए। डिजिटल युग में, इंटरनेट और प्रौद्योगिकी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए शक्तिशाली उपकरण हो सकते हैं। हिंदी भाषा की वेबसाइटें, एप्लिकेशन और डिजिटल सामग्री विकसित करने से हिंदी को युवा पीढ़ी के लिए अधिक सुलभ और आकर्षक बनाया जा सकता है। इससे वह कंप्यूटर-दोस्त और बाजार-दोस्त भाषा के साथ ही रोजगार दिलाने वाली भाषा भी बन सकेगी।

इसी के साथ आप सबको हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

– प्रोफेसर डॉ ऋषभदेव शर्मा, हैदराबाद

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