31 मार्च 2026 माओवाद आंदोलन का समाप्ति दिन है। अर्थात देश में साम्यवाद स्थापित करने के लक्ष्य को लेकर सशस्त्र संघर्ष कर रही एक सैद्धांतिक पार्टी को खत्म करने के केंद्र सरकार के संकल्प का दिन। इस संकल्प का परिणाम दुनिया के सामने हैं। इस दौरान हजारों-लाखों माओवादी, पुलिस और बेकसूर आदिवासी मारे गये। इसके बारे में मीडिया में बहुत कुछ प्रकाशित और प्रसारित हो चुका है, हो रहा है और आगे भी होता रहेगा। हालांकि, इसे कोई भी नकार नहीं सकते कि इन छह दशकों में माओवादी आंदोलन ने बहुत कुछ पाया और बहुत कुछ खोया है।

मार्क्सवाद-लेनिनवाद और माओवाद विचारधारा के सिद्धांत के बल पर आरंभ हुआ नक्सलबाड़ी आंदोलन धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया। इसका मुख्य कारण जाति और धर्म के नाम पर गरीब तबकों पर उच्च वर्णों, पूंजीपति और सामंती का दमन, अन्याय और अत्याचार रहा है। माओवाद आंदोलन ने गरीब और सर्वहारा वर्ग पर हो रहे और किये जा रहे दमन, अन्याय, असमानता और अत्याचार करने वालों की पहचान करवाई। यदि आजाद देश की सरकारें इसकी सही पहचान कर पाती तो आज हजारों और लाखों माओवादी, पुलिस और बेकसूर आदिवासी नहीं मारे जाते। इसका मतलब यह नहीं है कि सत्ता में आई सरकारों को यह सब मालूम नहीं है। सब कुछ मालूम होने के बावजूद पूंजीपति और सामंती के धन बल पर बनीं ये सरकारें उनकी रक्षा के लिए लोगों पर दमन, अन्याय और अत्याचार जारी रखा।

परिणाम दमन, अन्याय, असमानता और अत्याचार के खिलाफ लड़ने के लिए गरीब और सर्वहारा तबकों के लोग नक्सलवाद आंदोलन की ओर आकर्षित हो गये। हजारों की संख्या में युवक इस आंदोलन से जुड़ते गये। उन्होंने लोगों को जागरूक किया। आदिवासियों को पढ़ाया-लिखाया और अनेक प्रकार के प्रशिक्षण दिये। आरंभ में पुलिस और नक्सल में खास शत्रुता नहीं थी। नक्सलियों ने गांवों में सामंती वर्ग के खिलाफ अपना आंदोलन तेज किया। यह देख सामंती लोग सरकार के शरण में गये। सरकार ने सामंतियों की सुरक्षा के लिए गांवों में पुलिस भेजकर नक्सलियों को अपना निशाना बनाया। नक्सलियों को देशभक्त कहने वाले एनटीआर, नक्सलियों के साथ बातचीत करने का आश्वासन देने वाले राजशेखर रेड्डी, नक्सलियों का एजेंडा हमारा एजेंडा कहने वाले केसीआर ने सत्ता में आने के बाद नक्सलियों को बेरहमी से कथित मुठभेड़ के नाम पर हत्या कर दी। इनमें से अनेक नक्सलियों का अब तक पता भी नहीं चला कि वे जीवित हैं या मारे जा चुके हैं।
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इसी बीच देश में बढ़ते नक्सली आंदोलन को कुचलने के लिए लोकतंत्र सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। यह देख नक्सली अपनी सुरक्षा के लिए आदिवासी इलाकों में चले गये और खनिज संपदा और प्रकृति को बचाने में जुट गये। पूंजीपतियों और बड़े-बड़े कंपनियों के धन बल से संविधान की शपथ लेकर दुबारा सत्ता में आई बीजेपी सरकार ने पूंजीपतियों और बड़े-बड़े कंपनियों को दिये गये आश्वासनों को पुरा करने के लिए माओवादियों को जंगलों से निकालने के लिए ऑपरेशन कगार आरंभ कर दिया। परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर माओवादियों को कथित मुठभेड़ के नाम पर मौत के घाट उतार दिया। कुछ माओवादी नेताओं ने आत्मसमर्पण (?) किया।
इस प्रक्रिया से पहले माओवादियों की ओर से अनेक शांति प्रस्ताव आये। हालांकि, सरकार ने सभी प्रस्ताव को ठुकरा दिया और प्रस्ताव रखा कि आत्मसमर्पण करें या मुठभेड़ में मरने के लिए तैयार हो जाये। इसके लिए देश की रक्षा करने वाली सेना को आधुनिक हथियार देकर जंगलों में जंग करके अपने ही देश के नागरिकों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। इस तरह वर्तमान सरकार ने नागरिकों के जीने के अधिकार को छीन लिया। सोचने की बात यह है कि यह सब संविधान की रक्षा की शपथ लेने वाली सरकार ने अपने ही देश के नागरिकों के साथ किया है।
देश में अब भी अनेक नक्सली जंगल और जेलों में बंद हैं। माओवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता गणपति अब भी भूमिगत है। इसी बाच ओडिशा की एमएडीसी विभाग सचिव रजिता ने सशस्त्र संघर्ष जारी रखने की घोषणा की है। इस संदर्भ में उसने कहा कि शहीद साथियों के मौत को बेकार नहीं होने दिया जाएगा। इसके अलावा आत्मसमर्पण (?) कर चुके माओवादियों ने संविधान के दायरे में रहकर देश की पीड़ित जनता के लिए काम करने का संकल्प लिया है।
यह सब जानते है कि माओवादियों का सशस्त्र संघर्ष केवल प्रति हिंसा के लिए रहा है। माओवादियों ने जानबूझकर कभी भी मासूम और सर्वहारा वर्ग को नहीं मारा है। इस समय देश-दुनिया के नागिरक एक अच्छे विकल्प की तलाश में है। हर कोई परिवर्तन चाहता है। उन्हें विश्वास है कि यह परिवर्तन माओवाद विचारधारा से संभव है। आने वाले दिनों में माओवाद आंदोलन एक नई रूपरेखा के साथ आगे आएगी। क्योंकि माओवादी विचारधारा अब भी लोगों में जीवित है और भविष्य में भी रहेगी।
के राजन्ना
